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Monday, May 14, 2018

सड़कों पर नमाज क्यों नहीं?

धर्म आस्था और आत्मोत्थान का माध्यम होता है। इसका प्रदर्शन यदि उत्सव के रूप में किया जाए, तो वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक घटना मानी जाती है। जिसका सभी आनंद लेते हैं। चाहे विधर्मी ही क्यों न हों। दीपावली, ईद, होली, वैशाखी, क्रिसमस, पोंगल, संक्राति व नवरोज आदि ऐसे उत्सव हैं, जिनमें दूसरे धर्मों के मानने वाले भी उत्साह से भाग लेते हैं। अपने-अपने धर्मों की शोभा यात्राऐं निकालना, पंडाल लगाकर सत्संग या प्रवचन करवाना, नगरकीर्तन करना या मोहर्रम के ताजिये निकालना, कुछ ऐसे धार्मिक कृत्य हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती या नहीं होनी चाहिए। बशर्ते की इन्हें मयार्दित रूप में, बिना किसी को कष्ट पहुंचाऐ, आयोजित  किया जाए।
किंतु हर शुक्रवार को सड़कों, बगीचों, बाजारों, सरकारी दफ्तरों, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर मुसल्ला  बिछाकर नमाज पढ़ने की जो प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, उससे आम नागरिकों को बहुत तकलीफ होती है। यातायात अवरूद्ध हो जाता है। पुलिस, एम्बुलेंस और फायर बिग्रेड की गाडियां अटक जाती है। जिससे आपातकालीन सेवाओं में बाधा पहुंचती है। इस तरह बड़ी संख्या में एक साथ बैठकर मस्जिद के बाहर नमाज पढ़ने से रूहानियत नहीं फैलती, बल्कि एक नकारात्मक राजनैतिक संदेश जाता है। जो धर्म का कम और ताकत का प्रदर्शन ज्यादा करता है। जाहिर है कि इससे अन्य धर्मावलंबयों में उत्तेजना फैलती है। ऐसी घटना साल में एक आध  बार किसी पर्व हो, तो शायद किसी को बुरा न लगे। पर हर जुम्मे की नमाज इसी तरह पढ़ना, दूसरे धर्मावलंबियों  को स्वीकार नहीं है।
बहुत वर्ष पहले इस प्रवृत्ति का विरोध मुबंई में शिव सेना ने बड़े तार्किक रूप से किया था। मुबंई एक सीधी लाईन वाला शहर है। जिसे अंग्रेजी में ‘लीनियर सिटी’ कहते हैं। उत्तर से दक्षिण मुबंई तक एक सीधी सड़क के दोनों ओर तमाम उपनगर और नगर बसा है। ऐसे में मुबंई की धमनियों में रक्त बहता रहे, यह तभी संभव है, जब इस सीधी सड़क के यातायात में कोई रूकावट न हो। लगभग दो दशक पहले की बात है, मुबंई के मुसलमान भाईयों ने मस्जिदों के बाहर मुसल्ले बिछाकर हर जुम्मे को नमाज पढ़ना शुरू कर दिया। जाहिर है इससे यातायात अवरूद्ध हो गया। आम जनता में इसका विरोद्ध हुआ। शिव सैनिक इस मामले को लेकर बाला साहिब ठाकरे के पास गये। बाला साहिब ने हिंदुओं को आदेश दिया कि वे हर मंदिर के बाहर तक खड़े होकर प्रतिदिन सुबह और शाम की आरती करें। जुम्मे की नमाज तो हफ्ते में एक दिन होती थी। अब ये आरती तो दिन में दो बार होने लगी। व्यवस्था करने में मुबंई पुलिस के हाथ पांव फूल गये। नतीजतन मुबंई के पुलिस आयुक्त ने दोनों धर्मों के नेताओं की मीटिंग बुलाई। पूरे सद्भाव के साथ ये सामूहिक फैसला हुआ कि न तो मुसलमान सड़क पर नमाज पढेंगे और न हिंदू सड़क पर आरती करेंगे। दोनों धर्मावलंबी आज तक अपने फैसले पर कायम हैं।
अब देश की ताजा स्थिति पर गौर कर लें। गत दिनों भाजपा व सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने  देश में कई जगह सड़कों पर नमाज का खुलकर विरोध किया। नतीजा ये हुआ कि हरियाणा सरकार ने मस्जिदों के बाहर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी। इसका असर आसपास के राज्यों में भी हुआ। 11 मई को शुक्रवार था, आमतौर पर दिल्ली की कई मस्जिदों के बाहर दूर तक नमाजी फैल जाया करते थे। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। लोगों ने राहत की सांस ली।
एक साथी पत्रकार ने मुझसे प्रश्न किया कि आप तो आस्थावान व्यक्ति हैं। क्या आप सड़कों पर नमाज पढ़ने को उचित मानते हैं? मेरा उत्तर था-बिल्कुल नहीं। इस पर वे उछल पड़े और बोले कि जिस हिंदू से भी यह प्रश्न पूछ रहा हूं, उसका उत्तर यही है। इसका मतलब मोदी व अमित शाह का चुनावी ऐजेंडा तय हो गया। मैने पूछा- कैसे? तो उनका उत्तर था- भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने सड़कों पर नमाज का विरोध शुरू ही इसलिए किया है कि इससे हिंदू और मुसलमानों का राजनैतिक धु्रवीकरण हो जाए और भाजपा को, विशेषकर उत्तर भारत में, हिंदू मत हासिल करना सुगम हो जाए। अब भाजपा वाले अगले लोक सभा चुनाव तक ऐसे ही मुद्दे उछालते रहेंगे। जैसे तिरंगा ले जाकर मुसलमान के मौहल्लों में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाना, अलीगढ मुस्लिम विद्यालय से जिन्ना का चित्र हटवाना आदि। जिससे लगातार हिंदू मत एकजुट होते जाए। उन पत्रकार महोदय का यह मूल्यांकन सही हो सकता है। राजनीति में चुनाव जीतने के लिए नऐे-नऐ मुद्दे खोजने का काम हर दल करता है। इसमें कुछ गलत नहीं। अब ये तो मतदाता के विवेक पर है कि वह अपना मत प्रयोग करने से पहले किसी राजनैतिक दल का आंकलन किस आधार पर करता है। केवल भावना के आधार पर या उसके द्वारा विकास कर पाने की संभावनाओं के आधार पर।
चुनावी बहस को छोड़ दें, तो भी यह प्रश्न महत्वपूर्णं है कि धर्म का इस तरह राजनैतिक प्रयोग कहां तक उचित है। चाहे वो कोई भी धर्म को मानने वाला कहे। इसमें संदेह नहीं है कि अल्पसंख्यकों ने राजनैतिक दलों का मोहरा बनकर, अपने आचरण से लगातार, दूसरे धर्मावलंबियों को उत्तेजित किया है। चाहे फिर वो समान नागरिक कानून की बात हो, मदरसों में धार्मिक शिक्षा और राजनैतिक प्रवचनों की बात हो या फिर सड़क पर जुम्मे की नमाज पढ़ने की बात हो। कुछ लोग मानते हैं कि हिंदूवादियों का वर्तमान आक्रोश उनकी सदियों की संचित कुंठा का परिणाम है। दूसरे ऐसा मानते हैं कि अपनी राजनीति के लिए भाजपा इसे नाहक तूल दे रही है। पर हमारे जैसे निष्पक्ष नागरिक को फिर वो चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, सिक्ख हो, पारसी हो, जो भी हो, उसे सोचना चाहिए कि धर्म की उसके जीवन में क्या सार्थकता है? अगर धर्म के अनुसार आचरण करने से उसके परिवार में सुख, शांति और रूहानियत आती है, तो धर्म उसके लिए आभूषण है। पर अगर धर्म के ठेकेदारों, चाहे वे किसी धर्म के हो, के ईशारो पर नाचकर हम अविवेकपूर्णं व्यवहार करते हैं, तो वह तथाकथित धर्म हमारे लिए समाजिक वैमनस्य का कारण बन जाता है। जिससे हमें बचना है। भारत में सदियों से सभी धर्म पनपते रहे हैं। अगर हम पारस्परिक सम्मान और सहयोग की भावना नहीं रखेंगे, तो समाज खंड-खंड हो जायेगा, अशांति और वैमनस्य बढ़ेगा और विकास अवरूद्ध हो जाऐगा।

Monday, December 11, 2017

राम मंदिर अयोध्या में ही क्यों बने

अभी कुछ ही दिन पहले देश के कुछ जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका देकर प्रार्थना की है कि अयोध्या में राम मंदिर या मस्जिद ना बनाकर, एक धर्मनिरपेक्ष इमारत का निर्माण किया जाए। ये कोई नई बात नहीं है, जब से राम जन्भूमि आंदोलन चला है, इस तरह का विचार समाज का एक वर्ग खासकर वे लोग जिनका झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर है, देता आया है। जबकि मेरा मानना है कि इस सुझाव से समाज में सौहार्द नहीं बल्कि विद्वेष ही पैदा होगा। गत 20 वर्षों से राम जन्मभूमि के मुद्दे पर स्पष्ट मेरा ये मत रहा है कि केवल अयोध्या ही नहीं, मथुरा और काशी में जो श्रीकृष्ण और भगवान शिव से जुड़ी स्थलियां हैं, उन पर मस्जिद की मौजूदगी पिछले कुछ सदियों से पूरे विश्व के हिंदुओं के हृदय में कील की तरह चुभती है। जब तक ये मस्जिदें काशी, अयोध्या और मथुरा में रहेंगी, तब तक कभी भी साम्प्रदायिक सौहार्द पैदा नहीं हो सकता। क्योंकि ये मस्जिदें हमेशा उस अतीत की याद दिलाती रहेंगी, जब बर्बर आततायियों ने आकर हिंदू धर्मस्थलों को तोड़ा और उनके स्वाभिमान को कुचलने के लिए जबरदस्ती उन स्थलों पर मस्जिदों को निर्माण करवाया।



ये सही है कि ऐसी घटनाऐं इतिहास में हिंदू और मुसलमानों के ही बीच में नहीं बल्कि हिंदू-हिदूं  राजाओं के बीच में भी हुई और कई इतिहासकार इसके बहुत सारे प्रमाण भी देते हैं कि जब एक हिन्दू राजा दूसरे हिंदू राजा के खिलाफ जीतते थे, तब वे उसके स्वाभिमान के प्रतीको को तोड़ते-कुचलते हुए चले जाते थे। यहां तक की मंदिरों तक को तोड़ा जाता था। मगर ये भी सही है कि ऐसे मंदिर तोड़े गये, तो बाद के राजाओं ने उनके पुर्ननिर्माण भी कराये। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि उनकी जगह किसी अन्य धर्म के धर्मस्थलों का निर्माण हुआ हो। जबकि काशी, मथुरा और अयोध्या में , जोकि हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े केंद्र हैं, वहां की धर्मस्थलियों के ऊपर विशाल मंस्जिदों का निर्माण करवाकर, मुगल राजाओं ने हिंदू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य का एक स्थायी बीजारोपण कर दिया है ।



जिस तरह की राजनीति इस मुद्दे को लेकर लगातार हो रही है, उससे साम्प्रदायिक सौहार्द होना तो दूर, साम्प्रदयिक विद्वेष और हिंसा यहीं लगातार बढ़ रही है।



मेरा किसी भी राजनैतिक दल से कभी कोई नाता नहीं रहा है। मैंने हर राजनैतिक दल से बराबर दूरी बनाकर रखी है। जो सही लगा उसका समर्थन किया और जो गलत लगा, उसकी आलोचना की। यही एक पत्रकार का धर्म है, ‘ज्यों की त्यों धर दिनी रे चदरिया’। समाज को दर्पण दिखाना हमारा काम है, न कि हम बहाव में बह जाए।



पर एक आस्थावान हिंदू होने के नाते मुझे व्यक्तिगत रूप से ये बात हमेशा कचोटती रही है कि क्यों जरूरी है कि मथुरा, अयोध्या और काशी में ये मस्जिदें खड़ी रहें?



जबकि मुसलमानों का भी एक बहुत बड़ा पर खामोश हिस्सा ये मानता है कि इस दुराग्रह का कोई धार्मिक कारण नही है। इस दुराग्रह से मुसलमानों का कोई भला होने वाला नहीं है। इन मस्जिदों के वहां रहने व हट जाने से इस्लाम खतरे में पड़ जाने वाला नहीं है। पश्चिमी एशिया में आधुनिक तकनीकों से मस्जिदों को उनके पूरवर्ती स्थानों से हटाकर नये स्थानों पर पुर्नस्थापित किये गये हैं। तो ये कार्य जब मुस्लिम देशों में हो सकता है, तो भारत में बहुसंख्यक हिंदूओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए क्यों नहीं हो सकता ? इस विषय में मेरा मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय में माननीय न्यायाधीश बहुत गंभीरता से विचार करेंगे और बिना किसी राजनैतिक प्रभाव में आए, निर्णय देंगे, जिससे समाज का भला हो। जहां तक बात राम मंदिर के मुद्दे को भाजपा द्वारा राजनैतिक रूप से भुलाने की है जैसा कि आरोप विपक्षी दल भाजपा पर लगाते हैं, तो इसमें कुछ असत्य नहीं है ।  भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद् और संघ से जुड़ी संस्थाओं ने राम जन्मभूमि से जुड़े इस मुद्दे का प्रयोग अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए किया है। पर साथ ही ये बात भी स्पष्ट है कि राजनीति की ये आवश्यक्ता होती है, कि ऐसे मुद्दों को पकड़े, जिससे व्यापक समाज की भावना जुड़ सके। तभी राजनैतिक वृद्धि होती है। संगठन का विस्तार होता है, जनाधार का विस्तार होता है और राजनीति ऐसे ही की जाती है, सत्ता प्राप्ति के लिए। तो अगर भाजपा ने राम मंदिर के मुद्दे को सत्ता प्राप्ति के लिए एक यंत्र के रूप में प्रयोग किया है, तो इसमें कोई अनैतिक कृत्य नही है। क्योंकि जिस तरह कांग्रेस ने गांधी जी को और वामपंथियों ने माक्र्स और माओ को प्रयोग किया और उनकी विचारधाराओं से बहुत दूर रहकर आचरण किया। तो अगर भाजपा इन मंदिरों के निर्माण के लिए संकल्पित है और प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ये चाहते हैं कि उनके शासनकाल में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो, तो ये एक बहुत ही सहज, स्वाभाविक आकांक्षा है। जिसमें बहुसंख्यकों की आकांक्षाऐं भी जुड़ी हुई हैं। तो मैं समझता हूं कि इस मुद्दे पर बहुत छीछालेदर  हो गई, दो दशक खराब हो गये, काफी खून-खराबा सदियों से होता आया है। विवाद अगर ये थमा नहीं और चलता रहा, तो न कभी सौहार्द होगा, न कभी शांति होगी और न ही सद्भभाव बढ़ेगा। इसलिए मैं तो मानता हूं कि मुस्लिम समाज के कुछ जागरूक पढ़े-लिखे लोगों को पहल करनी चाहिए और एक उदार भाई की तरह आचरण करते हुए, स्वयं आगे आकर कहना चाहिए कि, ‘मथुरा, काशी और अयोध्या आपके धर्मस्थल हैं, आप इन पर अपनी श्रद्धा के अनुसार मंदिरों को निर्माण करें और हमारी मंस्जिदों को एक वैकल्पिक जगह देकर इन्हें पुर्नस्थापित कर दें। जिससे हम लोग समाज में प्रेम और भाईचारे से रह सकें।’

Monday, October 2, 2017

हिंदू राष्ट्र का सपना क्या अधूरा रहेगा?


2014 में जब नरेन्द्र मोदी पूर्णं बहुमत लेकर सत्ता में आऐ, तो सारी दुनिया के हिंदुओं ने खुशी मनाई कि लगभग 1000 साल बाद भारत में हिंदू राज की स्थापना हुई है। नरेन्द्र भाई का व्यक्तिगत जीवन आस्थावान रहा है। हिमालय में तप करने से लेकर भारत की सनातन परंपराओं के प्रति उनकी आस्था ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनने की संभावनाओं को बढ़ा दिया। पर आज हिंदू राष्ट्र का सपना संजोने वाले बहुत से गंभीर वृत्ति के लोग भारत के विकास की दशा और दिशा को देखकर चिंतित हैं। इनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा से सहानुभूति रखने वालों से लेकर, संघ से अलग रहने वाले हिंदूवादी तक शामिल हैं। उन्हें लगता है कि जिस दिशा में मोदी जी बढ़ रहे हैं, ये वो दिशा नहीं, जिसका सपना उन्होंने देखा था। इन लोगों की मजबूरी ये है कि ये स्वयं राजनैतिक सत्ता हासिल करने में न तो सक्षम है और न ही उनकी महत्वाकांक्षा है।  ये तो वो लोग हैं, जो इस बात की प्रतीक्षा करते हैं, कि कोई सत्ताधीश इनकी पीडा को समझकर, अपने बलबूते पर, इनके विचारों को नीतिओं में लागू करें। ऐसी परिस्थितियां प्रायः नहीं बना करतीं, अब बनी हैं, तो समय निकला जा रहा है और कोई दूरगामी ठोस परिणाम आ नहीं रहे। इसलिए इनकी चिंता स्वभाविक है।

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के पद की भी कुछ सीमाऐं होती हैं। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दबाव, सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियां चाहकर भी प्रधानमंत्री को बहुत से कदम नहीं उठाने देतीं। समस्या तब खड़ी होती है, जब जो संभव है, वो भी नहीं होता और जो कुछ हो रहा होता है, वह अपेक्षाओं के विपरीत होता है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली की एक जानीमानी महिला बुद्धिजीवी जो अंगे्रजी में अपने लेख और शोधपत्रों के माध्यम से गत 35 वर्षों से हिंदू विचारधारा की प्रबल प्रवक्ता रही हैं, उनके स्वनामधन्य पिता देश के सबसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक के वर्षों संपादक रहे और वे भी जीवन के अंतिम दशक में कट्टर हिंदूवादी हो गये थे, आज ये महिला मौजूदा सरकार से खिन्न है।

इनकी शिकायत है कि हिंदूत्व के नाम पर मोदी सरकार में ऐसे लोगों को महत्वपूर्णं पदों पर बिठाया जा रहा है, जिनकी योग्यता सामान्य से भी निचले स्तर की है। ऐसे अयोग्य लोग उन संस्थाओं का तो भट्टा बैठा ही रहे हैं, हिंदू हित का भी भारी अहित कर रहे हैं। इन विदुषी महिला का आरोप है कि कई मंत्रालयों ने उनसे ऐसे पदों पर चयन करने के पूर्व कुछ नाम सुझाने को कहा। इन्होंने अपनी ओर से देखे परखे, ऐसे लोगों के नाम सुझाये, जिनकी योग्यता और हिंदू संस्कृति के प्रति आस्था उच्चकोटि है।  पर उन्हें हर बार निराशा हुई, क्योंकि जिन्हें चुना गया, वे इनके सामने खड़े होने के भी लायक नहीं थे। उनका कहना था कि ऐसा नहीं है कि जो नाम उन्होंने सुझाये, वे उनके परिचितों या मित्रों के थे। उनमें से कई लोगों को तो वे व्यक्तिगत रूप से कभी मिली भी नहीं थीं। केवल उनकी योग्यता ने उन्हें प्रभावित किया। कम्युनिस्टों की घोर विरोधी रही, ये विदुषी महिला कहतीं हैं कि हमसे गलती हुई, जो हम सारी जिंदगी कम्युनिस्टों को कोसते रहे। भाजपा से तो कम्युनिस्ट कहीं बेहतर थे, कि उन्होंने ऐसे चयन में योग्यता की उपेक्षा प्रायः नहीं की। यही कारण है कि भारत की राजनीति में वे अल्पसंख्यक होते हुए भी आज तक इतने प्रभावशाली रहे हैं कि उन्होंने भारत के मीडिया व अकादमिक क्षेत्र को प्रभावित किया। जबकि मौजूदा सरकार द्वारा नियुक्त हिंदूवादी व्यक्ति, जिस संस्था में भी जा रहे हैं, अपने अधकचरे ज्ञान और अपरिपक्व स्वभाव के कारण संस्थाओं को बिगाड़ रहे हैं और अपना मखौल उड़वा रहे हैं।

हिंदू संस्कृति के क्षेत्रों को विकास के मामले में, मेरा भी अनुभव ऐसा ही रहा है। कई बार मैंने इस सवाल को, इस कॉलम  माध्यम से उठाया है। मोदी जी ने अच्छी भावना से अनेक योजनाओं की घोषणा की, पर उनकी नीतियां बनाने और क्रियान्वयन करने का काम उसी नौकरशाही पर छोड़ दिया, जो आज तक औपनिवेशिक मानसिकता के बाहर नहीं निकल पाई है। नतीजतन हिंदू संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर जो भी योजनाऐं बन रही हैं, उनसे न तो व्यापक समाज का भला हो रहा है और न ही हिंदू संस्कृति का। पता नहीं क्यों हम जैसे राष्ट्रप्रेमी और सनातन धर्मप्रेमियों के अच्छे सुझाव भी प्रधानमंत्री के कानों तक नहीं पहुंचते। हमारी समस्या यह है कि पिछली सरकारों से हम हिंदू संस्कृति के लिए इसलिए बहुत कुछ ठोस नहीं करवा पाए, क्योंकि वे धर्मनिरपेक्षता की चश्मे के बाहर देखने को तैयार नहीं थीं। जबकि भाजपा की मौजूदा सरकारें अपनी लक्ष्मण रेखा के बाहर नहीं देखना चाहतीं। लक्ष्मण रेखा के भीतर माने भाजपा व संघ परिवार के बाहर उन्हें न तो कोई हिंदूवादी दिखता है और न ही कोई योग्य। सत्ता और पद के लिए हम, न तो पहले झुके और न आगे झुकने की इच्छा है। झुके होते तो कब के सत्ता पर काबिज हो गये होते। क्योंकि सत्ता ने कई बार हमारा दरवाजा खटखटाया, पर हमने उसे घर में घुसने नहीं दिया। हमारे जैसे लोग देश में लाखों की संख्या में हैं, जो किसी की राजनीति का मोहरा बनने को तैयार नहीं है। पर देश व सनातन धर्म के लिए अपना जीवन खपाते आऐ हैं और अगर मोदी सरकार, हमारे सुझावों को गंभीरता से ले तो  हिंदू संस्कृति के हित में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। क्योंकि इन सब लोगों के पास अनुभव का लंबा खजाना है, विचारों की स्पष्टता है और लक्ष्य हासिल करने का जुनून भी।

Monday, June 12, 2017

एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा

जिस दिन एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा पड़ा, उसके अगले दिन एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान भाजपा के प्रवक्ता का दावा था कि सीबीआई स्वायत्त है। जो करती है, अपने विवेक से करती है। मैं भी उस पैनल पर था, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। सीबीआई कभी स्वायत्त नही रही या उसे रहने नहीं दिया गया। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसे अपने अधीन ले लिया था, तब से हर सरकार इसका इस्तेमाल करती आई है। 



रही बात एनडीटीवी के मालिक के यहां छापे की तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि डा. प्रणय रॉय एक अच्छे इंसान हैं। मेरा उनका 1986 से साथ है, जब वे दूरदर्शन पर ‘वल्र्ड दिस वीक’ एंकर करते थे और मैं ‘सच की परछाई’। तब देश में निजी चैनल नहीं थे। जैसा मैंने उस शो में बेबाकी से कहा कि 1989 में कालचक्र वीडियो मैग्जी़न के माध्यम से देश में पहली बार स्वतंत्र हिंदी टीवी पत्रकारिता की स्थापना करने के बावजूद, आज मेरा टीवी चैनल नहीं है। इसलिए नहीं कि मुझे पत्रकारिता करनी नहीं आती या चैनल खड़़ा करने का मौका नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि चैनल खड़ा करने के लिए बहुत धन चाहिए। जो बिना सम्पादकीय समझौते किये, संभव नहीं था। मैं अपनी पत्रकारिता की स्वतंत्रता खोकर चैनल मालिक नहीं बनना चाहता था। इसलिए ऐसे सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर दिये। 



एनडीटीवी के कुछ एंकर बढ़-चढ़कर ये दावा कर रहे हैं कि उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला हो रहा है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि ‘गोधरा कांड’ के बाद, जैसी रिपोर्टिंग उन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ की, क्या वैसे ही तेवर से उन्होंने कभी कांग्रेस के खिलाफ भी अभियान चलाया ? जब मैंने हवाला कांड में लगभग हर बड़े दल के अनेकों बड़े नेताओं को चार्जशीट करवाया, तब वे सब चैनलों पर जाकर अपनी सफाई में तमाम झूठे तर्क और स्पष्टीकरण देने लगे। उस समय मैंने उन सब चैनलों के मालिकों और एंकरों को इन मंत्रियों और नेताओं से कुछ तथ्यात्मक प्रश्न पूछने को कहा तो किसी ने नहीं पूछे। क्योंकि वे सब इन राजनेताओं को निकल भागने का रास्ता दे रहे थे। ऐसा करने वालों में एनडीटीवी भी शामिल था। ये कैसी स्वतंत्र पत्रकारिता है? जब आप किसी खास राजनैतिक दल के पक्ष में खड़े होंगे, उसके नेताओं के घोटालों को छिपायेंगे या लोकलाज के डर से उन्हें दिखायेंगे तो पर दबाकर दिखायेंगे। ऐसे में जाहिरन वो दल अगर सत्ता में हैं, तो आपको और आपके चैनल को हर तरह से मदद देकर मालामाल कर देगा। पर जिसके विरूद्ध आप इकतरफा अभियान चलायेंगे, वो भी जब सत्ता में आयेगा, तो बदला लेने से चूकेगा नहीं। तब इसे आप पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला नहीं कह सकते।



सोचने वाली बात ये है कि अगर कोई भी सरकार अपनी पर उतर आये और ये ठान ले कि उसे मीडियाकर्मियों के भ्रष्टाचार को उजागर करना है, तो क्या ये उसके लिए कोई मुश्किल काम होगा? क्योंकि काफी पत्रकारों की आर्थिक हैसियत पिछले दो दशकों में जिस अनुपात में बढ़ी है, वैसा केवल मेहनत के पैसे से होना संभव ही न था। जाहिर है कि बहुत कुछ ऐसा किया गया, जो अपराध या अनैतिकता की श्रेणी में आता है। पर उनके स्कूल के साथियों और गली-मौहल्ले के खिलाड़ी मित्रों को खूब पता होगा कि पत्रकार बनने से पहले उनकी माली हालत क्या थी और इतनी अकूत दौलत उनके पास कब से आई। ऐसे में अगर कभी कानून का फंदा उन्हें पकड़ ले तो वे इसेप्रेस की आजादी पर हमला’ कहकर शोर मचायेंगे। पर क्या इसे ‘प्रेस की आजादी पर हमला’ माना जा सकता है?



अगर हमारी पत्रकार बिरादरी इस बात का हिसाब जोड़े कि उसने नेताओं, अफसरों या व्यवसायिक घरानों की कितनी शराब पी, कितनी दावतें उड़ाई, कितने मुर्गे शहीद किये, उनसे कितने मंहगे उपहार लिए, तो इसका भी हिसाब चैकाने वाला होगा। प्रश्न है कि हमें उन लोगों का आतिथ्य स्वीकार ही क्यों करना चाहिए, जिनके आचरण पर निगेबानी करना हमारा धर्म है। मैं पत्रकारिता को कभी एक व्यवसायिक पेशा नहीं मानता, बल्कि समाज को जगाने का और उसके हक के लिए लड़ने का हथियार मानता रहा हूं। प्रलोभनों को स्वीकार कर हम अपनी पत्रकारिता से स्वयं ही समझौता कर लेते हैं। फिर हम प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला कहकर शोर क्यों मचाते हैं



सत्ता के विरूद्ध अगर कोई संघर्ष कर रहा हो, तो उसे अपने दामन को साफ रखना होगा। तभी हमारी लड़ाई में नैतिक बल आयेगा। अन्यथा जहां हमारी नस कमजोर होगी, सत्ता उसे दबा देगी। पर ये बातें आज के दौर में खुलकर करना आत्मघाती होता है। मध्य युग के संत अब्दुल रहीम खानखाना कह गये हैं, ‘अब रहीम मुस्किल परी, बिगरे दोऊ काम। सांचे ते तौ जग नहीं, झूंठे मिले न राम’।। जो सच बोलूंगा, तो दुनिया मुझसे रूठेगी और झूंठ बोलूंगा तो भगवान रूठेंगे। फैसला मुझे करना है कि दुनिया को अपनाऊं या भगवान को। लोकतंत्र में प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला एक निंदनीय कृत्य है। पर उसे प्रेस का हमला तभी माना जाना चाहिए जबकि हमले का शिकार मीडिया घराना वास्तव में निष्पक्ष सम्पादकीय नीति अपनाता हो और उसकी सफलता के पीछे कोई बड़ा अनैतिक कृत्य न छिपा हो।


Monday, March 27, 2017

वेदों के अनुसार आकाश की बिजली का प्रयोग संभव

बिजली आज सभ्य समाज की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। गरीब-अमीर सबको इसकी जरूरत है। विकासशील देशों में बिजली का उत्पादन इतना नहीं होता कि हर किसी की जरूरत को पूरा कर सके। इसलिए बिजली उत्पादन के वैकल्पिक स्त्रोत लगातार ढू़ढे जाते है। पानी से बिजली बनती है, कोयले से बनती है, न्यूक्लियर रियेक्टर से बनती है और सूर्य के प्रकाश से भी बनती है। लेकिन वैज्ञानिक सूर्य प्रकाश कपूर जिन्होंने वैदिक विज्ञान के आधार पर आधुनिक जगत की कई बड़ी चुनौतियों को मौलिक रूप से सुलझाने का काम किया है, उनका दावा है कि बादलों में चमकने वाली बिजली को भी आदमी की जरूरत के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि एक हकीकत है। दुनिया के विकसित देश जैसे अमेरिका, जापान, चीन, फ़्रांस आदि तो इस बिजली के दोहन के लिए संगठित भी हो चुके हैं । उनकी संस्था का नाम है ‘इंटरनेशनल कमीशन आन एटमास्फारिक इलैक्ट्रिसिटी’। दुर्भाग्य से भारत इस संगठन का सदस्य नहीं है। अलबत्ता यह बात दूसरी है कि भारत के वैदिक शास्त्रों में इस आकाशीय बिजली को नियंत्रित करने का उल्लेख आता है। देवताओं के राजा इंद्र को इसकी महारत हासिल है। सुनने में यह विचार अटपटा लगेगा। ठीक वैसे ही जैसे आज से सौ वर्ष पहले अगर कोई कहता कि मैं लोहे के जहाज में बैठकर उड़ जाउंगा! तो दुनिया उसका मजाक उड़ाती।

पृथ्वी की सतह से 80 किमी. उपर तक तो हमारा वायुमंडल है। उसके उपर 220 किमी. का एक अदृश्य गोला पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए है। जिसे ‘आईनों स्फियर’ कहते हैं। जो ‘आयन्स’ से बना हुआ है। इस आयनो स्फियर के कण बिजली से चार्ज होते हैं। उनके और पृथ्वी की सतह के बीच लगातार आकाशीय बिजली का आदान प्रदान होता रहता है। इस तरह एक ग्लोबल सर्किट काम करता है। जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन इतनी बिजली का आदान प्रदान होता है कि पूरी दुनिया की 700 करोड़ आबादी की बिजली की जरूरत बिना खर्च किये पूरी हो सकती है। उपरोक्त अंर्तराष्ट्रीय संस्था का यही उद्देश्य है कि कैसे इस बिजली को मानव की आवश्यक्ता के लिए प्रयोग किया जाये।

जब आकाश में बिजली चमकती है, तो ये प्रायः पहले पहाड़ों की चोटियों पर लगातार गिरती हैं। डा. कपूर बताते हैं कि इस बिजली से 30000 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान पैदा होता है। जिससे पहाड़ की चोटी खंडित हो जाती है। उपरोक्त अंर्तराष्ट्रीय संस्था ने अभी तक मात्र इतनी सफलता प्राप्त की है कि इस बिजली से वे पहाड़ों के शिखरों को तोड़कर समतल बनाने का काम करने लगे हैं। जो काम अभी तक डायनामाईट करता था। ऋग्वेद के अनुसार देवराज इंद्र ने शंभर राक्षस के 99 किले इसी बिजली से ध्वस्त किये थे। ऋग्वेद में इंद्र की प्रशंक्ति में 300 सूक्त हैं। जिनमें इस बिजली के प्रयोग की विधियां बताई गई है।

वेदों के अनुसार इस बिजली को साधारण विज्ञान की मदद से ग्रिड में डालकर उपयोग में लाया जा सकता है। न्यूयार्क की मशहूर इमारत इंम्पायर स्टेट बिल्डिंग के शिखर पर जो तड़िचालक लगा है
, उस पर पूरे वर्ष में औसतन 300 बार बिजली गिरती है। जिसे लाइट्निंग कंडक्टर के माध्यम से धरती के अंदर पहुंचा दिया जाता है। भारत में भी आपने अनेक भवनों के उपर ऐसे तड़िचालक देखे होंगे, जो भवनों को आकाशीय बिजली के गिरने से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। अगर इस बिजली को जमीन के अंदर न ले जाकर एडाप्टर लगाकर, उसके पैरामीटर्स बदलकर, उसको ग्रिड में दे दिया जाये तो इसका वितरण मानवीय आवश्यक्ता के लिए किया जा सकता है।

मेघालय प्रांत जैसा नाम से ही स्पष्ट है, बादलों का घर है। जहां दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश होती है और सबसे ज्यादा बिजली गिरती है। इन बादलों को वेदों में पर्जन्य बादल कहा जाता है और विज्ञान की भाषा में ‘कुमुलोनिम्बस क्लाउड’ कहा जाता है। किसी हवाई जहाज को इस बादल के बीच जाने की अनुमति नहीं होती। क्योंकि ऐसा करने पर पूरा जहाज अग्नि की भेंट चढ़ सकता है। बादल फटना जो कि एक भारी प्राकृतिक आपदा है, जैसी उत्तराखंड में हुई, उसे भी इस विधि से रोका जा सकता है। अगर हिमालय की चोटियों पर ‘इलैट्रिकल कनवर्जन युनिट’ लगा दिये जाए और इस तरह पर्जन्य बादलों से प्राप्त बिजली को ग्रिड को दे दिया जाए तो उत्तर भारत की बिजली की आवश्यक्ता पूरी हो जायेगी और बादल फटने की समस्या से भी छुटकरा मिल जायेगा।

धरती की सतह से 50000 किमी. ऊपर धरती का चुम्बकीय आवर्त (मैग्नेटो स्फियर) समाप्त हो जाता है। इस स्तर पर सूर्य से आने वाली सौर्य हवाओं के विद्युत आवर्त कण (आयन्स) उत्तरी और दक्षिणी धु्रव से पृथ्वी में प्रवेश करते हैं, जिन्हें अरोरा लाईट्स के नाम से जाना जाता है। इनमें इतनी उर्जा होती है कि अगर उसको भी एक वेव गाइड के माध्यम से इलैट्रिकल कनवर्जन युनिट लगाकर ग्रिड में दिया जाये तो पूरी दुनिया की बिजली की आवश्यक्ता पूरी हो सकती है। डा. कपूर सवाल करते हैं कि भारत सरकार का विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय क्यों सोया हुआ है ? जबकि हमारे वैदिक ज्ञान का लाभ उठाकर दुनियों के विकसित देश आकाशीय बिजली के प्रयोग करने की तैयारी करने में जुटे हैं।

Monday, September 26, 2016

केंद्र सरकार के लिए मध्यावधि चुनाव जैसे होंगे विस चुनाव

विधानसभा चुनावों के लिए राज्यों में चुनावी मंच सजना शुरू हो गए हैं। खासतौर पर उप्र और पंजाब में तो चुनावी हलचल जोरों पर है। उप्र में सभी राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं की कमर भी कस दी है। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ये चुनाव सिर्फ विधान सभा चुनाव तक सीमित नहीं दिख रहे हैं। मोदी सरकार के सामने बिल्कुल वैसी चुनौती है जैसे उसके लिए ये मघ्यावधि चुनाव हों। वाकई उसके कार्यकाल का आधा समय गुजरा है। इसी बीच उसके कामकाज की समीक्षाएं हो रही होंगी। हालांकि उप्र में चुनावी तैयारियों के तौर पर अभी थोड़ी सी बढ़त कांग्रेस की दिख रही है। गौर करने लायक बात है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की उप्र में महीने भर की किसान यात्रा की अनदेखी मीडिया भी नहीं कर पाया।

हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल के सामने एक अतिरिक्त चुनौती अपने काम काज या अपनी उपलब्धियां बताने की होती है। इस लिहाज से भाजपा और उप्र की अखिलेश सरकार के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है। यानी उप्र में सपा और भाजपा को अपने सभी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के उठाए सवालों का सामना करना पड़ेगा।  उप्र में भाजपा भले ही तीसरे नंबर का दल है लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ होने के कारण उससे केंद्र में सत्तारूढ़ होने के नाते सवाल पूछे जाएंगे। इसी आधार पर कहा जा रहा है कि उसके लिए यह चुनाव मध्यावधि जैसा होगा। रही बात समालवादी पार्टी की तो उसने तो अपनी उपलब्धियों की लंबी चौड़ी सूची तैयार करके पोस्टर और होर्डिग का अंबार लगा दिया है। ये बात अलग है सपा के भीतर ही प्रभुत्व की जोरआजमाइश ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जोश और विश्वास के साथ परिस्थियों का सामना किया उससे सपा की छवि को उतनी चोट पहुंच नहीं पाई। इधर उप्र विकास के कामों को फटाफट निपटाने जो ताबड़तोड़ मुहिम चल रही है उसे उप्र विधान सभा चुनाव की तैयारियां ही माना जाना चाहिए।

कांग्रेस ने जिस तरह से उप्र के चालीस जिलों से होकर कि सान यात्रा निकाली है उससे अचानक हलचल मच गई है। दो महीने पहले तक कांग्रेस मुक्त भारत का जो अभियान भाजपा चला रही थी वह भी ठंडा पड़ रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर ने कांग्रेस में जान फूंक दी। अब तो कांग्रेस के बड़े नेता भी प्रशांत किशोर के सलाह मशविरे को तवज्जो देते दिख रहे हैं। वैसे तो विधान सभा चुनाव अभी छह महीने दूर हैं  लेकिन  कांग्रेस की मेहनत देखकर लगने लगा है कि उसे हल्के में नहीं लिया जा पाएगा। उसने दूसरे बड़े दलों से गठजोड़ लायक हैसियत तो अभी ही बना ही ली है।  

रही बात इस समय दूसरे पायदान पर खड़ी बसपा की तो बसपा के बारे में सभी लोग मानते हैं कि उसके अपने जनाधार को हिलाना डुलाना आसान नहीं है। उसके इस पक्के घर में कितनी भी तोड़फोड़ हुई हो लेकिन जल्दी ही वह बेफर्क मुद्रा में आ गई। पिछले दिनों उसकी बड़ी बड़ी रैलियों से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। हां कार्यकर्ताओं के मनोबल पर तो फर्क पड़ता ही है। वास्तविक स्थिति के पता करने का उपाय तो हमारे पास नहीं है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में पहुंची चोट का असर उस पर जरूर होगा। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर आगे चलकर बसपा गठबंधन के जरिए अपना रास्ता आसान बना ले।

कुलमिलाकर उप्र में मचने वाला चुनावी घमासान चौतरफा होगा। इस चौतरफा लड़ाई में अभी सभी प्रमुख दल अपने बूते पर खड़े रहने का दम भर रहे हैं। कोई संकेत या सुराग नहीं मिलता कि कौन सा दल किस एक के  खिलाफ मोर्चा लेगा। लेकिन केंद्र की राजनीति के दो प्रमुख दल कांग्र्रेस और भाजपा का आमने सामने होना तय है। इसी तरह प्रदेश के दो प्रमुख दल सपा और बसपा के बीच गुत्थमगुत्था होना तय है। लेकिन उप्र के एक ही रणक्षेत्र में एक ही समय में दो तरह के युद्ध तो चल नहीं सकते। सो जाहिर है कि चाहे गठबंधन की राजनीति सिरे चढ़े और चाहे सीटों के बंटवारे के नाम पर हो अंतरदलीय ध्रुवीकरण तो होगा ही। बहुत संभव है कि इसीलिए अभी कोई नहीं भाप पा रहा है कौन किसके कितने नजदीक जाएगा। 

अपने बूते पर ही खड़े रहने की ताल कोई कितना भी ठोक ले लेकिन चुनावी लोकतंत्र में दो ध्रवीय होने की मजबूरी बन ही जाती है। इस मजबूरी को मानकर चलें तो कमसे इतना तय है कि उप्र का चुनाव या तो सपा और बसपा के बीच शुद्ध रूप् से प्रदेश की सत्ता के लक्ष्य को सामने रख कर होगा या कांग्रेस और भाजपा के बीच 2019 को सामने रखकर होगा। पहली सूरत में राष्टीय स्तर के दो बड़े दलों यानी भाजपा और कांग्रेस को तय करना पड़ेगा कि सपा या बसपा में से किसे मदद पहुंचाएं। दूसरी सूरत है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच साधे ही तूफानी भिड़त होने लगे। देश में जैसा माहौल है उसे देखते हुए इसका योग बन सकता है लेकिन उप्र कोई औसत दर्जे का प्रदेश नहीं है। दुनिया के औसत देश के आकार का प्रदेश है। लिहाजा इस चुनाव का लक्ष्य प्रदेश की सत्ता ही होगा। जाहिर है घूमफिर कर लड़ाई का योग सपा और बसपा के बीच ही ज्यादा बनता दिख रहा है। बाकी पीछे से केंद्र के मध्यावधि चुनाव जैसा माहौल दिखता रहेगा।

Monday, July 11, 2016

कौन विफल कर रहा है स्वच्छ भारत अभियान को?

पुरानी कहावत है कि जब खीर खा लो तो चावल अच्छे नहीं लगते| यूँ तो हमें अपने चारों तरफ गन्दगी का साम्राज्य देखने की आदत पड़ गयी है| इसलिए हमारा ध्यान भी उधर नहीं जाता | पर हर बार यूरोप या अमरीका से लौट कर जब कोई भारत आता है तो उसे सबसे पहले भारत के शहरों में गन्दगी देख कर झटका लगता है | पिछले हफ्ते अमरीका से लौटते ही मुझे काम से मुरादाबाद, लखनऊ और वाराणसी जाना पड़ा | तीनों शहरों में गन्दगी के अम्बार लगे पड़े हैं | जबकि पीतल की क्लाकृतियों के निर्यात के कारण मुरादाबाद एक धनीमानी शहर है | लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है और वाराणसी प्रधान मंत्री का संसदीय क्षेत्र | पर तीनों ही शहरों में, सरकारी इलाकों को छोड़ कर बाकी सारे ही शहर एक ही बारिश में नारकीय स्थिति को पहुँच गये हैं | प्रधान मंत्री के स्वच्छता अभियान के पोस्टर तो आपको हर सरकारी इमारत में लगे मिल जायेंगे पर इस अभियान को सफल बनाने की ओर किसी का ध्यान नहीं है | न तो सरकारी मुलाज़िमों का और न ही हम और आप जैसे आम नागरिकों का|

हमारी दशा तो उस मछुआरिन जैसी हो गई है जो एक रात बाज़ार से घर लौटते समय तेज़ बारिश के कारण रास्ते में अपनी मालिन सहेली के घर रुक गई | पर फूलों की खुशबु के कारण उसे रात को नींद नहीं आ रही थी, सो उसने अपना मछली का टोकरा अपने मुह पर ओढ़ लिया | टोकरे की बदबू सूंघ कर उसे गहरी नींद आ गयी | हमें घर से निकलते ही कूड़े के अम्बार दिखाई देते हैं पर हम उसको अनदेखा कर के चले जाते हैं | जबकि अगर हम सब इस बात की चिंता करने लगें कि अपने घर के आसपास कूड़ा जमा नहीं होने देंगे | कूड़े को व्यकितगत या सामूहिक प्रयास से उसे उठवाने की कोशिश करेंगे, तो कोई वजह नहीं है कि धीरे-धीरे न सिर्फ हमारे पड़ोसी बल्कि नगर पालिका के कर्मचारी भी अपनी ड्यूटी ज़िम्मेदारी से करने लगेंगे | 

हममें से कितने लोग हैं जो कार, बस या रेल में सफर करते समय अपने खानपान का कूड़ा डालने के लिए अपने साथ एक कूड़े का थैला लेकर चलते हैं ? जबकि नागरिक चेतना वाले समाजों में यह आम रिवाज़ है कि लोग अपना कूड़ा अपने थैले में भरते हैं और गंतव्य आने पर उसे कूड़ेदान में डाल देते हैं| हमें तो यात्रा के समय अपने इर्द गिर्द हर किस्म का कूड़ा फ़ैलाने में कोई संकोच नहीं होता | ज़रा सोचिये जब आप ट्रेन या हवाई जहाज के टायलेट में जाएं और वो गन्दा पड़ा हो तो आपको कितनी तकलीफ होती है ? फिर भी हम लोग यह नहीं करते कि जिस कमरे में रहे या जिस वाहन में यात्रा करें उसे साफ़ छोड़ें | 

1982 की एक घटना याद आती है | अपनी शादी के बाद हम तमिलनाडु में ऊटी नाम के हिल स्टेशन पर गए | होटल के कमरे से जब निकलने लगे तो मेरी पत्नी मीता ने कमरे की सफाई शुरू कर दी | मुझे अचम्भा हुआ कि हम तो अब जा रहे हैं | ये काम तो होटल के स्टाफ का है, तुम क्यों कर रही हो ? उन्होंने अंग्रेजी में जवाब दिया, “लीव द रूम ऐज़ यू वुड लाईक टू हैव इट” यानी कमरे को ऐसा छोड़ो जैसा कि आप उसे पाना चाहते हो | तब से आज तक मेरी ये आदत है कि होटल का कमरा हो, सरकारी अतिथिग्रह का हो या किसी मेज़बान का, मैं उसे यथासंभव पूरी तरह साफ़ करके ही निकलता हूँ | 

स्वच्छता अभियान के प्रारम्भ में बहुत सारे लोगों, मशहूर हस्तियों, सरकारी अधिकारीयों, मंत्रियों और नेताओं ने झाड़ू उठा कर सफाई करने की रस्म अदायगी की थी | झाड़ू ले कर फोटो छपवाने की होड़ सी लग गयी थी | यह देख कर बड़ा अच्छा लगा था कि मोदी जी ने महात्मा गाँधी के बाद पहली बार सफाई जैसे काम को इतना सम्मान जनक बना दिया कि झाड़ू उठाना भी प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया| पर चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात | इन महानुभावों की छोड़ हर रैली में मोदी-मोदी चिल्लाने वाले प्रधान मंत्री की भाजपा के कार्यकर्ता तक आपको कहीं भी स्वच्छ भारत अभियान चलते नहीं दिख रहे हैं | 

आपको याद होगा कि लाल बहादुर शास्त्री जी ने अन्न संकट के दौरान हर सोमवार की शाम न सिर्फ भोजन करना छोड़ा बल्कि प्रधान मंत्री निवास में हल बैल लेकर खेती करना भी शुरू कर दिया था| मुझे लगता है कि इस देश में हम सब को लगातार धक्के की आदत पड़ गई है| इसलिए प्रधान मंत्री को हफ्ते में एक निर्धारित दिन राजधानी के सबसे गंदे इलाके में, बिना किसी पूर्व घोषणा के, अचानक जाकर झाड़ू लगानी चाहिए | इसके दो लाभ होंगे, एक तो पूरे देश में हर हफ्ते एक सकारात्मक खबर बनेगी, जिसका काफी असर आम जनता पर पड़ेगा | दूसरा झाड़ू पार्टी के नौटंकीबाज़ मुख्य मंत्री केजरीवाल की उर्जा फ़ालतू ब्यानबाजी से हटकर सकारात्मक कार्यों में लगेगी | क्योंकि शायद मुकाबले में वो सातों दिन झाड़ू लेकर निकल पड़ें| अगर उस निर्धारित दिन मोदी जी भारत के किसी अन्य नगर में हों तो वे वहां भी अपना नियम जारी रखें | जिससे हर जगह हड़कंप रहेगा | 

जिन लोगों ने स्वच्छता अभियान के प्रारम्भ में मोदी जी की यह कह कर आलोचना की थी कि प्रधान मंत्री के पास इतने बड़े काम हैं, ये झाड़ू लगाने की फुर्सत कहाँ से मिल गयी | उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि सफाई कि वृत्ति केवल अपने चारों ओर के कूड़ा उठाने तक सीमित नहीं रहेगी | इससे हमारे दिमागों और विचारों की भी सफाई होगी | जिसकी आज हमें बहुत ज़रुरत है |

Monday, May 16, 2016

साम्यवादी निष्पक्ष चिंतन करें

क्षिप्रा नदी के तट पर सिंहस्थ कुंभ में दुनियाभर के आस्थावान लोगों का सागर उमड़ पड़ा है। इतने विशाल जनसमूह की आवश्यकताओं को देखते हुए मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने प्रशंसनीय व्यवस्थाएं की हैं, जिसके लिए वो बधाई की पात्र है। यहां आए सभी संतों को केंद्र सरकार से दो अपेक्षाएं हैं, एक तो यथाशीघ्र राम मंदिर का निर्माण हो और दूसरा गौ-हत्या प्रतिबंधित हो। दोनों ही मांगें सर्वथा उचित और चिरअपेक्षित हैं। पर अब तक केंद्र में ऐसी कोई सरकार नहीं रही, जो संवेदनशीलता से इन मांगों पर कुछ करती। पहली बार संतों को लग रहा है कि इरादे के पक्के और आस्थावान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते अगर यह काम नहीं हुआ, तो फिर भविष्य में न जाने कितने दिन टले। 

भारत के लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि यहां बहुमत सरकार लेकर भी नरेंद्र मोदी वह सब नहीं कर सकते, जो एक राजतंत्र में करना बहुत सरल होता है। राजा प्रजा की भावना को समझकर तुरंत निर्णय ले सकता है, लेकिन लोकतंत्र का चुना हुआ प्रधानमंत्री अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबावों के तहत काम करता है। इसलिए कई बार चाहते हुए भी वो सब नहीं कर पाता, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। 

इन दोनों ही सवालों पर मेरा गत 30 वर्षों से पूरा समर्थन रहा है। पर मुझे लगता है कि ये मुद्दे राजनैतिक नहीं हैं। चुनावी भी नहीं हैं, क्योंकि जब इनको राजनीति से जोड़ा जाता है, तब ये और उलझ जाते हैं। ये बात सही है कि राम जन्मभूमि आंदोलन से भाजपा को भारत में बड़ा जनाधार मिला, लेकिन उसके बाद इस मुद्दे की राजनैतिक सार्थकता समाप्त हो गई। प्रमाण सामने है कि जब-जब इस मुद्दे को लेकर भाजपा ने राजनीति करनी चाही, तब-तब परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। इसलिए चाहे उत्तर प्रदेश का भावी चुनाव हो या अन्य किसी राज्य में, इन मुद्दों को अगर चुनाव से हटकर भारत के सांस्कृतिक उत्थान के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाए, तो इनके सफल होने की ज्यादा संभावना है। 

देशी गाय की सार्थकता, उसका वैज्ञानिक महत्व, उससे किसान को आर्थिक लाभ और बिना किसी धर्म के भेद के हर किसी व्यक्ति को होने वाले स्वास्थ्य लाभ, कुछ ऐसे स्वयंसिद्ध तथ्य हैं, जिनके कारण देशी गाय की हत्या पर प्रतिबंध अविलंब लगना चाहिए। मुसलमान हों, कम्युनिस्ट हों या गैर-भाजपाई राजनैतिक दल हों, किसी को भी इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो ऐसी राजनीति कर रहे हैं, वे या तो देशी गाय के इन गुणों से परिचित नहीं हैं या फिर परिचित होकर भी वे अपनी राजनीति के कारण गौहत्या प्रतिबंध को समर्थन नहीं देना चाहते। अगर यह वृत्ति है, तो मेरी दृष्टि में यह समाजद्रोह ही नहीं, देशद्रोह से कम नहीं है। मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपने सहपाठी रहे कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं, क्या तुमने देशी गाय के मूत्र के रोगों में उपयोग पर कोई जानकारी हासिल की है ? क्या तुमने देशी गाय के गोबर की खाद की कृषि के लिए उपयोगिता पर उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों को देखा है ? क्या तुमने गोरस के फायदों को जाना है ? अगर नहीं, तो खुले दिमाग से जान लो। अगर जानते हो, तो फिर तुम किस मुंह से गौहत्या का समर्थन करते हो ? कम्युनिस्ट हों या मुसलमान, जब तक वे अपनी राजनीति और धर्मांधता के चलते इन तथ्यों से मुंह मोड़ते रहेंगे, तब तक भारत का बहुसंख्यक समाज दारिद्र में जीता रहेगा। क्योंकि भारत सोने की चिड़िया था, जब इन मूल्यों का समाज में सम्मान था। जब से हमने भारत के इस ऋषिजन्य ज्ञान को तिलांजलि देकर औपनिवेशिक शासकों का थोपा हुआ पश्चिमी ज्ञान और जीवनशैली को अपनाया है, तब से हमारा समाज गरीब, बीमार, दुखी और त्रस्त होता चला गया है। 

कार्ल माक्र्स की तरह अगर आपको सर्वहारा की चिंता है, तो सर्वहारा के हित में आप लोगों को चाहिए कि गौवंश आधारित जीवनशैली अपनाने का संदेश सर्वहारा को दें। कार्ल माक्र्स ने अपना सिद्धांत प्रतिपादित करने के लिए जवानी के दो दशक पुस्तकों के ढेर में बिता दिए। उन्हें भारत की इस सार्वभौमिक संस्कृति को जानने का समय ही नहीं मिला। अगर मिलता तो वे अपने ग्रंथ ‘कैपिटल’ में एक अध्याय लिखते कि, ‘दुनिया के मजदूरो  अगर सुख से जीना चाहते हो, तो भारत की देशी गाय को जीवन में अपना लो।’ 

रही बात राम मंदिर की, तो हमने पिछले 30 वर्षों में बार-बार में यह लिखा और बोला है कि काशी, मथुरा और अयोध्या में भगवान शिव, भगवान राम और भगवान कृष्ण के मंदिरों का निर्माण होने से मुसलमानों का अहित नहीं होगा, बल्कि लाभ ही होगा। क्योंकि 500 वर्ष पहले जो खाई हिंदू-मुसलमानों के बीच बन गई, वह इस एक कदम से पट जाएगी। तब मुसलमान और हिंदू एक साथ खड़े होकर अपना और देश का जीवनस्तर उठाने की तरफ आगे बढ़ेंगे। आज पूरे विश्व का मुसलमान समाज पश्चिम की दादागिरी से दुखी है और नाराज है। भारत की सनातन संस्कृति में आस्था रखने वाला हिंदू समाज भी पश्चिमी संस्कृति से आहत और नाराज है। इस तरह हम हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि हम दोनों संस्कृतियों की दुश्मन पश्चिमी संस्कृति है, जिसे अपने जीवन से जितनी जल्दी हो और जितना ज्यादा निकाल दिया जाए, हमारा समाज सुखी और संपन्न हो जाएगा। यह बात दोनों धर्मों के धर्माचार्यों को भी समझनी चाहिए। सिंहस्थ कुंभ में स्नान करने के बाद बड़े पवित्र मन से मैं यह याचना दोनों धर्मों के धर्माचार्यों से कर रहा हूं, आगे हरि इच्छा। 

Monday, May 2, 2016

हेमामालिनी ब्रज की अभूतपूर्व सांसद बन सकती है

जब हेमा मालिनी का नाम लोकसभा चुनावों में मथुरा से सांसद के प्रत्याशी के रूप में घोषित हुआ, तो भाजपा के विरोधी खेमों में ही नहीं, बल्कि भाजपा में भी यह सुगबुगाहट थी कि एक फिल्मी अदाकारा ब्रज की क्या सेवा करेगी? लोग ये कहते थे कि वोट लेने के बाद हेमामालिनी के दर्शन अगले पांच वर्ष तक नहीं होंगे। अभी चुनाव हुए 2 वर्ष ही हुए है, लेकिन हर ब्रजवासी की जुबान पर हेमामालिनी का नाम हैं। इसलिए नहीं कि वे आये दिन ब्रज में हर मौके पर उपस्थित रहकर अपने ब्रजप्रेम का प्रदर्शन करती हैं। इसलिए भी नहीं कि उन्होंने ब्रज के गांवों के विकास की अपेक्षाओं को पूरा कर दिया, ऐसा तो वो क्या कोई भी सांसद नहीं कर सकता। बल्कि इसलिए कि उन्होंने ब्रज के लिए जो किया है, वैसा आजतक कोई सांसद नहीं कर पाया था।

यह भ्रान्ति है कि सांसद का काम सड़क और नालियां बनवाना है। झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में फंसने के बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सांसदों की निधि की घोषणा करने की जो पहल की, उसका हमने तब भी विरोध किया था। सांसदों का काम अपने क्षेत्र की समस्याओं के प्रति संसद और दुनिया का ध्यान आकर्षित करना हैं, कानून बनाने में मदद करना हैं, न कि गली-मौहल्ले में जाकर सड़क और नालियां बनवाना। कोई सांसद अपनी पूरी सांसद निधि भी अगर लगा दे तो एक गांव का विकास नहीं कर सकता। इसलिए सांसद निधि तो बन्द कर देनी चाहिए। यह हर सांसद के गले की हड्डी है और भ्रष्टाचार का कारण बन गई है।

हेमा मलिनी ने ब्रज को न सिर्फ समझा हैं, गले लगाया है बल्कि उसे अपने हृदय में उतार लिया है। पिछले दिनों उन्होंने वृन्दावन में अपनी दो नृत्य नाटिकाएं प्रस्तुत की, ’यशोदा कृष्ण ’व’ राधा-रासबिहारी’। इन प्रस्तुतियों में ब्रज का जो नैसर्गिक और सांस्कृतिक भाव हेमा जी ने प्रस्तुत किया, उसे देखकर हर ब्रजवासी मंत्रमुग्ध हो गया। इसमें आधुनिक तकनीकि का व्यापक इस्तेमाल किया गया। जो इस तरह के नाट्य बैले में उनकी संस्था ’नाट्य विहार कला केन्द्र, मुम्बई’ आज तक करती आई है। पर इसके साथ ही वृन्दावन की ’कान्हा एकेडमी’ के संचालक अनूप शर्मा ने अपना बौद्धिक सहयोग करके इस नृत्य नाटिका में ब्रज की माखन मिसरी घोल दी। दोनों के संयुक्त प्रयास से जो कुछ मंच पर प्रस्तुत किया गया वह काफी है पूरी दुनिया का ध्यान ब्रज की ओर आकर्षिक करने के लिए।

हेमाजी से जब भी ब्रज के विषय में चर्चा होती है, वे अपनी पीड़ा व्यक्त करना नहीं भूलती। उन्हें दुख है कि भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियों वाला ब्रज इतनी दुर्दशा को कैसे प्राप्त हो गया ? यही कारण है जब उन्होंने ’ब्रज फाउण्डेशन’ के जीर्णोंद्धार कार्यों को देखा तो वे दंग रह गई और सार्वजनिक मंच से कहा कि अब मैं ब्रज फाउण्डेशन के साथ मिलकर ब्रज सजाने का काम करूंगी। क्योंकि ब्रज फाउण्डेशन पिछले 15 वर्षों से ब्रज की जीर्ण-शीर्ण हो गई, लीलास्थलियों को ढूंढने, संवारने, सजाने और संरक्षण करने का काम बड़ी तत्परता और कलात्मकता से कर रही है। जिसकी सराहना वर्तमान प्रधानमंत्री व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक सार्वजनिक रूप से करते हैं।

अपनी नृत्य नाटिका के साथ ही अगर हेमामालिनी ब्रज फाउण्डेशन की एक पावर पॉइंट प्रस्तुति भी करवाती हैं तो दर्शकों को पता चलेगा कि जिस कोईलेघाट से वसुदेव जी बालकृष्ण को लेकर यमुना पार गोकुल गये थे, वो कैसा था और अब उसे फाउण्डेशन ने कैसा सुंदर बना दिया। इसी तरह जब हेमाजी की नृत्य नाटिका में कालियामर्दन की लीला का दृश्य आयेगा तो उसके बाद ही दर्शकों को दिखाया जाए कि इस लीला स्थली का स्वरूप कैसा था और अब उसे कितना निखार दिया गया। इस तरह एक तरफ कला व संगीत के साथ सौन्दर्यबोध कराया जायेगा तो दूसरी तरफ लीलास्थलियों की दुर्दशा की वास्तविक स्थिति दिखाकर पूरी दुनिया के कृष्णभक्तों और भारत प्रेमियों को ब्रज को सजाने-संवारने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। यदि हेमामालिनी ऐसा कर पाती हैं तो ब्रज विकास के कामों में गति आयेगी। यही एक सांसद का कार्य भी है कि वह अपने क्षेत्र के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करें। ब्रज में वैसे उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अलावा, राजस्थान का भरतपुर व हरियाणा के पलवल जिले का कुछ क्षेत्र भी आता है। प्रयास ऐसा होना चाहिए कि पूरे ब्रज का सौन्दर्यीकरण साथ हो। चाहे वो किसी भी राज्य के हिस्से में क्यों न हो। क्योंकि कान्हा की लीलास्थलियां पूरे ब्रज में हैं।

इससे पहले जो मथुरा के सांसद बने, वे सद्इच्छा रखते हुए भी राजनीतिज्ञ थे। कोई कलामर्मज्ञ या भक्त नहीं थे। इसलिए उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। हेमामालिनी कहने को राजनीतिज्ञ हैं। पर वास्तव वे एक उच्चकोटि की कलाकार और उससे भी उच्चकोटि की भक्त है। ऐसी शख्सियत आज ब्रज का संसद में प्रतिनिधित्व कर रही हैं, यह ब्रजवासियों के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। हेमामालिनी को भी अपनी शख्सियत के अनुसार ब्रज की ब्रान्ड एम्बेंसडर बनने की भूमिका और जोरदार तरीके से निभानी चाहिए।

पर प्रायः होता यह है कि मशहूर और शक्तिशाली लोगों से निहित स्वार्थ इस तरह चिपक जाते हैं, कि वे उनके चारों ओर एक दीवार खड़ी कर देते हैं। उन्हें गलत सूचनाएं देते हैं, उनकी ऊर्जा का अपव्यय करवाते हैं और उनसे अपने व्यावसायिक हित साधते हैं। हेमा जी को ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा और तलाशने होंगे वो लोग जिनका एकमात्र ध्येय ब्रज को सजाना और संवारना है। ऐसे लोगों के साथ जुड़कर वे ब्रज को बहुत कुछ दे सकती है। जो पहले कोई सांसद न दे पाया। कोई वजह नहीं कि ऐसा करने के बाद ब्रज की जनता उन्हें दुबारा संसद में न भेजें।