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Monday, November 13, 2017

न्यायपालिका के पतन के लिए प्र्रशांत भूषण कैसे जिम्मेदार?

उ. प्र. के मेडिकल कॉलेज दाखिले के घोटाले को लेकर चल रहे एक मामले में पिछले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका के वकील प्रशांत भूषण ने भारत के मुख्य न्यायाधीश पर अनैतिकता का  सीधा आरोप लगाकर हंगामा खड़ा कर दिया। जिसकी देश में काफी चर्चा है। प्रशांत भूषण के इस साहस की मैं भी प्रशंसा करता हूं। क्योंकि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि अगर कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायपालिका का सदस्य बन जाता है, तो वह भगवान (मी लॉर्ड) के समान हो जाता है। ये कोई भावनात्मक बयान नहीं है। मैंने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के तीन मुख्य न्यायाधीशों और एक न्यायाधीश के अनैतिक आचरण की खोज करके 1997-2002 के बीच बार-बार यह सिद्ध किया कि सर्वोच्च न्यायपालिका के भी कुछ सदस्य भ्रष्टाचार से अछूते नहीं है। अपने आरोपों के समर्थन में मैंने तमाम प्रमाण प्रकाशित किये थे और तत्कालीन पदासीन उन न्यायाधीशों के विरूद्ध अकेले वर्षों लंबा संघर्ष किया। विनम्रता से कहना चाहूंगा कि अब तक के भारत के इतिहास में किसी पत्रकार, वकील, आई ए. एस अधिकारी, सांसद व समाजिक कार्यकर्ता ने ऐसा संघर्ष नहीं किया।

अगर उस संघर्ष में प्रशांत भूषण और इनके स्वनामधन्य पिता शांति भूषण मेरे साथ धोका नहीं करते, तो भारत की न्यायपालिका के सुधार की ठोस शुरूआत आज से 20 वर्ष पहले ही हो गई होती। इसलिए मैं प्रशांत भूषण के हर साहसिक कदम का प्रंशसक होते हुए भी उनके पक्षपातपूर्णं व अनैतिक आचरण के कारण इन पिता-पुत्रों को न्यायपालिका के पतन के लिए जिम्मेदार मानता हूं।

इतने से संकेत भर से सरकार, न्यायपालिका और मीडिया से जुडे़ 40 बरस से ऊपर की आयु के हर व्यक्ति को वह दिन याद आ गया होगा। जब 14 जुलाई 1997 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने हमारी याचिका पर सुनवाई करते समय भरी अदालत में कहा था कि, ‘जैन हवाला मामले में हाथ खींचने के लिए हम पर जबरदस्त भारी दबाव है। लेकिन हम में से कोई पीछे नहीं हटेगा। लोग हम तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने मुझसे मिलने की कोशिश की। वहीं व्यक्ति मेरे साथी न्यायमूर्ति श्री एस सी सेन से मिला। श्री सेन काफी नर्वस हैं। मैंने उनसे इस बात को भूल जाने को कहा है। हम साफ कर देना चाहते हैं कि हवाला कांड की जांच की निगरानी जारी रहेगी। जिससे निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।’ मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि वह व्यक्ति उस समय अदालत में भी बैठा हुआ था।

मुख्य न्यायाधीश का यह खुलासा देशवासियों को सुनने में काफी बहादुरी भरा लगा। देश के टेलीविजन चैनलों और अखबारों ने इसे मुख्य खबर बनाया। पर जो बात सबको खटकी वो ये कि न्यायमूर्ति वर्मा ने भारत के इतिहास में देश की सर्वोच्च अदालत की सबसे बड़ी अवमानना करने वाले उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया और न ही उसे काई सजा दी। यह आश्चर्यजनक ही नही चिंताजनक व्यवहार था। इस प्रकार की स्वीकारोक्ति करने के लिए चूंकि मुख्य न्यायाधीश को मैंने 12 जुलाई 1997 को प्रमाण सहित एक चेतावनी भरा पत्र भेजकर मजबूर किया था, इसलिए मैं हर मंच पर मुख्य न्यायाधीश से उस अपराधी का नाम बताने की मांग करता रहा। बाद में यह मांग संसद से लेकर बार काउंसिल तक में उठाई गई। मीडिया में भी खूब शोर मचा। क्योंकि हवाला मामला आतंकवादियों के अवैध धन की आपूर्ति और भारत के सभी प्रमुख दलों के बड़े राजनेताओं और देश के उच्च अधिकारियों के अनैतिक आचरण से जुड़ा था। इसलिए ये मामला अत्यंत संवेदनशील था। इसलिए मुझे उस व्यक्ति का नाम उजागर करना पड़ा। बाद में न्यायमूर्ति वर्मा और न्यायमूर्ति सेन ने भी यह माना कि मेरा रहस्योद्घाटन सही था। पर फिर भी उस अपराधी को सजा नहीं दी गई। कारण स्पष्ट था कि वह व्यक्ति न्यायमूर्तियों पर दबाव नहीं डाल रहा था। बल्कि हवाला कांड के आरोपियों के हित में इन न्यायधीशों के साथ ‘डील’ कर रहा था।

देश की न्यायपालिका को पहली बार इतनी बुरी तरह झकझोरने वाले मेरे इस विनम्र प्रयास पर मेरा साथ देने की बजाय मेरे सहयाचिकाकर्ता प्रशांत भूषण और इनके पिता ने उन न्यायमूर्तियों का साथ दिया और मेरी पीठ में छुरा भोंक दिया। क्योंकि ये दोनों खुद उस समय राम जेठमलानी के साथ मिलकर लालकृष्ण आडवाणी व कांग्रेस के दर्जनों बड़े नेताओं को हवाला कांड से बरी कराने की साजिश कर रहे थे। 

अगर अपने स्वार्थों को पीछे छोड़कर इन पिता पुत्रों ने उस समय इस लड़ाई में साथ दिया होता, तो इस देश की राजनीति और न्यायपालिका का इतना पतन न हुआ होता। मैंने तो फिर भी हिम्मत नहीं हारी और फिर भारत के अगले मुख्य न्यायधीश बने डा. ए. एस. आनंद के 6 जमीन घोटाले अपने अखबार ‘कालचक्र’ में छापे और तमाम यातनाऐं भोगते हुए, बिना किसी की मदद के, न्यायपालिका में सुधार के लिए एक लंबा संघर्ष किया। तब से मेरा यही अनुभव रहा है कि राम जेठमलानी और उनके खास सहयोगी शांति भूषण और प्रशांत भूषण जो भी करते हैं, उसके पीछे कुछ न कुछ निहित स्वार्थ का ऐजेंडा जरूर होता है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और।

मैं आज भी यह मानता हूं कि सवा सौ करोड़ भारतीयों को न्याय की गारंटी देने वाली न्यायपालिका में भारी सुधार की जरूरत है। पर ये सुधार प्रशांत भूषण के पक्षपातपूर्णं रवैये से कभी नहीं आयेगा। अगर वाकई वे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना चाहते हैं, तो उन्हें 1997 में मेरे साथ की गई गद्दारी के लिए सार्वजनिक प्रयाश्चित करना होगा। साथ ही उन जैसे तमाम उन बड़े वकीलों को जिन्होंने हवाला कांड के कंधों पर चढ़कर अपनी राजनैतिक हैसियत बना ली, इस कांड की ईमानदार जांच की मांग करनी होगी। क्योंकि आतंकवाद और देशद्रोह से जुड़े, देश के इस सबसे राजनैतिक घोटाले को बिना जांच के ही, इन सब की साजिश से दबा दिया गया था और मैं अकेला अभिमन्यु कौरवों की सेना से लड़ते हुए, जिंदा शहीद करार कर दिया गया। जबकि इस केस के तमाम सबूत सीबीआई, सर्वोच्च न्यायालय और कालचक्र के कार्यालय में आज भी सुरक्षित हैं। क्या प्रशांत भूषण या आतंकवाद और भ्रष्टाचार के विरूद्ध डंका पीटने वाले कोई वकील, सांसद या राजनेता बिल्ली के गले में घंटी बांधने को तैयार हैं? मैं तो 62 वर्ष की उम्र में भी 26 वर्ष के नौजवान की तरह, खम ठोकने को तैयार हूं।

Monday, October 30, 2017

किसानों के साथ धोखाधड़ी


हमारे देश में अगर कोई सबसे अधिक मेहनत करता है, तो वो इस देश के किसान हैं, जो दिन-रात, जाड़ा, गर्मी और बरसात झेलकर फसल उगाते हैं और 125 करोड़ देशवासियों का पेट भरते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षा भी उनकी ही होती है। चुनावों के माहौल में हर राजनैतिक दल किसानों के दुख-दर्द का रोना रोता है और ये जताने की कोशिश करता है कि मौजूदा सरकार के शासन में किसानों का बुरा हाल है और वो आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। जबकि हकीकत यह है कि वही राजनैतिक दल जब सत्ता में होते हैं, तो ऐसी नीतियां बनाते हैं, जिनसे किसान की तरक्की हो ही नहीं सकती। चाहे वह बिजली की आपूर्ति हो या सिंचाई के जल की, चाहे वह समर्थन मूल्य की बात हो या खाद के दाम की। हर नीति की नींव में एक बड़ा घोटाला छिपा होता है। जिसका खामियाजा, इस देश के करोड़ों किसानों को झेलना पड़ता है। जबकि इन नीतियों को बनाने वाले नेता और अफसर, मोटी चांदी काटते हैं।


दरअसल किसानों के प्रति उपेक्षा का ये भाव सत्ताधीशों का ही नहीं होता, हम सब शहरी लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अब मीडिया को ही ले लीजिए, अखबार हो या टी.वी., कुल खबरों की कितनी फीसदी खबर, किसानों की जिंदगी पर केंद्रित होती हैं? सारी खबरें औद्योगिक जगत, बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां, सिनेमा या खेल पर केंद्रित होती है। किसानों पर खबर नहीं होती, किसान खुद खबर बनते हैं, जब वे भूख से तड़प कर मरते हैं या कर्ज में डूबकर आत्महत्या करते है।


ये कैसा समाजवाद है? कहने को श्रीमती गांधी ने भारतीय संविधान में संशोधन करके समाजवाद शब्द को घुसवाया। पर क्या यूपीए सरकार की नीतियां ऐसी थीं कि किसानों की दिन-दूगनी और रात-चैगुनी तरक्की होती? अगर ऐसी हुआ होता, तो किसानों की हालत इतनी खराब कैसे हो गयी कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये? ये रातों-रात तो हुआ नहीं, बल्कि वर्षों की गलत नीतियों का परिणाम है। हमारी सरकारों ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बजाए, याचक बना दिया। ताकि वो हमेशा सत्ताधीशों के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहे। छोटे-छोटे कर्जों में डूबा किसान तो अपनी इज्जत बचाने के लिए आत्महत्या करता आ रहा है, पर क्या किसी उद्योगपति ने बैंकों का कर्जा न लौटाने पर आत्महत्या की? लाखों-करोडों का कर्जा उद्योग जगत पर है। पर उन्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि वे मंहगे वकील खड़े करके, बैंकों को मुकदमों में उलझा देते हैं। जिसमें दशकों का समय यूं ही निकल जाता है।


प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लग रहा है कि उनकी परोक्ष मदद के कारण अंबानी और अडानी की प्रगति दिन-दूनी और रात-चैगुनी हो रही है। पर क्या ये बात किसी से छिपी है कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी अंबानी समूह की बेइंतहां वृद्धि हुई? सारा औद्योगिक जगत ये तमाशा देखता रहा कि कैसे सरकार से निकटता का लाभ लेकर, धीरूभाई अंबानी ने ये विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया था।  इसमें नया क्या है?


मैं पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हूं। मैं मानता हूं कि व्यक्तिगत पुरूषार्थ के बिना, आर्थिक प्रगति नहीं होती। सरकारों की सहायता पर पलने वाला समाज कभी आत्मविश्वास से नहीं भर सकता। वह हमेशा परजीवि बना रहेगा। साम्यवादी देश इसका स्पष्ट उदाहरण है। जबकि पूंजीपति बुद्धि लगाता है, मेहनत करता है, खतरे मोल लेता है और दिन-रात जुटता है, तब जाकर उसका औद्योगिक साम्राज्य खड़ा होता है। इसलिए पूंजीपतियों की प्रगति का विरोध नहीं है। विरोध है, उनके द्वारा गलत तरीके अपनाकर धन कमाना और टैक्स की चोरी करना। इससे समाज का अहित होता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ऐसी व्यवस्था लाना चाह रहे हैं, जिससे टैक्स की चोरी भी न हो और लोग अपना आर्थिक विकास भी कर सकें। इस तरह सरकार के पास, सामाजिक कार्यों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हो जायेंगे।

 
हर परिवर्तन कुछ आशंका लिए होता है। ढर्रे पर चलने वाले लोग, हर बदलाव का विरोध करते हैं। परंतु बदलाव अगर उनकी भलाई के लिए हो, तो क्रमशः उसे स्वीकार कर लेते हैं। आज देश के समझदार लोगों को किसानों और देश की आर्थिक स्थिति पर मंथन करना चाहिए और ये तय करना चाहिए कि भारत का आर्थिक विकास किस माडल पर होगा? क्या देश का केवल औद्योगिकरण होगा या किसानों मजदूरों के आर्थिक उत्थान को साथ लेकर चलते हुए औद्योगिक विकास होगा? क्योंकि समाज के बहुसंख्यक लोगों को अभावों में रखकर मुट्ठीभर लोग वैभव पर एकाधिकार नहीं कर सकते। उन्हें गांधी जी के ‘ट्रस्टीशिप’ वाले सिद्धांत को मानना होगा। जिसका मूल है कि धन इसलिए कमाना है कि हम समाज का भला कर सकें। ऐसी सोच विकसित होगी, तो किसान भी खुश होगा और शेष समाज भी।



भारत के आर्थिक विकास के माडल पर बहुत कुछ सोचा-लिखा जा चुका है। उसी पर अगर एकबार फिर मंथन कर लिया जाए, तो तस्वीर साफ हो जायेगी। जरूरत है कि हम विकास के पश्चिमी माडल से हटकर देशी माडल को विकसित करें, जिसमें सबका साथ हो-सबका विकास हो।

Monday, June 12, 2017

एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा

जिस दिन एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा पड़ा, उसके अगले दिन एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान भाजपा के प्रवक्ता का दावा था कि सीबीआई स्वायत्त है। जो करती है, अपने विवेक से करती है। मैं भी उस पैनल पर था, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। सीबीआई कभी स्वायत्त नही रही या उसे रहने नहीं दिया गया। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसे अपने अधीन ले लिया था, तब से हर सरकार इसका इस्तेमाल करती आई है। 



रही बात एनडीटीवी के मालिक के यहां छापे की तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि डा. प्रणय रॉय एक अच्छे इंसान हैं। मेरा उनका 1986 से साथ है, जब वे दूरदर्शन पर ‘वल्र्ड दिस वीक’ एंकर करते थे और मैं ‘सच की परछाई’। तब देश में निजी चैनल नहीं थे। जैसा मैंने उस शो में बेबाकी से कहा कि 1989 में कालचक्र वीडियो मैग्जी़न के माध्यम से देश में पहली बार स्वतंत्र हिंदी टीवी पत्रकारिता की स्थापना करने के बावजूद, आज मेरा टीवी चैनल नहीं है। इसलिए नहीं कि मुझे पत्रकारिता करनी नहीं आती या चैनल खड़़ा करने का मौका नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि चैनल खड़ा करने के लिए बहुत धन चाहिए। जो बिना सम्पादकीय समझौते किये, संभव नहीं था। मैं अपनी पत्रकारिता की स्वतंत्रता खोकर चैनल मालिक नहीं बनना चाहता था। इसलिए ऐसे सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर दिये। 



एनडीटीवी के कुछ एंकर बढ़-चढ़कर ये दावा कर रहे हैं कि उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला हो रहा है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि ‘गोधरा कांड’ के बाद, जैसी रिपोर्टिंग उन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ की, क्या वैसे ही तेवर से उन्होंने कभी कांग्रेस के खिलाफ भी अभियान चलाया ? जब मैंने हवाला कांड में लगभग हर बड़े दल के अनेकों बड़े नेताओं को चार्जशीट करवाया, तब वे सब चैनलों पर जाकर अपनी सफाई में तमाम झूठे तर्क और स्पष्टीकरण देने लगे। उस समय मैंने उन सब चैनलों के मालिकों और एंकरों को इन मंत्रियों और नेताओं से कुछ तथ्यात्मक प्रश्न पूछने को कहा तो किसी ने नहीं पूछे। क्योंकि वे सब इन राजनेताओं को निकल भागने का रास्ता दे रहे थे। ऐसा करने वालों में एनडीटीवी भी शामिल था। ये कैसी स्वतंत्र पत्रकारिता है? जब आप किसी खास राजनैतिक दल के पक्ष में खड़े होंगे, उसके नेताओं के घोटालों को छिपायेंगे या लोकलाज के डर से उन्हें दिखायेंगे तो पर दबाकर दिखायेंगे। ऐसे में जाहिरन वो दल अगर सत्ता में हैं, तो आपको और आपके चैनल को हर तरह से मदद देकर मालामाल कर देगा। पर जिसके विरूद्ध आप इकतरफा अभियान चलायेंगे, वो भी जब सत्ता में आयेगा, तो बदला लेने से चूकेगा नहीं। तब इसे आप पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला नहीं कह सकते।



सोचने वाली बात ये है कि अगर कोई भी सरकार अपनी पर उतर आये और ये ठान ले कि उसे मीडियाकर्मियों के भ्रष्टाचार को उजागर करना है, तो क्या ये उसके लिए कोई मुश्किल काम होगा? क्योंकि काफी पत्रकारों की आर्थिक हैसियत पिछले दो दशकों में जिस अनुपात में बढ़ी है, वैसा केवल मेहनत के पैसे से होना संभव ही न था। जाहिर है कि बहुत कुछ ऐसा किया गया, जो अपराध या अनैतिकता की श्रेणी में आता है। पर उनके स्कूल के साथियों और गली-मौहल्ले के खिलाड़ी मित्रों को खूब पता होगा कि पत्रकार बनने से पहले उनकी माली हालत क्या थी और इतनी अकूत दौलत उनके पास कब से आई। ऐसे में अगर कभी कानून का फंदा उन्हें पकड़ ले तो वे इसेप्रेस की आजादी पर हमला’ कहकर शोर मचायेंगे। पर क्या इसे ‘प्रेस की आजादी पर हमला’ माना जा सकता है?



अगर हमारी पत्रकार बिरादरी इस बात का हिसाब जोड़े कि उसने नेताओं, अफसरों या व्यवसायिक घरानों की कितनी शराब पी, कितनी दावतें उड़ाई, कितने मुर्गे शहीद किये, उनसे कितने मंहगे उपहार लिए, तो इसका भी हिसाब चैकाने वाला होगा। प्रश्न है कि हमें उन लोगों का आतिथ्य स्वीकार ही क्यों करना चाहिए, जिनके आचरण पर निगेबानी करना हमारा धर्म है। मैं पत्रकारिता को कभी एक व्यवसायिक पेशा नहीं मानता, बल्कि समाज को जगाने का और उसके हक के लिए लड़ने का हथियार मानता रहा हूं। प्रलोभनों को स्वीकार कर हम अपनी पत्रकारिता से स्वयं ही समझौता कर लेते हैं। फिर हम प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला कहकर शोर क्यों मचाते हैं



सत्ता के विरूद्ध अगर कोई संघर्ष कर रहा हो, तो उसे अपने दामन को साफ रखना होगा। तभी हमारी लड़ाई में नैतिक बल आयेगा। अन्यथा जहां हमारी नस कमजोर होगी, सत्ता उसे दबा देगी। पर ये बातें आज के दौर में खुलकर करना आत्मघाती होता है। मध्य युग के संत अब्दुल रहीम खानखाना कह गये हैं, ‘अब रहीम मुस्किल परी, बिगरे दोऊ काम। सांचे ते तौ जग नहीं, झूंठे मिले न राम’।। जो सच बोलूंगा, तो दुनिया मुझसे रूठेगी और झूंठ बोलूंगा तो भगवान रूठेंगे। फैसला मुझे करना है कि दुनिया को अपनाऊं या भगवान को। लोकतंत्र में प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला एक निंदनीय कृत्य है। पर उसे प्रेस का हमला तभी माना जाना चाहिए जबकि हमले का शिकार मीडिया घराना वास्तव में निष्पक्ष सम्पादकीय नीति अपनाता हो और उसकी सफलता के पीछे कोई बड़ा अनैतिक कृत्य न छिपा हो।


Monday, January 16, 2017

डायरी रिश्वत का सबूत कैसे है

     कैसा इत्तफाक है कि आज से ठीक 21 वर्ष पहले 16 जनवरी 1996 को देश की राजनीति को पहली बार पूरी तरह झकझोर देने वाले हवाला कांड की बारिकियों को आज मुझे फिर प्रस्तुत करना पड़ रहा है। सहारा डायरियों के मामले में प्रशांत भूषण की बात सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं मानी। न्यायालय का मत था कि केवल डायरी के आधार पर प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई जांच नहीं की जा सकती। साथ ही न्यायालय ने ‘विनीत नारायण केस’ का भी हवाला देते हुए कहा कि कहीं ऐसा न हो कि बाद में सब आरोपी बरी हो जाऐं।

     मुझे सहारा डायरियों के विषय में कोई जानकारी नहीं है इसलिए मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। किंतु हवाला केस का जिक्र जिस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने किया है, उससे मैं असहमत हूं। जैन डायरी हवाला कांड में आरोपी नेता सबूतों के अभाव में आरोप मुक्त नहीं हुए थे। बल्कि सी.बी.आई. की आपराधिक साजिश के कारण वे छूट गये। जिसमें मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की भूमिका भी संदेहास्पद रही। यह सारे तथ्य मेरी पुस्तक 'भ्रष्टाचार, आतंकवाद और हवाला कारोबार’ में प्रमाणों के सहित दिये गये। इस पुस्तक को vineetnarain.net वेवसाईट पर निशुल्क पढ़ा जा सकता है।

     जहां तक जैन डायरियों की वैधता का सवाल है। सुप्रीम कोर्ट ने इन डायरियों की अहमियत समझ कर ही दिसम्बर 1993 में इस मामले को जाँच के लिए स्वीकार किया था तथा सी.बी.आई. को इस मामले से जुड़े और तथ्यों का पता लगाने का आदेश दिया था।

     सुप्रीम कोर्ट ने इस डायरी को एक सीलबंद लिफाफे में रखकर न्यायालय के पास जमा करने के आदेश दिए। आपराधिक मामले की किसी जाँच के दौरान छापे में बरामद दस्तावेजों को सुरक्षा की दृष्टि से न्यायालय में जमा कराने की यह पहली घटना थी। इतना ही नहीं, इन दस्तावेजों को रखने वाले लॉकरों की चाबियों की सुरक्षा की भी सर्वोच्च न्यायालय ने माकूल व्यवस्था की थी। जाहिर है कि इन डायरियों का हवाला केस के लिए भारी महत्त्व था। तो फिर ये सबूत कैसे नहीं हैं ?

     इस केस की सुनवाई के दौरान सी.बी.आई. की सीमाओं को महसूस करते हुए व इस डायरी की अहमियत समझ कर ही सुप्रीम कोर्ट ने हवाला केस की जाँच को पाँच वकीलों की एक निगरानी समिति को सौंपने का लगभग मन बना लिया था। पर भारत सरकार के वकील की पैरवी और जाँच एजेंसियों की तरफ से ईमानदारी से ठीक जाँच करने का आश्वासन मिलने के बाद सी.बी.आई. व अन्य एजेंसियों को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जाँच करने के आदेश दिए थे। इसी से सिद्ध होता है कि ये डायरियाँ कितनी महत्त्वपूर्ण हैं।

     ये डायरियाँ साधारण नहीं हैं। हिसाब-किताब रखने व नियमित रूप से लिखी जाने वाली ये डायरियाँ बाकायदा 'खाता पुस्तकें ' हैं। ये डायरियाँ जैन बंधुओं के यहाँ अचानक डाले गए छापे में मिली थीं। किसी ने साजिशन वहाँ नहीं रखी थीं। राजनेताओं से जैन बंधुओं के संपर्क जगजाहिर हैं। जैन बंधु जैसे लोगों से धन लेना राजनीतिक दायरों में कोई नई बात नहीं है। चूंकि इतने ताकतवर लोगों से जैन बंधुओं का व्यक्तिगत संबंध है, इसलिए वे ख्वाब में भी उम्मीद नहीं कर सकते थे कि उनके यहाँ भी कभी सी.बी.आई. का छापा पड़ सकता है। इसलिए वे बेखौफ अपना कारोबार चला रहे थे कि अचानक आतंकवादियों के आर्थिक स्रोत ढ़ूढ़ते-ढ़ूंढ़ते सी.बी.आई. वाले उनके यहाँ आ धमके। जैन बंधुओं की किसी से दुश्मनी तो थी नहीं जो वे उसका नाम अपने खाते में दर्ज करते। जिससे उनका जैसा लेना-देना था, वैसी ही प्रविष्टियाँ इन खातों में दर्ज हैं। यहाँ तक कि कई जगह तो चेक से किए गए भुगतान भी दर्ज हैं, जो इन डायरियों की वैधता को स्थापित करता है। फिर विभिन्न दलों के कोई दर्जन भर राजनेता स्वीकार कर चुके हैं कि उनके नाम के सामने जैन खातों में दर्ज रकम ठीक लिखी गई है। ये रकमें उन्हें वाकई जैन बंधुओं से मिली थीं। सुरेंद्र जैन भी 11 मार्च 1995 में दिए गए अपने विस्तृत लिखित बयान में यह बात स्वीकार कर चुके हैं। 

    कैसा विरोधाभास है कि पैसा देने वाला स्वीकार कर रहा है, पैसा लेने वाले स्वीकार कर रहे हैं, नकदी और विदेशी मुद्रा छापे में बरामद हो रही है, फिर भी इस पूरे अवैध लेन-देन का नंबर दो में हिसाब रखने वाली खाता पुस्तकों को भ्रष्टाचार के मुकदमों में नाकाफी सबूत बता कर मुकदमा खारिज कर दिया गया। टाडा, फेरा आदि के मुकदमे तो साजिशन कायम ही नहीं हुए ।

     इन खाता पुस्तकों में दर्ज बहुत-सी रकम तो 1989 व 1991 के आम चुनावों की पूर्व-संध्या को जैन बंधुओं ने बांटी थी। कौन-सा राजनीतिक दल है, जो अपनी आमदनी-खर्च का सही हिसाब रखता हो, इसलिए जो राजनेता इस कांड को अपने विरुद्ध षड्यंत्र बताते आए हैं, दरअसल तो उन्होंने देश के साथ बहुत बड़ी गद्दारी की है, क्योंकि अपने स्वार्थ में उन्होंने आतंकवाद को वित्तीय मदद मिलने की जाँच को ही दबवा दिया और आतंकवाद की जड़ तक पहुँचने का रास्ता बंद कर दिया।

    इसके अलावा, यह तथ्य भी महत्त्वपूर्ण है कि उग्रवादियों को विदेशी स्तोत्रों से धन मिलने के मामले की जाँच के दौरान ही हवाला कारोबारी शंभूदयाल शर्मा ने जाँचकर्ताओं को बताया कि वह जैन बंधुओं से लेन-देन करता था। तभी जैन बंधुओं के यहाँ छापा पड़ा। पर क्या वजह है कि डायरियाँ बरामद होने के बाद जैन बंधुओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जबकि सामान्य तौर पर यह बहुत स्वाभाविक बात थी, सी.बी.आई. को यह अधिकार किसने दिया कि वह शाहबुद्दीन गोरी और अशफाक हुसेन लोन को तो टाडा का अपराधी माने, किंतु जैन बंधुओं, उनसे पैसा पाने वाले राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को छोड़ दें? जबकि मुम्बई बम विस्फोट कांड में सी.बी.आई. ने बहुत-से लोगों को इससे कहीं कम सबूत के आधार पर ही टाडा में गिरफ्तार कर लिया था?

      यहाँ यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि कश्मीर के आतंकवादियों को मदद पहुंचाने वाले, जिन दो नौजवानों अशफाक हुसेन लोन और शाहबुद्दीन गौरी को, लाखों रुपए के साथ 25 मार्च 1991 में पकड़ा गया था, उनके खिलाफ चार्जशीट में सी.बी.आई. वालों ने साजिशन 3 मई 1991 को हुई जब्तियों व डायरियों का जिक्र नहीं किया, क्यों? जाहिर है कि ऐसा करके सी.बी.आई. को आगे भी जाँच करनी पड़ती, जिसमें देश के बड़े-बड़े नेताओं के यहाँ 1991 में ही छापे पड़ जाते और उनमें से बहुतों को जेल जाना पड़ता। ऐसी हिम्मत सी.बी.आई. में तब नहीं थी।

     कुल मिला कर बात साफ है कि जैन डायरियाँ कुछ मामलों में पूरा सबूत हैं और कुछ में आगे जाँच की जरूरत है। पर यह सरासर गलत है कि इस मामले में कोई सबूत ही नहीं है, इसलिए नेता छूटते गए।

Monday, October 10, 2016

Only God can save the Civil Aviation Ministry


While the storm of scams confronting Jet Airways and Ministry of Civil Aviation had not subsided, a new tornado has gained traction. Earlier 131 pilots of Jet Airways were fiddling with the lives of passengers by flying planes without the requisite pilot proficiency check (PPC). The RTI filed by Kalchakra News Bureau led to this expose. These pilots were grounded and suspended with mere warning. This is not the lone matter in which the unholy nexus between the Ministry of Civil Aviation and its subordinate Directorate General Civil Aviation (DGCA) with that of private airlines has come to the fore. Whether it’s the integrity of pilot proficiency checks or the grant of licenses to fly, the entire spectrum is smeared with irregularities & profound aberrations. The senior officials of the ministry seem to be turning a blind eye and a deaf ear to this entire escapade. Any recommendation coming from the top bosses of the private airlines, is considered a dictum which has to be heeded by all means. It’s but obvious that nobody shall extend such out of turn favors without getting a bounty of personal gains.


The case of Ms. Parul Sachdev is quite striking to bring home the aforesaid state of affairs. Ms. Sachdev presented her educational credentials from a Board of Education which was not recognized by the Government. She passed off the Central Board of Secondary Education (CBSE) for Central Board of Higher Education (CBHE) to obtain the pilot’s license and went on to fly for years. This poses severe questions on the probity & process of scrutiny & validation of documents on part of the learned officials of the Ministry and its associated departments.


This matter too came to light as an eventual outcome of a RTI application filed by Kalchakra News Bureau seeking the PPC of pilots of private airlines. This forced the Ministry to conduct an audit of the licenses of the pilots of various airlines. This precipitated half-baked and incomplete action against Ms. Sachdev as well. Instead of getting her license revoked and getting a case of forgery filed under relevant section of IPC, Sh. R N Choubey, the current Civil Aviation Secretary in his order dated September 16th, 2016 mandated for a suspension for 2 years instead of 5 years as prescribed under rule 39(1) of the Civil Aviation Rules 1937. He went on to suggest that Ms. Sachdev can get her papers in proper shape in these 2 years of suspension.  


What a mockery of the entire set of the laid down procedures of probity? When you can’t establish even your basic qualifications, how can you be issued a license in the first place? How can your certificates issued from non-recognized bodies be accepted as bonafides? If not, isn’t the revocation of the license issued, the best course of natural justice.


You may recall the Mangalore tragedy whereby the plane went off the airstrip while landing. Why did that accident happened at all? If you pay heed to the pilots, they would say that landing at Mangalore is no mean task. It requires precision of the highest order which only an alert & duly energised pilot can manage. This is the very reason that pilots under a state of exhaustion and fatigue are not allowed to fly. But it seems that for Jet Airways, complying with this rule has not much value as well. As per DGCA rules, every pilot has to undergo a compulsory rest of 12 hours before undertaking a flight where the time zone difference between the departure and destination is less than 3 hours (as is the case with Hong Kong).


A senior pilot as well as an examiner of Jet Airways Manoj Mahna set out a distinctive record of flouting the aforesaid rule on September 3rd, 2015. He flew as an additional crew member on the 8 am flight from Mumbai - Delhi, attended a number of meetings and returned back to Mumbai from Delhi by the 5 pm flight in the same fashion as an additional crew member. On the night of the same day he took off the late night 1.20 am flight from Mumbai to Hong Kong as a captain which landed at 9.40 am (IST) at Hong Kong. This was a gross violation of DGCA rules of undertaking adequate rest before taking off a commercial flight.


When Kalchakra News Bureau took up this case, every official worth his credence found Captain Mahna guilty and recommended for the most severe of the action. It’s not that Captain Mahna broke the rule book for the first time. He was found guilty of the same offence in 2006 as well.


Section 7 of the Civil Aviation Rules and the Indian Aircraft Act, 1934 call for a punishment of 2 years and a fine of Rs. 10 lakhs for this gross violation. Nonetheless, the Ministry of Civil Aviation in its order dated March 1st 2016 extended a suspension of only 1 year instead of 2 which was later on reduced to a mere 6 months complying with injunctions issued from Jet Airways, which is known to run the writ at this important ministry.


In yet another case of murky nexus of Ministry of Civil Aviation officials with private interests is that of the GVK group which operates a major airport in the country. The existing Secretary of the Ministry has went out of the way to give a clearance to the GVK group which has serious implications to national security. Whether it’s a private airlines or a private airport operator, it’s senior officials need to undergo a mandatory security clearance from the Home Ministry.


For instance, when Kalchakra News Bureau exposed the non-compliance of security clearance of Captain Hamid Ali, Jet Airways had to remove Captain Ali from the post of its CEO/COO at once. This flouting of security clearance from Home Ministry is going on in the case GVK Group’s Board of Directors as well. The Ministry of Civil Aviation is overlooking the same and is extending out of the way benefits to the group.


Why is it that the current Civil Aviation Secretary Sh. R N Choubey is flouting all laid down norms and protocols to extend out of the way benefits to private airlines or other private operators in the domain of Civil Aviation?


At a time when air travel has expanded by multitudes, the responsibility of the Ministry of Civil Aviation has increased all the more. Instead of flouting the well thought out norms of safety & security, the Ministry needs to implement them in letter and spirit. The passengers would otherwise be left out with no option but to travel with faith in the Lord alone.

Monday, December 28, 2015

प्रधानमंत्री, आडवाणीजी और हवाला कांड

 पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरूण जेटली से संबंधित भ्रष्टाचार के आरोपों को यह कहकर खारिज कर दिया कि जेटली भी उसी तरह इन आरोपों से मुक्त हो जाएंगे, जैसे आडवाणीजी हवाला कांड में मुक्त हो गए थे। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि आडवाणी जी को कांग्रेसियों ने हवाला कांड में फंसाया था। शायद प्रधानमंत्रीजी को ब्रिफिंग देने वालों ने ठीक तथ्य नहीं बताए, वरना वे ऐसा न कहते। यह इतफाक है कि 16 जनवरी, 1996 को भारत के इतिहास में पहली बार दर्जनों केंद्रीय मंत्री (कांग्रेस), विपक्ष के नेता (भाजपा, जनता दल आदि) व आला अफसर जैन हवाला कांड में सीबीआई द्वारा आरोपित हुए थे और उन्हें अपने पदों से इस्तीफे देने पड़े थे। अगले 2 हफ्तों में इस ऐतिहासिक घटना को पूरे 20 वर्ष हो जाएंगे।

इस दौरान भ्रष्टाचार, आतंकवाद और हवाला कारोबार घटने की बजाय कई गुना बढ़ा है। इसलिए 16 जनवरी, 2016 को पूरे देश में यह चिंतन होना चाहिए कि आखिर सीबीआई व अदालतों के बावजूद ऐसा क्यों हो रहा है ? रही बात आडवाणी जी के आरोपमुक्त होने की, तो उन्हें किन हालातों में आरोपमुक्त किया गया, यह बात उस समय से ऐसे मामलों पर निगाह रखने वाले राजनेता, पत्रकार, वकील और अधिकारी सब जानते हैं। नई पीढ़ी के लिए भी इसे जानना मुश्किल नहीं है। www.vineetnarain.net बेवसाइट पर जाकर मेरी हिंदी पुस्तक ‘भ्रष्टाचार, आतंकवाद और हवाला कारोबार’ पढ़ी जा सकती है। जिसमें इस कांड को लेकर सर्वोच्च न्यायपालिका तक के अनैतिक आचरण का सप्रमाण खुलासा किया गया है। फिर भी कुछ बिंदु यहां याद दिलाना उचित रहेगा। हवाला कांड को अपनी कालचक्र वीडियो मैग्जीन के माध्यम से (उन दिनों निजी टीवी चैनल नहीं थे) उजागर करने का जोखिम 1993 में मैंने ही उठाया था और पूरी व्यवस्था के विरूद्ध अकेले शंखनाद कर किया था। इसमें सबसे ज्यादा तो कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री व राज्यपाल आरोपित हुए थे, तो फिर ये कांग्रेस का षडयंत्र कैसे हो सकता है ?

 आडवाणीजी उन दिनों लोकसभा में विपक्ष के नेता थे। अगर यह षडयंत्र था, तो उन्होंने 1993 से 1996 के बीच (जब यह केस चलता रहा) लोकसभा में इस पर आवाज क्यों नहीं उठाई ? इससे पहले बोफोर्स को लेकर तो वे बहुत आक्रामक रहे थे। हवाला कांड तो कश्मीर के हिजबुल मुजाहिद्दीन नामक आतंकवादी संगठन के दुबई और लंदन से आने वाले अवैध धन के हवाला कारोबार से जुड़ा मामला था। फिर आडवाणीजी ने देशद्रोह के इस कांड की ईमानदारी से जांच करवाने की मांग कभी क्यों नहीं की ? 1997 और 1999 में मैंने सार्वजनिक रूप से दो प्रश्नावलियां जारी की थीं, जिन्हें उक्त पुस्तक में भी पढ़ा जा सकता है। इन प्रश्नावलियों में मैंने आडवाणीजी से देशद्रोह के इस कांड पर खतरनाक चुप्पी साधने की वजह पूछी थी। जिनका उत्तर उन्होंने आजतक नहीं दिया। यह बात दूसरी है कि उन्हीं के सहयोगी और हवाला कांड में आरोपित हुए दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने खुलकर स्वीकार किया था कि यह पैसा उन्होंने और आडवाणीजी ने सुरेंद्र जैन से चुनावों के लिए लिया। आज की चुनावी व्यवस्था ही ऐसी है कि अगर आप मोटा पैसा नहीं खर्च कर सकते तो आप चुनाव नहीं जीत सकते। अगर आडवाणीजी भी यह बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेते, तो उनको इतना सबकुछ न झेलना पड़ता। दूसरी तरफ देवीलाल, शरद यादव और राजेश पाइलट ने सार्वजनिक रूप से यह मान लिया था कि उनके नाम के आगे जैन बंधुओं के खातों में जो रकम लिखी है, वह सही है और उन्होंने जैन बंधुओं से यह ली थी। इस तरह जैन डायरी (अवैध खाते) की विश्वसनीयता भी स्थापित हो जाती है, क्योंकि उसमें वही दर्ज है, जो वास्तव में लेन-देन हुआ।

 इस केस का एक रोचक पहलु और भी है। जरा-जरा सी बात पर संसद को हफ्तों न चलने देने वाले सांसद हर घोटाले पर जमकर शोर मचाते रहे हैं। पर, हवाला कांड को लेकर किसी भी दल ने आजतक कोई आंदोलन नहीं चलाया और न ही संसद में हंगामा किया। क्योंकि जब हर बड़े दल के नेता इस कांड में शामिल हैं, तो कौन किसके खिलाफ शोर मचाता ? इसलिए हवाला कांड आजतक उजागर हुए सभी घोटालों से अलग और बड़ा है। क्योंकि इसमें देश के महत्वपूर्ण राजनेता शामिल रहे हैं।

 इस केस का एक और रोचक पहलु यह है कि 1993 में जब मैंने इस मामले को लेकर सीबीआई की निष्क्रियता के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी, तब मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने इसी जैन डायरी की महत्ता बताते हुए कहा था कि, ‘ये इतने बड़े सुबूत हैं कि अगर इसके बावजूद हम आरोपियों को सजा न दे पाएं, तो हमें देश की अदालतें बंद कर देनी चाहिए।’ पर जब 1996 में जस्टिस जेएस वर्मा को आरोपियों द्वारा प्रभावित कर लिया गया, तो वही अदालत कहने लगी कि इस केस में कोई सुबूत ही नहीं है। क्योंकि जस्टिस वर्मा के जैन बंधुओं से मुकदमे के दौरान हुए मेलजोल का भी खुलासा मैंने 1997 में किया था और जस्टिम वर्मा को यह मानना पड़ा कि मेरे आरोप सही थे और वे उस व्यक्ति से मिलते रहे थे। 

 कुल मिलाकर यह मामला बहुत गंभीर है। क्योंकि यह राष्ट्र की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़ा है, फिर भी इसकी आजतक जांच नहीं हुई। आज भी हर नेता इसका नाम लेने से बचता है। इसी से इसकी महत्ता सिद्ध होती है। उपरोक्त तथ्यों को जानने के बाद और मेरी पुस्तक आॅनलाइन पढ़ने के बाद आप खुद ही फैसला कर लेंगे कि आडवाणजी न तो किसी षडयंत्र में फंसाए गए थे और न ही उनको नैतिक रूप से आरोपमुक्त किया गया था। आशा है कि प्रधानमंत्रीजी अपनी भूल सुधार करेंगे। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध लड़ने की शपथ लेकर इस पद पर आरूढ़ हुए मोदीजी से देश की अपेक्षा है कि जैन हवाला कांड की ईमानदार जांच के आदेश दें, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाए। आपराधिक मामलों में जब तक केस पूरी तरह बंद न हो जाए, दोबारा खोला जा सकता है। जैन हवाला केस आजतक ईमानदार जांच का इंतजार कर रहा है।
 

Monday, October 19, 2015

जेट एयरवेज़ कर रहा है यात्रियों से धोखा और मुल्क से गद्दारी

    पिछले वर्ष सारे देश के मीडिया में खबर छपी और दिखाई गई कि जेट एयरवेज़ को अपने 131 पायलेट घर बैठाने पड़े। क्योंकि ये पायलेट ‘प्रोफिशियेसी टेस्ट’ पास किए बिना हवाई जहाज उड़ा रहे थे। इस तरह जेट के मालिक नरेश गोयल देश-विदेश के करोड़ों यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे थे। हमारे कालचक्र समाचार ब्यूरो ;नई दिल्लीद्ध ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया, जिसका उल्लेख कई टीवी चैनलों ने किया। यह तो केवल एक ट्रेलर मात्र है। जेट एयरवेज़ पहले दिन से यात्रियों के साथ धोखाधड़ी और देश के साथ गद्दारी कर रही है। जिसके दर्जनों प्रमाण लिखित शिकायत करके इस लेख के लेखक पत्रकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई में दाखिल कर दिए हैं और उन पर उच्च स्तरीय पड़ताल जारी है। जिनका खुलासा आने वाले समय में किया जाएगा।

फिलहाल, यह जानना जरूरी है कि इतने सारे पायलेट बिना काबिलियत के कैसे जेट एयरवेज़ के हवाई जहाज उड़ाते रहे और हमारी आपकी जिंदगी के खिलवाड़ करते रहे। हवाई सेवाओं को नियंत्रित करने वाला सरकारी उपक्रम डी.जी.सी.ए. (नागर विमानन महानिदेशालय) क्या करता रहा, जो उसने इतनी बड़ी धोखाधड़ी को रोका नहीं। जाहिर है कि इस मामले में ऊपर से नीचे तक बहुत से लोगों की जेबें गर्म हुई हैं। इस घोटाले में भारत सरकार का नागर विमानन मंत्रालय भी कम दोषी नहीं है। उसके सचिव हों या मंत्री, बिना उनकी मिलीभगत के नरेश गोयल की जुर्रत नहीं थी कि देश के साथ एक के बाद एक धोखाधड़ी करता चला जाता। उल्लेखनीय है कि जेट एयरवेज़ में अनेक उच्च पदों पर डी.जी.सी.ए. और नागर विमानन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के बेटे, बेटी और दामाद बिना योग्यता के मोटे वेतन लेकर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। इन विभागों के आला अधिकारियों के रिश्वत लेने का यह तो एक छोटा-सा प्रमाण है।

डी.जी.सी.ए. और जेट एयरवेज़ की मिलीभगत का एक और उदाहरण कैप्टन हामिद अली है, जो 8 साल तक जेट एयरवेज़ का सीओओ रहा। जबकि भारत सरकार के नागर विमानन अपेक्षा कानून के तहत (सी.ए.आर. सीरीज पार्ट-2 सैक्शन-3) किसी भी एयरलाइनस का अध्यक्ष या सीईओ तभी नियुक्त हो सकता है, जब उसकी सुरक्षा जांच भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा पूरी कर ली जाय और उसका अनापत्ति प्रमाण पत्र ले लिया जाय। अगर ऐसा व्यक्ति विदेशी नागरिक है, तो न सिर्फ सीईओ, बल्कि सीएफओ या सीओओ पदों पर भी नियुक्ति किए जाने से पहले ऐसे विदेशी नागरिक की सुरक्षा जांच नागर विमानन मंत्रालय को भारत सरकार के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से भी करवानी होती है। पर देखिए, देश की सुरक्षा के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ किया गया कि कैप्टन हामिद अली को बिना सुरक्षा जांच के नरेश गोयल ने जेट एयरवेज़ का सीओओ बनाया। यह जानते हुए कि वह बहरीन का निवासी है और इस नाते उसकी सुरक्षा जांच करवाना कानून के अनुसार अति आवश्यक था। क्या डी.जी.सी.ए. और नागर विमानन मंत्रालय के महानिदेशक व सचिव और भारत के इस दौरान अब तक रहे उड्डयन मंत्री आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे थे, जो देश की सुरक्षा के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ होने दिया गया और कोई कार्यवाही जेट एयरवेज़ के खिलाफ आज तक नहीं हुई। जिसने देश के नियमों और कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाईं।

ये खुलासा तो अभी हाल ही में तब हुआ, जब 31 अगस्त, 2015 को कालचक्र समाचार ब्यूरो के ही प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर की आरटीआई पर नागरिक विमानन मंत्रालय ने स्पष्टीकरण दिया। इस आरटीआई के दाखिल होते ही नरेश गोयल के होश उड़ गए और उसने रातों-रात कैप्टन हामिद अली को सीओओ के पद से हटाकर जेट एयरवेज़ का सलाहकार नियुक्त कर लिया। पर, क्या इससे वो सारे सुबूत मिट जाएंगे, जो 8 साल में कैप्टन हामिद अली ने अवैध रूप से जेट एयरवेज़ के सीओओ रहते हुए छोड़े हैं। जब मामला विदेशी नागरिक का हो, देश के सुरक्षा कानून का हो और नागरिक विमानन मंत्रालय का हो, तो क्या इस संभावना से इंकार किया जा सकता है कि कोई देशद्रोही व्यक्ति, अन्डरवर्लड या आतंकवाद से जुड़ा व्यक्ति जान-बूझकर नियमों की धज्जियां उड़ाकर इतने महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया जाए और देश की संसद और मीडिया को कानों-कान खबर भी न लगे। देश की सुरक्षा के मामले में यह बहुत खतरनाक अपराध हुआ है। जिसकी जवाबदेही न सिर्फ नरेश गोयल की है, बल्कि नागरिक विमानन मंत्रालय के मंत्री, सचिव व डी.जी.सी.ए. के महानिदेशक की भी पूरी है।

    दरअसल, जेट एयरवेज़ के मालिक नरेश गोयल के भ्रष्टाचार का जाल इतनी दूर-दूर तक फैला हुआ है कि इस देश के अनेकों महत्वपूर्ण राजनेता और अफसर उसके शिकंजे में फंसे हैं। इसीलिए तो जेट एयरवेज़ के बड़े अधिकारी बेखौफ होकर ये कहते हैं कि कालचक्र समाचार ब्यूरो की क्या औकात, जो हमारी एयरलाइंस को कठघरे में खड़ा कर सके। नरेश गोयल के प्रभाव का एक और प्रमाण भारत सरकार का गृह मंत्रालय है, जो जेट एयरवेज़ से संबंधित महत्वपूर्ण सूचना को जान-बूझकर दबाए बैठा है। इस लेख के माध्यम से मैं केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहूंगा कि रजनीश कपूर की आरटीआई पर गृह मंत्रालय लगातार हामिद अली की सुरक्षा जांच के मामले में साफ जवाब देने से बचता रहा है और इसे ‘संवेदनशील’ मामला बताकर टालता रहा है। अब ये याचिका भारत के केंद्रीय सूचना आयुक्त विजय शर्मा के सम्मुख है। जिस पर उन्हें जल्दी ही फैसला लेना है। पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी। 8 साल पहले की सुरक्षा जांच का अनापत्ति प्रमाण पत्र अब 2015 में तो तैयार किया नहीं जा सकता।

    कालचक्र समाचार ब्यूरो का अपना टीवी चैनल या अखबार भले ही न हो, लेकिन 1996 में देश के दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों, विपक्ष के नेताओं और आला अफसरों को जैन हवाला कांड में चार्जशीट करवाने और पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने का काम भारत के इतिहास में पहली बार कालचक्र समाचार ब्यूरो ने ही किया। भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशों के अनेकों घोटाले उजागर करने की हिम्मत भी इसी ब्यूरो के संपादक, इस लेख के लेखक ने दिखाई थी। जुलाई, 2008 में स्टेट ट्रेडिंग कॉपोरेशन के अध्यक्ष अरविंद पंडालाई के सैकड़ों करोड़ के घोटाले को उजागर कर केंद्रीय सतर्कता आयोग से कार्यवाही करवा कर उसकी नौकरी भी कालचक्र समाचार ब्यूरो ने ही ली थी। ऐसे तमाम बड़े मामले हैं, जहां कालचक्र के बारे में मध्ययुगीन कवि बिहारी जी का ये दोहा चरितार्थ होता है कि कालचक्र के तीर “देखन में छोटे लगे और घाव करै गंभीर”।

अभी तो शुरूआत है, जेट एयरवेज़ के हजारों करोड़ के घोटाले और दूसरे कई संगीन अपराध कालचक्र सीबीआई के निदेशक और भारत के मुख्य सतर्कता आयुक्त को सौंप चुका है और देखना है कि सीबीआई और सीवीसी कितनी ईमानदारी और कितनी तत्परता से इस मामले की जांच करते हैं। उसके बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी। 1993 में जब हमने देश के 115 सबसे ताकतवर लोगों के खिलाफ हवाला कांड का खुलासा किया था, तब न तो प्राइवेट टीवी चैनल थे, न इंटरनेट, न सैलफोन, न एसएमएस और न सोशल मीडिया। उस मुश्किल परिस्थिति में भी हमने हिम्मत नहीं हारी और 1996 में देश में इतिहास रचा। अब तो संचार क्रांति का युग है, इसीलिए लड़ाई उतनी मुश्किल नहीं। पर ये नैतिक दायित्व तो सीवीसी और सीबीआई का है कि वे देश की सुरक्षा और जनता के हित में सब आरोपों की निर्भीकता और निष्पक्षता से जांच करें। हमने तो अपना काम कर दिया है और आगे भी करते रहेंगे।

Monday, September 22, 2014

रंजीत सिन्हा विवाद सीबीआई व देश हित में नहीं है

    सीबीआई के मौजूदा निदेशक रंजीत सिन्हा को लेकर हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में जो विवाद खड़ा हुआ, वह न तो सीबीआई के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। यह सही है कि सीबीआई को सत्तारूढ़ दल हमेशा अपने हथियार की तरह दुरूपयोग करते आए हैं और सीबीआई का आचरण हमेशा संदेह से परे नहीं रहा। परंतु जब देश की पुलिस व्यवस्था में इतनी गिरावट आ गई हो कि आम नागरिक का पुलिस पर से भरोसा ही उठ जाएं, तो सीबीआई से देशवासियों को एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। इसीलिए बड़े आर्थिक घोटालों के अलावा सामाजिक अपराधों तक के लिए बार-बार अदालतों से सीबीआई से जांच कराने की गुहार लगाई जाती है।

    पिछले दिनों कोलगेट और टूजी स्पेक्ट्रम के दो बहुचर्चित घोटालों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में एक अजीब स्थिति पैदा हो गई, जब याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने एक डायरी प्रस्तुत की। जिसमें इन घोटालों व अन्य घोटालों से संबंधित महत्वपूर्ण व्यक्तियों का सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के घर आने जाने का विस्तृत ब्यौरा है। याचिकाकर्ताओं का यह आरोप था कि सीबीआई निदेशक जिन लोगों के विरूद्ध जांच कर रहे हैं, वही लोग एक-दो बार नहीं, बल्कि दर्जनों बार देर रात तक सीबीआई निदेशक के घर आते-जाते रहे हैं। इसलिए उनकी मांग थी कि सीबीआई के मौजूदा निदेशक को इन घोटालों की जांच से अलग कर दिया जाए। इन डायरियों में ऐसे व्यक्तियों के आने और जाने का समय और तारीख आदि मौजूद हैं। यह डायरियां सीबीआई निदेशक के घर पर ही तैयार की गई हैं, ऐसा अनुमान लगता है।

    इस सनसनीखेज आरोप पर रंजीत सिन्हा की प्रतिक्रिया बहुत अजीब थी। उन्होंने एक बयान देकर कहा कि ये डायरियां नकली हैं और उन्हें बदनाम करने के लिए तैयार की गई हैं। पर उनमें से कुछ प्रविष्टियां सही हैं। वे इन लोगों से घर पर मिले हैं। पर उनका घर तो खुला दरबार है। जहां कोई भी फरियादी अपनी फरियाद लेकर आ सकता है। इसलिए उन्होंने अदालत से मांग की कि प्रशांत भूषण से इन डायरियों के स्त्रोत के बारे में पूछा जाए। इस पर एक बैंच ने तो नोटिस जारी कर दिया। जबकि मुख्य न्यायाधीश की बैंच ने आयकर विभाग से उन छापों की रिपोर्ट तलब की, जिनमें सीबीआई निदेशक के एक कुख्यात मांस निर्यातक मौहम्मद कुरैशी के साथ संबंधों के बारे में प्रमाण मिलने का आरोप है।

    अदालती नोटिस के बावजूद प्रशांत भूषण ने स्त्रोत बताने से मना कर दिया। उनका कहना था कि मामला इतना गंभीर है कि अदालत को फौरन जांच करनी चाहिए और स्त्रोत पूछने के लिए दवाब नहीं डालना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से स्त्रोत की जान को खतरा हो सकता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं, क्योंकि 1993 में जब मैंने सीबीआई के विरूद्ध हवाला कांड की जांच को दबाने का गंभीर आरोप लगाया था और सीबीआई के कब्जे में मौजूद जैन डायरी को अदालत को प्रस्तुत किया था, तो तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री वेंकटचलैया बार-बार मुझ पर स्त्रोत बताने का दबाव डालते रहे। पर मैंने स्त्रोत बताने से मना कर दिया और अपने वकील के मार्फत यह तर्क रखा कि वाॅटरगेट कांड में अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने पत्रकार बाॅब वुडवर्ड के आरोप पर जांच की और राष्ट्रपति निकसन को जाना पड़ा। आप इसी तरह मेरे आरोप पर सीबीआई को नोटिस करें और अगर सीबीआई मेरे आरोपों को झूठा सिद्ध कर दे, तो आप मुझ पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चला सकते हैं। इस तर्क पर मेरी याचिका को मुख्य न्यायाधीश ने स्वीकार कर लिया। सीबीआई को नोटिस दिया और सीबीआई को मानना पड़ा कि मेरे आरोप सही थे। इसके बाद तो जो हुआ, उसे पूरी दुनिया जानती है।

    जहां तक रंजीत सिन्हा के बयान का सवाल है, तो उनका बयान बिल्कुल बेतुका है। अगर डायरी की कुछ प्रविष्टियां सही हैं, तो डायरी फर्जी कैसे हो सकती है। दूसरी बात उनका घर अवश्य खुला दरबार हो। पर सीबीआई के निदेशक को आरोपित व्यक्तियों से अपने घर पर देर रात बार-बार मिलने की क्या मजबूरी है ? यह काम क्या दिन में अपने आॅफिस में नहीं किया जा सकता ? वैसे भी सरकारी अधिकारियों का इस तरह के कार्य को घर से करना आचार संहिता के विरूद्ध है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इन मुकदमों और जांचों की सीधी निगरानी सर्वोच्च अदालत खुद कर रही है और उसके स्पष्ट आदेश है कि जांच में कोई बाहरी दखलंदाजी न हो। चाहे वह प्रधानमंत्री का कार्यालय ही क्यों न हो। इस तरह आरोपियों से घर पर मिलकर सीबीआई निदेशक ने अदालत की अवमानना की है। क्योंकि सीबीआई की प्रथा के अनुसार किसी भी केस की जांच करने का काम जिस जांच अधिकारी को सौंपा जाता है, उसे जांच करने की पूरी स्वतंत्रता होती है और उसकी जांच प्रक्रिया में उसके वरिष्ठ अधिकारी दखल नहीं दे सकते। यह बात दूसरी है कि जांच अधिकारी अपने काम के लिए अपने वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह ले लें। पर इसकी कोई बाध्यता नहीं है। इसलिए फरियादियों का सीबीआई निदेशक के घर जाकर फरियाद करने जैसा कोई आधार ही नहीं है। साफ जाहिर है कि सीबीआई के निदेशक का आचरण संदेह के घेरे में आ चुका है। ऐसे में उन्हें अपने पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए स्वयं ही पद से हट जाना चाहिए या कम से कम इन घोटालों की जांच से अपने को मुक्त कर लेना चाहिए। पर वे ऐसा नहीं कर रहे और अपने कृत्यों को सही ठहरा रहे हैं। यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है। अब अगली तारीख पर इस विवाद का पूरा स्वरूप सामने आएगा, जब आयकर विभाग की रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में सौंपी जाएगी। तब तक के लिए सीबीआई की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में रहेगी।

Monday, February 24, 2014

सीबीआई में नियुक्ति पर बवाल

पिछले दिनों प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नियुक्ति समिति ने सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक के पद पर श्रीमती अर्चना रामासुन्दरम् की नियुक्ति करके एक और विवाद खड़ा कर दिया है। उल्लेखनीय है कि यह नियुक्ति केन्द्रीय सर्तकता आयोग अधिनियम व दिल्ली पुलिस स्थापना कानून की अवज्ञा करके की गई है। इस कानून के अनुसार सी.बी.आई. में पुलिस अधीक्षक से लेकर विशेष निदेशक तक की नियुक्ति करने का अधिकार जिस समिति को दिया गया है, उसकी अध्यक्षता केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त करते हैं। इस समिति में दो सर्तकता आयुक्त, भारत के गृहसचिव व भारत के डी.ओ.पी.टी. विभाग के सचिव भी सदस्य होते हैं। सी.बी.आई. के निदेशक को सलाह लेने के लिए आमन्त्रित अतिथि के रूप में बुलाया जाता है। सी.बी.आई. के निदेशक की सलाह मानना इस समिति की बाध्यता नहीं है। पर इस समिति द्वारा जो नाम प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली नियुक्ति समिति को भेजा जाता है, उससे मानना प्रधानमंत्री की समिति के लिए अनिवार्य है। अभी तक ऐसा ही होता आया है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विनीत नारायण फैसले के तहत सी.बी.आई. की स्वायत्ता सुनिश्चित करने के लिए यह निर्देश जारी किए थे।
पर अर्चना रामासुन्दरम् की नियुक्ति करके प्रधानमंत्री ने एक बार फिर इन नियमों की अवहेलना की है। उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त की नियुक्ति के समय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की सलाह की उपेक्षा करके पी.जे. थामस को नियुक्त कर दिया था, जिस पर भारी बवाल मचा। उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रूख को देखते हुए श्री थामस को इस्तीफा देना पड़ा। ठीक वैसी स्थिति अब पैदा हो गई है। केन्द्रीय सर्तकता आयुक्त की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने सी.बी.आई. के सह निदेशक पद के लिए बंगाल काडर के पुलिस अधिकारी आर.के. पचनन्दा का नाम प्रस्तावित किया था। जिसे डी.ओ.पी.टी. ने लौटाकर पुर्नविचार करने को कहा। जिसके बाद 26 दिसम्बर, 2013 को दूसरी बैठक में भी चयन समिति ने फिर से आरके पचनन्दा का नाम ही प्रस्तावित किया, अब यह सरकार की बाध्यता बन गया। पर सरकार ने इसकी परवाह नहीं की और किन्हीं दबावों में आकर अपनी मर्जी से सहनिदेशक की नियुक्ति कर दी। यहां प्रश्न की इस बात का नहीं है कि अर्चना रामासुन्दरम् योग्य हैं या नहीं। सवाल इस बात का है कि क्या प्रधानमंत्री का यह निर्णय कानून सम्मत है या नहीं, उत्तर है नहीं, तो फिर यह नियुक्ति अदालत की परीक्षा में कैसे खरी उतर पाएगी। अगर प्रधानमंत्री को आरके पचनन्दा के नाम पर आपत्ति थी, तो उन्हें इसके लिखितकारण बताकर समिति को पुर्नविचार करने के लिए कहना चाहिए था। पर ऐसा कोई आरोप सरकार ने पचनन्दा के विरूद्ध नहीं लगाया, इसलिए उनकी उम्मीदवारी की उपेक्षा का कोई कारण समझ में नहीं आता।
उल्लेखनीय है कि जब मुझे इस गैरकानून प्रक्रिया की भनक मिली, तो मैंने 7 फरवरी, 2014 को प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र लिखकर ऐसा न करने की सलाह और चेतावनी दी। पर उसके बावजूद जब यह निर्णय हो गया, तो मुझे सार्वजनिक रूप से टेलीविजन चैनलों पर इसकी भत्र्सना करनी पड़ी और अब मैं इस मामले को सर्वोच्च अदालत में ले जाने की तैयारी कर रहा हूं।
मेरा प्रश्न इतना सा है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार गठित चयन समिति की कोई हैसियत सरकार के दिमाग में है या नहीं। अगर सरकार कानून का उल्लंघन करके सी.बी.आई. में अपनी पसंद के अधिकारी नियुक्त करना चाहती हैं, तो वह अदालत से कहकर उसके निर्देशों के विरूद्ध फैसला ले ले, क्योंकि फिर उसे केंद्रीय सर्तकता आयोग की जरूरत नहीं बचेगी। फिर तो वह सी.बी.आई. में मनमानी नियुक्ति कर सकती है। पर जब तक यह कानून प्रभावी है, इसका उल्लंघन गैर कानूनी माना जाएगा। इसलिए एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर ‘विनीत नारायण फैसले’ की पुर्नव्याख्या करवानी होगी।
 समझ में नहीं आता कि चुनावी वर्ष में, अपने कार्यकाल के अन्तिम कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री क्यों बार-बार ऐसी गलती दोहरा रहे हैं, जिस पर पहले भी उनकी फजीहत हो चुकी है। अब देखना यह है कि अदालत इस मामले में क्या निर्णय देती है।

जो भी हो, अगर फैसला सरकार के विरूद्ध आता है तो आरके पचनन्दा सी.बी.आई. के अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किए जा सकते हैं और अगर फैसला सरकार के पक्ष में आता है, तो अर्चना रामासुन्दरम् इस स्थान को भर सकती हैं। फिलहाल वे तमिलनाडु काडर की पुलिस अधिकारी हैं। मैं समझता हूं कि इस जनहित याचिका पर अदालत का रूख सुने बिना अगर अर्चना रामासुन्दरम् सी.बी.आई. में पदभार ग्रहण कर लेती हैं और फिर फैसला उनके विरूद्ध आता है, तो उन्हें वापिस अपने राज्य लौटना होगा। शायद वे इतनी हड़बड़ी न दिखाएं और अदालत के फैसले का इंतजार करें।
जो भी हो सी.बी.आई. वैसे ही कम विवादों में नहीं रहती और फिर अगर उसकी नियुक्तियों को लेकर सरकार कठघरे में खड़ी हो जाए तो सरकार की क्या छवि बचेगी। इसलिए यह गम्भीर प्रश्न है। अब हमें जनहित याचिका दायर होने और उस पर सर्वोच्च न्यायालय क्या रूख लेता है, इसका इंतजार करना होगा।

Monday, November 11, 2013

सीबीआई फिर विवादों में

सर्वोच्च न्यायालय ने गौहाटी उच्च न्यायालय के सीबीआई संबंधी फैसले पर रोक लगा कर केन्द्र सरकार को तात्कालिक राहत तो दे दी। पर सीबीआई के अस्तित्व व कार्यप्रणाली को लेकर जो सवाल लगातार उठते रहे हैं वे पहले की तरह ही अनुत्तरित रह गए। गौहाटी के फैसले के बाद टीवी चैनलों, अखबारों और सर्वोच्च न्यायालय में एक बार फिर ‘विनीत नारायण फैसले’ का सहारा लेकर सीबीआई की स्थिति को पुनस्र्थापित करने का प्रयास किया गया। जब-जब सीबीआई की वैधता, पारदर्शिता या कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठते हैं तब-तब यही फैसला बहस का विषय बन जाता है। पर समाधान फिर भी नहीं निकलता। कारण स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को मानना या न मानना संसद की इच्छा पर निर्भर है। लोकतंत्र में संसद सर्वोच्च है। इसलिए ऐसे दर्जनों फैसले हैं जो सरकार के कानून मंत्रालय में धूल खाते हैं। जिन्हें लागू करने की या तो सरकार की ही मंशा नहीं होती या सरकार के संसदीय मंत्री जानते हैं कि उन्हें अन्य दलों से सहयोग नहीं मिलेगा।

फिर भी जब कभी अदालतें सीबीआई को लेकर कोई टिप्पणी करती हैं या आदेश देती हैं तो देश में उत्तेजना और उत्सुकता दोनो फैल जाती है। पर इस सबसे भी कोई स्थिति बदलती नहीं। इसलिए इस विषय पर गंभीर सोच की जरूरत है।
दिल्ली पुलिस एक्ट के तहत सीबीआई का गठन भ्रष्टाचार के मामले जांचने के लिए किया गया था। तब से आज तक इसे पूर्ण संवैधानिक दर्जा नहीं मिला। क्यांेकि अनेक राज्य सीबीआई का दखल नहीं चाहते। उधर केन्द्र में सत्तारूढ होने वाली सरकारें भी सीबीआई के घोषित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कभी गंभीर नहीं रहीं। इसीलिए कभी इसे ‘भ्रष्टाचार का कब्रगाह‘ कभी ‘पिजरे में बंद तोता’ या कभी ‘बिना दांत का सरकारी श्वान’ बताकर सीबीआई का मखौल उड़ाया जाता है।
दूसरे छोर पर वे लोग हैं जो सीबीआई को पूरी स्वायतता देने और निरंकुश बनाने की वकालत करते हैं। उन्हें भ्रम है कि ऐसा करने पर सीबीआई भ्रष्टाचार का खात्मा कर देगी। यह बहुत बचकानी सोच है। पहली बात तो यह कि अगर सामाजिक और आर्थिक अपराध केवल कानूनों से रूक जाते तो देश में अपराध होते ही नहीं। क्योंकि आज देश में जितनी तरह के अपराध होते हैं उससे कहीं ज्यादा कानून उन्हें रोकने के लिए बने हुए हैं। निरंकुश बन कर सीबीआई भ्रष्टाचार भले ही दूर न कर पाए लेकिन स्वयं ब्लैकमेल करने और धमका कर पैसा ऐंठने की एक संस्था जरूर बन जाएगी, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं। इसलिए हमारे संविधान में विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के पारस्परिक नियंत्रण रखने के प्रावधान किए गए हैं।
सोचने वाली बात यह है कि भ्रष्टाचार की जड़ में जो सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक कारण हैं उन्हें जाने बिना भ्रष्टाचार को खत्म करने की हर मुहिम बेमानी है। इन कारणों की तरफ ना तो कानून के विशेषज्ञों का ध्यान है, न सरकार का, न संसद का और न ही मीडिया का। किसी भी बीमारी के कारणों को जाने बिना उसका इलाज कैसे किया जा सकता है ? पर भारत में आज यही हो रहा है। सीबीआई का नाम ही इतना आकर्षक हो चुका है कि उसकी चर्चा आते ही आत्मघोषित विशेषज्ञ लंबी-चैड़ी टिप्पणियां और सलाह देने लगते हैं। जबकि इनके विचारों का जमीनी हकीकत से कोई नाता नहीं होता।
अगर देश की चिंता करने वाले देश को वाकई भ्रष्टाचार से मुक्त करवाना चाहते हैं तो उन्हें सारे भारत के लोगों की दृष्टि बदलने का काम करना होगा, जो कोई आसान काम नहीं। भ्रष्टाचार ही क्यों, हर समस्या को लेकर आज देशभर में शोर मचाने और बयानबाजी करने का जो फैशन बढ़ता जा रहा है उससे देश मंे हताशा फैल रही है। आम जनता, जो मामूली रोजगार और दो-जून की रोटी की फिराक में जुटी रहती है, ऐसी बातें सुनकर विचलित हो जाती है। अगर यह रवैया ऐसे ही चलता रहा तो हम देश में बहुत जल्दी अराजकता पैदा कर देंगे, जिसे संभालना फिर सरकार ही नहीं, खुद को आम जनता का नेता बताने वालों, को भी मुश्किल होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि देश की प्रमुख दस-बारह समस्याओं की सूची बना कर उनके समाधान खोजने की राष्ट्रव्यापी बहस चलाई जाएं। अगर सार्थक समाधान मिलते हैं तो उन्हें बिना किसी राजनैतिक राग-द्वेश के, व्यापक जनहित में लागू करने की पहल हर राजनैतिक दल या सामाजिक समूह द्वारा की जाए। इससे जनता में एक अच्छा संदेश जाएगा और चैराहों पर निरर्थक आलोचनाओं में लफ्फाजी करने वालों को कुछ ठोस करने का मौका मिलेगा। वो करने का जिससे समाज बदले और सुधरे।
सीबीआई को स्वायतता मिले या न मिले, उसकी संवैधानिक स्थिति स्पष्ट हो या न हो पर यह जरूर है कि अगर देश की संवैधानिक संस्थाओं को लेकर जनता का विश्वास इसी तरह लगातार कम होता गया तो सामान्य जनजीवन चलाना भी मुश्किल हो जाएगा। चैबे जी चले थे छब्बे बनने, पर दूबे बनकर लौटे।

Monday, May 6, 2013

सीवीसी और सीबीआई को बाहरी दवाब से मुक्त करना होगा

हाल ही में कोल गेट मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कानून मंत्री व सीबीआई के बीच हुई बैठक पर कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि 15 वर्ष पहले इसी अदालत के ‘विनीत नारायण फैसले‘ में सीबीआई की स्वायत्ता के जो निर्देश दिए गए थे, उनका आज तक अनुपालन नहीं हुआ। ‘कोलगेट केस‘ में उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्टतः स्थापित हो रहा है कि सीबीआई के लिए पेश होने वाले कानूनी अफसर, जाँच ऐजेन्सी की तर्ज पर ही चलते हैं और यह भूल जाते हैं कि उनसे अदालत को सच तक पहुँचने में मदद करने की अपेक्षा की जाती है। जैसा कि पहले कई बार इस कॉलम में उल्लेख किया जा चुका है कि जैन हवाला केस में भी कानूनी अधिकारियों ने सर्वोच्च अदालत से तथ्य छिपाने में सीबीआई की मदद की थी। इसलिए सीबीआई द्वारा नियुक्त किए जाने वाले कानूनी अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

अभी तक तो यही हुआ है कि हवाला मामले में 1997 दिसम्बर का वह ‘प्रसिद्ध फैसला‘ एक दन्तविहीन सीवीसी का गठन कर दरकिनार कर दिया गया। इसलिए यह देश के हित में बहुत महत्वपूर्ण है कि माननीय न्यायधीशगणों द्धारा 1997 के फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समुचित निर्देश जारी किये जाएं। आगामी 8 मई को कोल गेट मामले में सुनवाई के दौरान इसकी संभावना व्यक्त की जा रही है।
आवश्यकता इस बात की है कि सीवीसी अधिनियम मे सुधार कर इसे 8/10 सदस्यों वाला ‘केन्दªीय सतर्कता आयोग‘ बना देना चाहिए, जोकि लोकपाल के लिए सोची जा रही भूमिका का निर्वहन कर सके। सीवीसी के सदस्यों के चयन की प्रक्रिया को व्यापक बनाते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसमें चहेते और विवादास्पद व्यक्ति सदस्य न बनें। मौजूदा तीन सदस्यों मे से एक आइएएस, दूसरा आइपीएस व तीसरा बैंकिग सेवाओं से लिया जाता है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को भी नियुक्त किया जाना चाहिए। जिनका चयन भारत के मुख्य न्यायाधीश अपने बाद वरिष्ठता क्रम में तीन न्यायधीशों की सहमति से करें। क्योंकि विधायिका का हमारे देश के लोकतंत्र और शासन में भारी महत्व है इसलिए संसद के दोनों सदनों के वरिष्ठतम सांसदों मे से एक का चयन भी इस आयोग के सदस्य के रुप मे किया जाना चाहिए। इसके अलावा काँमनवैल्थ खेलों के घोटाले जैसे मामलों की जाँच के लिए इंजीनियरिंग योग्यता वाले दो-तीन विशेषज्ञ व वित्तीय घोटालों को समझने के लिए एक चार्टर्ड एकाउटेन्ट को भी इस आयोग का सदस्य बनाना चाहिए। ये सभी चयन यथासम्भव पारदर्शी होने चाहिए।
सीवीसी की सलाहाकार समिति मे कम से कम 11 सदस्य अपराध शास्त्र विज्ञान और फोरेन्सिक विज्ञान के विशेषज्ञ होने चाहिए। जो इस आयोग की कार्य क्षमता में प्रोफेशनल योगदान करेगें। साथ ही कार्य बोझ कम करने के लिए सीवीसी को बाहर से विशेषज्ञों को बुलाने की छूट होनी चाहिए, जो शिकायतों के ढ़ेर को छाँटने मे मदद करें। सीवीसी के दायरे मे फिलहाल केन्द्रीय सरकार और केन्द्रीय सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के सभी कर्मचारी आते हैं, यह व्यवस्था ऐसे ही रहे। पर इस व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए मंत्रालयों व विभागों के सीवीओ के चयन और कार्य पर सीवीसी का पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए।
सीवीसी को जाँच करने के लिए तकनीकी रुप से अनुभवी और सक्षम लोगो की टीम दी जानी चाहिए जो शिकायत की गंभीरता को जाँच कर यह तय कर सके कि किस मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी जानी है या सीवीसी की टीम ही करेगी। शिकायत को पूरी तरह परख लेने के बाद की कारवाई के लिए सीवीसी को सरकार से पूर्वानुमति लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जिन मामलों को सीवीसी सीबीआई को सौंपती है उनकी जाँच के लिए सीबीआई को सरकार के मंत्रालय या विभाग के वित्तीय नियन्त्रण से मुक्त रहना चाहिए। सीबीआई की जाँच पर निगरानी का अधिकार केवल सीवीसी का होना चाहिए, इसकी मौजूदा व्यवस्था मे सुधार किया जाना चाहिए। इसी तरह सीवीसी के सदस्यों की भाँति सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति भी व्यापक पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए और सीबीआई के बाकी अधिकारियों की नियुक्ति और निगरानी का अधिकार सीवीसी को दिया जाना चाहिए।
भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों और इससे सम्बन्धित शिकायतों के संदर्भ मे शिकायतकर्ताओं के मामलों को सीवीसी के अधीन कार्यक्षेत्र में दे देना चाहिए जिससे इन सबके बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो सके। निचले स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का प्रभावी तरीके से लागू होना भी सुशासन के लिए अनिवार्य है। इसलिए यह जरूरी होगा कि राज्यों की भ्रष्टाचार विरोधी ऐजेन्सियों को भी राज्य सरकारों के हस्तक्षेप से इसी तरह मुक्त किया जाए।
यह सभी प्रस्ताव हमने सर्वोच्च न्यायालय के  माननीय न्यायधीशों के विचारार्थ भेज दिए हैं। पर इसके साथ ही हम यह भी जानते हैं कि व्यवस्था कोई भी बना लो, जब तक उसको चलाने वाले ईमानदार नहीं हैं, वो नहीं चल सकती। रिश्वत लेने वालों से ज्यादा दोष देने वालों का होता है। अपने फायदे के लिए मोटी रिश्वत लेने वाले व्यवस्था को भ्रष्ट बनाने के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। जब तक रिश्वत देने वाले रिश्वत देना बंद नहीं करेंगे, तब तक लेने वाले मौजूद रहेंगे। सिंहासन तो चीज ही ऐसी है जहां बैठकर बड़े-बड़े फिसल जाते है।  ‘माया तू ठगनी, हम जानी।‘ 

Tuesday, April 30, 2013

Once again it has been proved that CBI is an instrument in the hands of govt. to settle its political scores


“Once again it has been proved that CBI is an instrument in the hands of govt. to settle its political scores. I have been boldly saying so since 1993, when I exposed the Jain Hawala Case. It is unfortunate that the 1998 SC judgement (Vineet Narain Vs. Union of India) in this case, which gave clear directions for the autonomy of CBI under CVC and not under Govt control has not been implemented by the successive governments. It should now be accepted by the nation that CBI is not an independent agency to investigate high profile cases. Hence, it is an opportunity for the opposition parties and the vigilant section of media to come up with an alternate model of creating a new agency which can function without fear, prejudice, pressure or temptations. There should be a national debate on such alternative, if available, so to pressurize the govt. to act.”

Monday, July 9, 2012

मायावती का फैसला

मायावती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। अदालत में सीबीआई को अपनी सीमा उल्लघन करने के लिए फटकारा है। पर सर्वोच्च अदालत जनहित के मामलों में अक्सर ’सूमोटो’ यानी अपनी पहल पर भी कोई मामला ले लेती है। इस मामले में अगर सीबीआई ने बसपा नेता के पास आय से ज्यादा सम्पत्ति के प्रमाण एकत्र कर लिये हैं तो सर्वोच्च न्यायालय उस पर मुकदमा कायम कर सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया। विरोधी दलों को यह कहने का मौका मिल गया कि सरकार ने हमेशा की तरह मायावती से डील करके उन्हें सीबीआई की मार्फत बचा दिया। सारे टीवी चैनल इसी लाइन पर शोर मचा रहे हैं। पर अदालत के रवैये पर अभी तक किसी ने टिप्पणी नहीं की।

जहां तक बात सीबीआई के दुरूपयोग की है तो यह कोई नई बात नहीं है। हर दल जब सत्ता में होता है तो यही करता है। किसी ने भी आज तक सीबीआई को स्वायत्ता देने की बात नहीं की। पर आज मैं भ्रष्टाचार के सवाल पर एक दूसरा नजरिया पेश करना चाहता हूं। यह सही है कि भ्रष्टाचार ने हमारे देश की राजनैतिक व्यवस्था को जकड़ लिया है और विकास की जगह पैसा चन्द लोगों की जेबों मे जा रहा है। पर क्या यह सही नही है कि जिस राजनेता के भ्रष्टाचार को लेकर मीडिया और सिविल सोसाइटी बढ़-चढ़ कर शोर मचाते हैं उसे आम जनता भारी बहुमत से सत्ता सौंप देती है। तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता को भ्रष्ट बताकर सत्ता से बाहर कर दिया गया था। अब दुबारा उसी जनता ने उनके सिर पर ताज रख दिया। क्या उनके ’पाप’ धुल गये मायावती पर ताज कोरिडोर का मामला जब कायम हुआ था उसके बाद जनता ने उन्हें उ.प्र. की गददी सौंप दी। वे कहती हैं कि उन्हें यह दौलत उनके कार्यकर्ताओं ने दी। जबकि सीबीआई के स्त्रोत बताते हैं कि उनको लाखों-करोड़ों रूपये की बड़ी-बड़ी रकम उपहार मे देने वाले खुद कंगाल हैं। इसलिए दाल में कुछ काला है।

पर यहां ऐसे नेताओं के कार्यकर्ताओं द्वारा यह सवाल उठाया जाता है कि जब दलितों और पिछड़ों के नेताओं का भ्रष्टाचार सामने आता है तब तो देश में खूब हाहाकार मचता है। पर जब सवर्णों के नेता पिछले दशकों में अपने खजाने भरते रहे, तब कोई कुछ नहीं बोला। यह बड़ी रोचक बात है। सिविल सोसाइटी वाले दावा करते हैं कि एक लोकपाल देश का भ्रष्टाचार मिटा देगा। पर वे भूल जाते हैं कि इस देश में नेताओं और अफसरों के अलावा उद्योगपतियों, व्यापारियों, ठेकेदारों, खान मालिकों आदि की एक बहुत बड़ी जमात है जो भ्रष्टाचार का भरपूर फायदा उठाती है और इसका सरंक्षण करती है। यह जमात और सुविधा भोगी होते जा रहे है भारतीय अब पैसे की दौड़ में मूल्यों की बात नहीं करते। गांव का आम आदमी भी अब चारागाह, जंगल, पोखर, पहाड़ व ग्राम समाज की जमीन पर कब्जा करने में संकोच नहीं करता। ऐसे में कोई एक संस्था या एक व्यक्ति कैसे भ्रष्टाचार को खत्म कर सकता है। 120 करोड़ के मुल्क में 5000 लोगों की सीबीआई किस-किस के पीछे भागेगी।
अपने अध्ययन के आधार पर कुछ सामाजिक विश्लेषक यह कहने लगे हैं कि देश की जनता विकास और तरक्की चाहती है उसे भ्रष्टाचार से कोई तकलीफ नहीं। उनका तर्क है कि अगर जनता भ्रष्टाचार से उतनी ही त्रस्त होती जितनी सिविल सोसाइटी बताने की कोशिश करती है तो भ्रष्टाचार को दूर भगाने के लिए जनता एकजुट होकर कमर कस लेती। रेल के डिब्बे में आरक्षण न मिलने पर लाइन में खड़ी रहकर घर लौट जाती, पर टिकिट परीक्षक को हरा नोट दिखाकर, बिना बारी के, बर्थ लेने की जुगाड़ नहीं लगाती। हर जगह यही हाल है। लोग भ्रष्टाचार की आलोचना में तो खूब आगे रहते है पर सदाचार को स्थापित करने के लिए अपनी सुविधाओं का त्याग करने के लिए सामने नहीं आते। इसलिए सब चलता है की मानसिकता से भ्रष्टाचार पनपता रहता है।
देखने वाली बात यह भी है कि सिविल सोसाइटी के जो लोग भ्रष्टाचार को लेकर आय दिन टीवी चैनलों पर हंगामा करते है वे खुद के और अपने संगी साथियों के अनैतिक कृत्यों को यह कहकर ढकने की कोशिश करते हैं कि अगर हमने ज्यादा किराया वसूल लिया तो कोई बात नही हम अब लौटाये देते हैं। अगर हम पर सरकार का वैध 7-8 लाख रूपया बकाया है तो हम बड़ी मुश्किल से मजबूरन उसे लौटाते हैं यह कहकर कि सरकार हमें तंग कर रही है, पर अब हमारी आर्थिक मदद करने वाले दोस्तों को तंग न करें। फिर तो पकड़े जाने पर भ्रष्ट नेता भी कह सकते है कि हम जनता का पैसा लौटाने को तैयार हैं। ऐसा कहकर क्या कोई चोरी करने वाला कानून की प्रक्रिया से बच सकता है। नहीं बच सकता। अपराध अगर पकड़ा जाये तो कानून की नजर में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी लड़ाई का मकसद कितना पाक है।
ऐसे विरोधाभासों के बीच हमारा समाज चल रहा है। जो मानते हैं कि वे धरने और आन्दोलनों से देश की फिजा बदल देंगे। उनके भी किरदार सामने आ जायेंगे। जब वे अपनी बात मनवाकर भी भ्रष्टाचार को कम नहीं कर पायेंगे, रोकना तो दूर की बात है। फिर क्यों न भ्रष्टाचार के सवाल पर आरोप प्रत्यारोप की फुटबाल को छोड़कर प्रभावी समाधान की दिशा में सोचा जाये। जिससे धनवान धन का भोग तो करे पर सामाजिक सरोकार के साथ और जनता को अपने जीवन से भ्रष्टाचार दूर करने के लिए प्रेरित किया जाये। ताकि हुक्मुरान भी सुधरें और जनता का भी सुधार हो। फिलहाल तो इतना बहुत है।