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Monday, April 30, 2018

चीन नीति पर मोदी का कमाल

विपक्षी दल प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को विफल बता कर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका आरोप है कि डोकलम में झटका झेलने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को कड़क जबाव नहीं दिया। बल्कि एक के बाद एक मंत्रियों और अधिकारियों को चीन भेजकर और खुद अचानक वहां जाकर, यह संदेश दिया है कि भारत ने चीन के आगे घुटने टेक दिये हैं। विपक्षी दलों का यह भी आरोप है कि चीन ने नेपाल, भूटान, वर्मा, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान पर अपनी पकड़ मजबूत बनाकर भारत को चारों तरफ से घेर लिया है और इस तरह मोदी की पड़ोसी देशों के साथ विदेश नीति को विफल कर दिया है।
जबकि हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अजीत डोभाल, सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमन आदि ने भारत-चीन संबंधों के मामले में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। आज जबकि चीन के राष्ट्रपति शी शिनफिंग दुनिया के सबसे ताकतवर नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं और आजीवन वहां राष्ट्रपति रहने वाले हैं, तो उनसे लड़कर भारत को कुछ मिलने वाला नहीं था। इसलिए उनसे मिलकर चलने में ही भलाई है, इसे प्रधानमंत्री ने तुरंत समझ लिया। वैसे भी चीन की ताकत आज दुनिया में बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। ऐसे में चीन को बंदर घुड़की दिखाने से काम बनने वाला नहीं था। 
औपचारिक शिखर सम्मेलन अनेक दबावों के बीच हुआ करते हैं। उसमें नौकरशाही की बड़ी भूमिका रहती है। संधि और घोषणाऐं करने का काफी दबाव रहता है। साझे बयानों को तैयार करने में ही काफी मशक्क्त करनी पड़ती है। जबकि अगर दो देशों के नेता पारस्परिक संबंध बना लें, तो बहुत सी कूटनीतिज्ञ समस्याऐं सुगमता से हल हो जाती है और उनके लिए नाहक वार्ताओं के दौर नहीं चलाने पड़ते। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले वर्षों की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उन्होंने दुनिया के लगभग हर देश के नेता से अपने व्यक्तिगत संबंध बना लिये हैं। अब वे कभी भी किसी से फोन पर सीधे बात कर सकते हैं। यही उन्होंने चीन जाकर किया।
भारत-चीन सीमा पर आए दिन चीनी फौज डोकलम जैसे उत्पात मचाती रही है। वहां की फौज सीधे कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर काम करती है। जिसे केवल सैन्य स्तर पर निपटना भारत के लिए आसान नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस चीन यात्रा में एक नया अध्याय जोड़ा है। अब चीन की सेना और भारतीय सेना के अधिकारियों के बीच नियमित संवाद होता रहेगा। जिससे गफलत की गुंजाईश न रहे।
इसके साथ ही इस यात्रा से भारत-चीन संबंध खासी गति से विकसित हुआ है। इसी पर दोनों देशों का आर्थिक उदारीकरण और सुरक्षा व्यवस्था निर्भर करती है। चीन का व्यापार अमेरिका, यूरोप और भारत के साथ बहुत ज्यादा हैं, शेष विश्व के साथ उसका व्यापार घाटे का ही है। इस लिहाज से यदि चीन का भारत के साथ व्यापार बढ़त भारत-अमेरिका व्यापार से ज्यादा हो जाती है, तो फिर दिल्ली और बिजिंग को राजनीतिक मुद्दे अलग-अलग करने होंगे।
भारत और पाकिस्तान के मध्य चल रहे विवादों में चीन की भूमिका किसी न किसी तरह से हमेशा ही पाई जाती रही है। चीन ने पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रमों को मदद देने का संकेत भी दिया था। चीन के सरकारी मीडिया ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने एक संपादकीय में लिखा था कि यदि पश्चिमी देश भारत को एक परमाणु ताकत के रूप में स्वीकारते हैं और भारत तथा पाकिस्तान के बीच बढ़ती परमाणु होड़ के प्रति उदासीन रहते हैं, तो चीन चुप नहीं बैठेगा।
लेकिन अब ‘द्विपक्षीय मैत्री’ एव सहयोग संधि के बाद पाकिस्तान दबाव में आ जायेगा। भारत-चीन की मार्फत पाकिस्तान को आतंकवाद नियंत्रित करने के लिए मजबूर कर सकता है। साथ ही चीन को इस बात के लिए राजी कर सकता है कि वह महमूद अजहर को आतंकवादी घोषित किये जाने की अंतराष्ट्रीय मांग का विरोध न करें। साथ ही परमाणु शक्ति के मामलों में भारत और चीन के बीच में जो कई मूल मुद्दे अंतराष्ट्रीय स्तर पर उलझ रहे थे। उनका भी समाधान होने की संभावना है। जाहिर है कि अजित डोभाल ने इन परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्दे के पीछे रहकर काफी मेहनत की है। इसके साथ ही चीन ने भारत को मुक्त व्यापार समझौते का सुझाव दिया है, ताकि दोनों एशियाई देशों के बीच संबंधों को व्यापक प्रोत्साहन दिया जा सके।
भारत और चीन संबंधों में सुधार दोनों ही देशों के हित में है। प्रश्न है कि  क्या यह सुधार भारत को अपनी सम्प्रभुता और सुरक्षा की कीमत चुकाकर करनी चाहिए? क्या चीन पर भरोसा किया जा सकता है कि भविष्य में वह धोखा नहीं देगा? उम्मीद के सहारे दुनिया टिकी है। बदलते अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के लिए यही बेहतर है कि वे मिलकर चलें, जिससे एक बड़ी ताकत के रूप में उभरें। जिससे क्षेत्र का आर्थिक विकास भी तेजी से हो सकेगा।

Monday, May 4, 2015

भारत क्यों चीन के मायाजाल में फंस रहा है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन जा रहे हैं। हो सकता है कुछ बड़े समझौते हों। जिनका जश्न मनाया जायगा। पर हर जो चीज चमकती है उसको सोना नहीं कहते। रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति और सामरिक विषयों के जानकारों का कहना है कि भारत धीरे-धीरे चीन के मायाजाल में फंसता जा रहा है। आज से 15 वर्ष पहले वांशिगटन के एक विचारक ने दक्षिण एशिया के भविष्य को लेकर तीन संभावनाएँ व्यक्त की थीं। पहली अपने गृह युद्धों के कारण पाकिस्तान का विघटन हो जाएगा और उसके पड़ोसी देश उसे बांट लेंगे। दूसरी भारत अपनी व्यवस्थाओं को इतना मजबूत कर लेगा कि चीन और भारत बराबर की ताकत बन कर अपने-अपने प्रभाव के क्षेत्र बांट लेंगे। तीसरी चीन धीरे-धीरे चारों तरफ से भारत को घेर कर उसकी आंतरिक व्यवस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत कर लेगा और धीरे-धीरे भारत की अर्थव्यवस्था को सोख लेगा। 

आज यह तीसरी संभावना साकार होती दिख रही है। चीन का नेतृत्व एकजुट, केन्द्रीयकृत, विपक्षविहीन व दूर दृष्टि वाला है। उसने भारत को जकड़ने की दूरगामी योजना बना रखी है। अरूणाचल की जमीन पर 1962 से कब्जा जमाये रखने के बावजूद चीन को किसी भी मौके पर इस इलाके को भारत को वापिस करने में गुरेज नहीं होगा। उसने इसके लिए भारत में एक लाॅबी पाल रखी है। जो इस मुद्दे को गर्माए रहती है। ऐसा करके वह भारत के प्रधानमंत्री को खुश करने का एक बड़ा मौका देगा लेकिन उसके बदले में हमसे बहुत कुछ ले लेगा। ऐसा इसलिए कि उसे सामरिक दृष्टि से इस क्षेत्र में कोई रूचि नहीं है। यह कब्जा तो उसने सौदेबाजी के लिए कर रखा है। उसका असली खेल तो तिब्बत, पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान में है। जहाँ उसने रेल और हाइवे बनाकर अपनी सामरिक स्थिति भारत के विरूद्ध काफी मजबूत कर ली है। उसके लड़ाकू विमान हमारी सीमा से मात्र 50 किमी दूर तैनात है। युद्ध की स्थिति में सड़क और रेल से रसद पहुंचाना उसके लिए बांये हाथ का खेल होगा। जबकि ऐसी किसी भी व्यवस्था के अभाव में हम उसके सामने हल्के पड़ेंगे। 

पिछले 10 वर्षों में ऊर्जा, संचार और पैट्रोलियम जैसे संवेदनशील और अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र में चीन ने भारत में लगभग सारे अंतर्राष्ट्रीय ठेके जीते हैं। इससे हमारी धमनियों पर अब उसका शिकंजा कस चुका है। चीन से बने बनाएं टेलीफोन एंक्सचेन्ज भारत में लगाएं गये हैं। जिसकी देखभाल भी चीन रिमोट कन्ट्रोल से करता है। क्योंकि ठेके की यही शर्त थी। अब वो हमारी सारी बातचीत पर निगाह रख सकता है। यहां तक कि हमारी खुफिया जानकारी भी अब उससे बची नहीं है। वो जब चाहे हमारी संचार व्यवस्था ठप्प कर सकता है। जिस समय चीन ये ठेके लगातार जीत रहा था उस समय हमारे गृह और रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने लिखकर चिंता व्यक्त की थी। पर सरकार ने अनदेखी कर दी। 

सब जानते हैं कि उद्योगपतियों के लिए मुनाफा देशभक्ति से बड़ा होता है। चीन ने अपने यहाँ आधारभूत सुविधाओं का लुभावना तंत्र खड़ा करके भारत के उद्योगपतियों को विनियोग के लिए खीचना शुरू कर दिया है। उत्पादन के क्षेत्र में तो वह पहले ही भारत के लघु उद्योगों को खा चुका है। उधर भारत का हर बाजार चीन के माल से पटा पड़ा है। जाहिरन इससे देश में भारी बेरोजगारी फैल रही है। जो भविष्य में भयावह रूप ले सकती है। प्रधानमंत्री का ‘मेक इन इंडिया‘ अभियान बहुत सामयिक और सार्थक है। उसके लिए प्रधानमंत्री दुनियाभर जा-जाकर मशक्कत भी खूब कर रहें हैं। पर जब तब देश की आंतरिक व्यवस्थाएँ, कार्य संस्कृति और आधारभूत ढ़ाचा नहीं सुधरता, तब तक ‘मेक इन इंडिया‘ अभियान सफल नहीं होगा। इन क्षेत्रों में अभी सुधार के कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं। जिनपर प्रधानमंत्री को गंभीरता से ध्यान देना होगा। 


चीन भारत को चारों तरफ से घेर चुका है। नेपाल, वर्मा, दक्षिण पूर्व एशियाई देश, श्रीलंका और पाकिस्तान पर तो उसकी पकड़ पहले ही मजबूत हो चुकी थी। अब उसने मालदीव में भारत के जी.एम.आर. ग्रुप से हवाई अड्डा छीन लिया। इस तरह भारत पर चारों तरफ से हमला करने की उसने पूरी तैयारी कर ली है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमला करेगा, बल्कि इस तरह दबाव बना कर वो अपने फायदे के लिए भारत सरकार को ब्लैकमेल तो कर ही सकता है। 

इस पूरे परिदृश्य में केवल दो ही संभावनाएँ बची है। एक यह कि भारत आंतरिक दशा मजबूत करें और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोके। दूसरा यह कि चीन में आंतरिक विस्फोट हो, जैसा कभी रूस में हुआ था और चीन की केन्द्रीयकृत सत्ता कमजोर पड़ जाएँ। ऐसे में फिर चीन भारत पर हावी नहीं हो पाएगा। जिसकी निकट भविष्य में कोई संभावना नहीं दिखती। ऐसे में चीन से किसी भी सहयोग या लाभ लेने की अपेक्षा रखना हमारे लिए बहुत बुद्धिमानी का कार्य नहीं होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूर दृष्टि वाले व्यक्ति हैं इसलिए आशा कि जानी चाहिए कि चीन से संबंध बनाने कि प्रक्रिया में वे इन गंभीर मुद्दों को अनदेखा नहीं करेंगे।

Monday, December 1, 2014

यथार्थवादी हो भारत की पड़ौस नीति

बराक ओबामा गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि बनने आ रहे हैं | इसी से भारत में काफी उत्साह है | भावुक लोग यह मान बैठे हैं कि अमरीका ने अपनी विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन करके पाकिस्तान की तरफ से मुंह मोड़ लिया है | अब वो केवल भारत का हित साधेगा | लेकिन ऐसा सोचना भयंकर भूल है | अमरीका की विदेश नीति भावना से नहीं ज़मीनी हकीकत से तय होती है | वह अपनी पाकिस्तान और अफगनिस्तान नीति में जल्दबाजी में कोई परिवर्तन नहीं करने जा रहा |

यही बात जापान पर भी लागू होती है | भारत मान बैठा था कि जापान चीन के मुकाबले भारत का साथ देकर भारत को मजबूत करेगा | पर अचानक जापान ने अपना रवैया बदल दिया | जापान ने आजतक भारत के पूर्वोतर राज्यों, जिनमे अरुणाचल शामिल है, को विवादित क्षेत्र नहीं माना | इसीलिए उसने पूर्वोतर राज्यों में आधारभूत ढांचा जैसे सीमा के निकट सड़क, रेल, पाईप लाइन डालने जैसे काम करने का वायदा किया था | भारत खुश था कि इस तरह जापान भारत की मदद करके अपने दुश्मन चीन से परोक्ष रूप में युद्ध करेगा | पर ऐसा नहीं हुआ | जापान ने अचानक अरुणाचल को विवादित क्षेत्र मान लिया है और यह कह कर पल्ला झाड लिया कि विवादित क्षेत्र में वह कोई विकास कार्य नहीं करेगा | दरअसल जापान को समझ में आया कि वह दूसरों की लड़ाई में खुद के संसाधन क्यों झोंके | जबकि उसके पास टापुओं के स्वामित्व को लेकर पहले ही चीन से निपटने के कई विवादित मुद्दे हैं | इस तरह हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया |

जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपनी सीमाओं पर आधारभूत ढांचा खुद ही विकसित करते | जिससे हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता | उधर चीन ने यही किया | 1986-89 की अरुणाचल की घटना के बाद, जब हमारी फौजों ने 1962 में मैकमोहन लाइन के पास वाले छोड़ दिए गये क्षेत्रों पर पुनः कब्ज़ा कर लिया तो चीन को एक झटका लगा | यह कब्ज़ा अधिकतर वायु सेना की भारी मदद से हुआ और आर्थिक दृष्टि से देश को काफी महंगा पड़ा | जिसका प्रभाव हमारी अर्थवयवस्था पर पड़ा और हमारी विदेशी मुद्रा के कोष कम हो गए | चीन नहीं चाहता था कि भारत ऐसी क्षमता का पुनः प्रदर्शन करे | इसलिए उसने तिब्बत में सीमा के किनारे आधारभूत ढाँचा तेज़ी से विकसित किया | पठारी क्षेत्र होने के कारण उसके लिए यह करना आसान था | जबकि अरुणाचल का पहाड़ कमज़ोर होने के कारण वहां लगातार भूस्खलन होते रहते हैं जिससे सड़क मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और वहां की भौगोलिक दशा भी हमारे जवानों के लिए बहुत आक्रामक हैं | जहां अरुणाचल की सीमा की दूसरी तरफ आधारभूत ढांचे के कारण चीनी सेना पूरे साल डटी रहते है वहीं हमारे जवानों को इस सीमा पर जाकर अपने को मौसम के अनुकूल ढालने की कवायत करनी होती है | जिससे हमारी प्रतिक्रिया धीमी पड़ जाती है | 

दरअसल हमारे राजनेता विदेश नीति को घरेलू राजनीति और मतदाता की भावनाओं से जोड़कर तय करते हैं, ज़मीनी हकीकत से नहीं | इसलिए हम बार-बार मात खा जाते हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि वे जो भी कहें उसमे ज़मीनी सच्चाई और कूटनीति का संतुलित सम्मिश्रण हो |
अब सीमा पर आधारभूत ढांचे के विकास की ही बात को लें तो हमारे नेताओं के हाल में आये बयान इस बात को और स्पष्ट कर देंगे | जहां चीन ने यही काम करते समय दुनिया के किसी मंच पर कभी यह नहीं कहा कि वह ऐसा भारत के खिलाफ अपनी सीमा को सशक्त करने के लिए कर रहा है| उसने तो यही कहा कि वह अपने सीमान्त क्षेत्रों का आर्थिक विकास कर रहा है | जबकि भारत सरकार के हालिया बयानों में यही कहा गया कि सीमा पर रेल या सड़कों का जाल चीन से निपटने के लिए किया जा रहा है | यह भड़काऊ शैली है जिससे लाभ कम घाटा ज्यादा होता है | 

हकीकत यह है कि हमारी सेनाओं के पास लगभग 2 लाख करोड़ रूपए के संसाधनों की कमी है | जिसकी ख़बरें अख्बारों में छपती रहती हैं | अपनी इस कमजोरी के कारण हम अपने पड़ौसीयों पर दबाव नहीं रख पाते | जिसका फायदा उठा कर वे हमारे यहां अराजकता फैलाते रहते हैं | जरूरत इस बात की है कि हमारी विदेश नीति केवल नारों में ही आक्रामक न दिखाई दे बल्कि उसके पीछे सेनाओं की पूरी ताकत हो | तभी पड़ौसी कुछ करने से पहले दस बार सोचेंगे | विदेश नीति का पूरा मामला गहरी समझ और दूरदृष्टि का है, केवल उत्तेजक बयान देने का नहीं |

Monday, December 5, 2011

क्या दक्षिणी चीन में संघर्ष होगा ?


Rajasthan Patrika 4Dec

पिछले दिनों चीन और भारत के बीच हुए वाक युद्ध को गंभीरता से लिया जाए तो इस बात की संभावना बनती है कि निकट भविष्य में भारत और चीन के बीच संघर्ष विकसित हो सकता है। पर इससे पहले कि स्थिति बिगड़े दोनों ही देशों को दक्षिणी चीन सागर की हकीकत को समझना होगा। चीन इस बात से नाराज है कि भारत के तेल व प्राकृतिक गैस आयोग की विदेशी शाखा ओ.वी.एल. वियतनाम के साथ मिलकर इस सागर में तेल की खुदाई का काम तेजी से आगे बढ़ा रही है। पिछले दिनों जब भारत के विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा हनोई गए थे तो वहां उनके और चीन के बीच इस विषय पर जो बयानबाजी हुई उससे चीन सहमत नहीं था। चीन इस क्षेत्र में अपने वर्चस्व को कायम रखना चाहता है और इस बात से खफा है कि वियतनाम, फिलीपिन्स जैसे देश उसकी चेतावनी के बावजूद भारत और अन्य देशों के साथ मिलकर इस सागर में अपनी आर्थिक गतिविधियां बढ़ा रहे हैं। 

चीन यह भूल जाता है कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर पाक अधिकृत कश्मीर में न सिर्फ महंगे सामरिक प्रोजेक्ट खड़े कर रहा है बल्कि उसने अपनी फौजें भी वहां तैनात कर रखी हैं। पाक अधिकृत क्षेत्र उसी तरह विवादास्पद है जिस तरह दक्षिणी चीन सागर। क्योंकि इस समुद्र को लेकर अमरीका भी अपने ‘राष्ट्रीय हित’ का दावा कर चुका है जिसे चीन मानने को तैयार नहीं हैं और वह इसे निर्विवाद रूप से अपना अधिकार क्षेत्र मानता है। यह बात दूसरी है कि सागर में प्राकृतिक तेल निकालने का जो प्रयास आज चर्चा में आया है उसकी शुरूआत तो मई 2006 में हुई थी जब भारत और वियतनाम के बीच इस आशय का समझौता हुआ था। वैसे इस क्षेत्र से तेल निकाले का काम तो 2003 में ही शुरू हो गया था। तो अब चीन इतना शोर क्यों मचा रहा है ? 

Punjab Kesari 5Dec
जबकि यह बात अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में मानी गई है कि तट से 200 नाटिकल मील दूर तक का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की दृष्टि से उसी देश का माना जाएगा जिसके तट से सागर लगा होगा। पर इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे समुद्र से व्यावसायिक जल पोतों का आवागमन नहीं होगा। बल्कि उनके स्वतंत्रापूर्वक आने-जाने की आम सहमति है। इतना ही नहीं संचार से जुड़े तार बिछाने की भी छूट सब देशों को है। इसलिए चीन का फड़फड़ाना किसी के गले नहीं उतर रहा है। सामरिक परिस्थितियों के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन चाहे फड़फड़ाए जितना वह इस सागर को लेकर कोई बड़ा विवाद खड़ा करने नहीं जा रहा है, जिसका कारण बड़ा साफ है। वियतनाम और भारत के साथ चीन का अरबों रूपए का द्विपक्षीय व्यापार है। वियतनाम के साथ तो चीन के आर्थिक संबंधों की एक लंबी कड़ी है। वियतनात उन अतिविशिष्ट देशों में हैं जहां चीन का विनियोग सबसे ज्यादा है। यह बात दूसरी है कि कुछ विशेषज्ञ भारत से चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाने की अपेक्षा रखते हैं। वे कहते हैं कि वियतनाम का तो चीन के खिलाफ लड़ने का इतिहास है। छोटा होते हुए भी वियतनाम दबने वाला नहीं हैं। वियतनाम ही क्यों दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों का महासंघ (आसियान) भी चीन की दादागिरी से विचलित है और चाहता है कि भारत आसियान के पक्ष में सामरिक रूप से खड़ा रहे और चीन के इस सागर में बढ़ते साम्राज्यवादी दावों को खारिज करने में उनकी मदद करे। ऐसे में भारत को बहुत सोच-समझ कर कदम उठाने होंगे।

दरअसल भरत इस मामले में शुरू से सजग रहा है। भारत की नौसेना के 2007 के दस्तावेजों में समुद्र संबंधी भारतीय नीति में अरब सागर से दक्षिण चीन सागर तक के बीच भारतीय हितों को रेखांकित किया गया है। 1910 में भारत उन 12 देशों में से था जिन्होंने अमरीका के इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि दक्षिणी चीन सागर का मामला द्विपक्षीय मामला न होकर बहुपक्षीय मामला है। जुलाई 2011 में भी भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का इस सागर में आर्थिक हित है और भारत इसके स्वतंत्र समुद्री मार्ग होने की बात को समर्थन करता है। 

कारण साफ है कि सागर का यह हिस्सा प्रशांत महासागर और हिन्द महासागर के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है। एशिया प्रशांत देशों के बीच होने वाले भारत के व्यापार का आधे से ज्यादा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर जाता है। इतना ही नहीं जापान और कोरिया जैसे देशों को उनकी ऊर्जा की आवश्यकतापूर्ति के लिए भारत से की जा रही तेल की आपूर्ति भी इसी मार्ग से होकर की जाती है। अगर चीन इस इलाके पर अपनी दादागिरी जमाता है तो भारत का इन देशों से व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा। इसलिए भारत ऐसा कभी नहीं होने देगा। 

भारत के नौसेना प्रमुख एडमिरल निर्मल वर्मा का यह सुझाव प्रशंसनीय है कि भारत और चीन को दक्षिण चीन सागर के संबंध में एक साझी नौसैनिक समिति का गठन कर देना चाहिए जिससे इस क्षेत्र में आए दिन उठने वाले विवादों का यह समिति गंभीरता से विचार कर समाधान निकाल सके। इससे अनावश्यक संघर्ष की स्थिति पैदा नहीं होगी। यह ठीक वैसी ही समिति होगी जैसी भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना ने मिलकर घुसपैठ बनाई है जो युद्धविराम की स्थिति में यथासंभव विवादों का शांतिपूर्ण हल खोजती रहती है। आज पूरी दुनिया, विशेषकर विकसित राष्ट्र आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं और चीन एवं भारत भी अपनी आर्थिक प्रगति की दर को कायम रखने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे माहौल में नाहक संघर्ष एशिया के इन दोनों ही देशों की उभरती आर्थिक भूमिका को करारा झटका दे सकता है, जिसके लिए शायद दोनों ही देश तैयार नहीं होंगे।