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Monday, July 31, 2017

जमीन से जुड़े शहरी विद्यालयों के छात्र

पिछले हफ्ते हमने ब्रज के एक गांव में पौराणिक नाग-पंचमी का मेला आयोजित किया। जिसमें पिछले 3 वर्षों से लगभग बीस हजार ब्रजवासी उत्साह से भाग ले रहे हैं। हमें लगता था कि टी.वी. सीरियलों और यू-ट्यूब के युग में सांस्कृतिक परंपराएं लुप्त हो रही हैं। पर इस तरह के कई मेले, ब्रज में दशाब्दियों बाद दोबारा शुरू करने के बाद, हमें विश्वास हो गया कि लोक संस्कृति की जड़े गहरी हैं। यह सही है कि आज गांवों की शादियों में डी.जे. के कर्कश शोर ने महिलाओं के सारगर्भित लोकगीतों को दबा दिया है। पर अवसर मिलने पर वे स्वयं स्फुरित हो जाते हैं। उनका भाव और शैली मन को छू लेती है। ऐसे मेलों में लोक कलाकारों और ग्रामीण प्रतिभाओं को उभरने का मौका मिलता है। तब पता चलता है कि ‘इंडियन आइडियल’ या ‘डांस इंडिया डांस’ जैसे टीवी शो भी अभी गांवों को प्रदूषित नहीं कर पाऐ हैं। गांव के बच्चे कहीं ज्यादा समझदारी से और सार्थक विषयों पर अपनी बात रखने को उत्साहित रहते हैं।

इस बार हमने एक प्रयोग और किया। गांव के इस लोकप्रिय मेले में मथुरा शहर के प्रमुख विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को अपनी-अपनी प्रस्तुतियां देने को आमंत्रित किया। इसका बहुत सुखद अनुभव हुआ और कई लाभ प्राप्त हुए। सुखद अनुभव, इस बात का कि आधुनिक शिक्षा पा रहे, हमारे शहरी बच्चे भी सही प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिलने पर सांस्कृतिक, सामाजिक या पर्यावरण संबंधी विषयों पर कितनी स्पष्ट समझ और सोच रखते हैं। उनकी प्रस्तुतियों ने न सिर्फ हजारों ग्रामवासियों का मन मोहा बल्कि कई सार्थक संदेश भी दिये। जिस आत्मविश्वास के साथ इन शहरी बच्चों ने देहाती माहौल में, बिना संकोच के, अपनी प्रस्तुतियां दीं, उससे ग्रामीण बच्चों को भी बहुत प्रेरणा मिली।

इस दिशा में कई अभिनव प्रयोग देश में चल रहे हैं। ‘प्रदान’, ‘अजय पीरामल फाउंडेशन’, ‘इच वन-टीच वन’ जैसी कई संस्थाऐं मुहिम चलाकर, ग्रामीण विद्यालयों में शहरी स्वयंसेवक भेज रही हैं। जो अपने व्यापक अनुभव को गाँव के सीमित दायरे में रहने वाले, शिक्षकों और विद्यार्थियों से खुलकर बांट रहे हैं। शुरू की हिचक के बाद, उन्हें ग्रामीण विद्यालय स्वीकार कर लेते हैं। फिर देखते ही देखते, पूरे विद्यालय के वातावरण में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ऐसा परिवर्तन, जो मात्र सरकारी नीतियों से दशाब्दियों में नहीं आता। इसलिए चीन के कामरेड माओ की तरह मोदी जी को ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ में एक नीतिगत शुरूआत करवानी चाहिए। जिसके तहत हर शहरी स्कूल के बच्चों तथा अध्यापकों को महीने में एक दिन अपनी गतिविधियां, आसपास के देहातों के विद्यालयों आयोजित करना अनिवार्य हो। इससे दो लाभ होंगे, एक तो ग्रामीण विद्यालय को शहरी विद्यालय के मुकाबले अपने स्तर का पता चलेगा और उसमें भी वैसा कुछ करने की ललक बढ़ेगी। दूसरा हमेशा जमीनी हकीकत से कटे रहने वाले शहरों के मध्यम वर्गीय व उच्च वर्गीय विद्यार्थियों को भारत की असलियत को निकट से देखने और समझने का अवसर मिलेगा। इस विषय में मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत अनूठा है।

1974 में जब मैं 18 वर्ष का था। शहर के संपन्न परिवार में परवरिश होने के कारण, मैं गांव के जीवन से अनभिज्ञ था। उन्ही दिनों मुरादाबाद के पास, अमरपुरकाशी गांव के ठा. मुकुट सिंह, अपनी आस्ट्रेलियन पत्नी के साथ लंदन से, अपने गांव का विकास करने आए। उनके इस साहसिक और अनूठे कदम ने मुझे उनके गांव जाने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरू में मैं ग्रीष्मावकाश के लिए गया। गांव बहुत पिछड़ा और गरीब था। पर वहां के लोगों की सरलता ने मेरा मन मोह लिया। फिर तो मैं लगभग हर हफ्ते वहां जाने लगा और एम.ए. पास करने के बाद, मैंने एक वर्ष, उसी गांव में स्वयंसेवक के रूप में रहने का मन बनाया। वहां देश-विदेश के अन्य युवा भी आकर रहते थे।

अभावों में भी मुकुट सिंह जी और उनकी पत्नी के त्याग, स्नेह और प्रशिक्षण ने, हमें पूरी तरह बदल दिया। अब मुझे पैसे के पीछे भागने की कोई चाहत नहीं थी। क्योंकि जमीनी हकीकत से परिचय हो जाने के बाद, एक ही जुनून था कि जो कुछ करूंगा, समाज के हित के लिए करूंगा। चाहे कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े। आज उस अनुभव को 40 वर्ष हो गये। पर सोच नहीं बदली। पत्रकारिता की, तो डंके की चोट पर की। किसी को ब्लैकमेल करने या अपना चैनल खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को मजबूती के साथ व्यवस्था के सामने रखने के लिए की। प्रभुकृपा से पत्रकारिता में देश में कई बार इतिहास रचा। गत 15 वर्षों से ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण की नैसर्गिक और सांस्कृतिक लीलास्थलियों को सजाने-संवारने में जुटा हूँ, तो यहां भी प्रभु नित्य नया इतिहास रच रहे हैं। न पत्रकारिता की डगर आसान थी और न ब्रज सेवा की आसान है। पर उनकी ही कृपा से विपरीत परिस्थितियां भी डिगा नहीं पातीं। कुछ पाने की चाहत कभी नहीं रहती। केवल कर्म करने में ही आनंद आता है। इसलिए मैं अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि हर विद्यार्थी को, जिसका जन्म शहरों के संपन्न परिवारों में हुआ हो, नौकरी या व्यवसाय शुरू करने से पहले, कम से कम एक वर्ष किसी पिछड़े गांव में रहने का अनुभव अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन के प्रति दृष्टि पूरी तरह बदल जाती है।

Monday, June 13, 2016

कुरान, ग्रंथसाहब व शास्त्रों को मानने वाले शराब क्यों पीते हैं ?

अन्ना हजार ने फौज की वर्दी उतारकर अपने गांव रालेगढ़ सिद्धी को सबसे पहले शराबमुक्त किया। क्योंकि परिवारों में दुख, दारिद्र और कलह का कारण शराब होती है। पर उनके ही स्वनामधन्य शिष्य दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली में महिलाओं के लिए विशेष शराब की दुकानें खोल रहे हैं। जहां केवल महिलाएं शराब खरीदकर पी सकेंगी। जबकि वे खुद पंजाब, राजस्थान, गोवा, बिहार राज्यों में जाकर नीतीश कुमार के साथ और अपनी पार्टी की ओर से शराब के विरोध में जनसभाएं कर रहे हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। हर राजनेता के दो चेहरे होते हैं। केजरीवाल अब राजनेता बन गए हैं, तो उन्हें अधिकार है कि कहें कुछ और करें कुछ।

पर सवाल उठता है कि हमारी मौजूदा केंद्रीय सरकार, जो सनातन धर्म के मूल्यों का सम्मान करती है। उसकी शराबनीति क्या है ? ये तो मानी हुई बात है कि इस तपोभूमि भारत में विकसित हुए सभी धर्म जैसे सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म आदि हर किस्म के नशे का विरोध करते हैं। हमने आजादी की एक लंबी लड़ाई लड़ी। क्योंकि हम विदेशी भाषा से, विदेशियों की गुलामी से, शराब से और गौवंश की हत्या से आजादी चाहते थे। आजादी की लड़ाई में भारत के हर बड़े नेता और क्रांतिकारी ने भारत को शराबमुक्त बनाने का सपना देखा और वायदा भी किया। पर आज आजादी के 68 साल बाद भी देश का शराबमुक्त होना तो दूर शराब का मुक्त प्रचलन होता जा रहा है। मंदिर हो या गुरूद्वारा, मस्जिद हो या मठ, स्कूल हो या अस्पताल, सबके इर्द-गिर्द शराब की दुकानें धड़ल्ले से खुलती जा रही हैं। सरकार की आबकारी नीति शराब से कमाई करने की है। जबकि सच्चाई यह है कि शराब इस देश के करोड़ों गरीब लोगों को बदहाली के गड्ढे में धकेल देती है। कितनी महिलाएं और बच्चे शराबी मुखिया से प्रताड़ित होते हैं। गरीब मजदूर शराब पीकर असमय काल के गाल में चले जाते हैं। शराब की मांग को देखते हुए नकली शराब का कारोबार खुलकर चलता है और अक्सर सैकड़ों जानें चली जाती हैं।

देश की आधी आबादी महिलाओं की है, जो शराब नहीं पीती। 25 फीसदी आबादी बच्चों की है, जो शराब नहीं पीते। कुल देश की 25 फीसदी आबादी बची, जिसमें हम और आप जैसे भी बहुत बड़ी तादाद में हैं, जो शराब को छूते तक नहीं। कुल मिलाकर बहुत थोड़ा हिस्सा होगा, जो शराब पीता है। पर उस थोड़े से हिस्से के कारण पूरा समाज बर्बाद हो रहा है। महात्मा गांधी ने कहा था कि, ‘अगर मैं तानाशाह बन जाऊं, तो 24 घंटे के अंदर बिना मुआवजा दिए सारी शराब दुकानें बंद कर दूंगा।’, वही महात्मा गांधी, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी तक राष्ट्रपिता कहती हैं। हम अपने राष्ट्रपिता की कैसी संतान हैं कि उनकी भावनाओं की कद्र करना भी नहीं सीखे।

आज पंजाब में सबसे ज्यादा शराब का प्रचलन है। पर सिख धर्म को प्रतिपादित करने वाले मध्ययुगीन संत गुरूनानकदेव जी कहते हैं कि, ‘नाम खुमारी नानका, चढ़ी रहे दिन-रात, ऐसा नशा न कीजिए, जो उतर जाए परभात’। तुम शराब पीते हो, तो सुबह को तुम्हारा नशा उतर जाता है। पर एक बार भगवतनाम का नशा करके तो देखो, जिंदगीभर नहीं उतरेगा। हमारा कौन-सा धर्म ग्रंथ या धर्मगुरू ऐसा है, जो हमें शराब पीने की इजाजत देता है। ये रमजान का पाक महीना है और इस्लाम में शराब हराम है।

इस लेख को कश्मीर को कन्याकुमारी और गुजरात से असम तक अलग-अलग अखबारों में पढ़ने वाले मुसलमान भाई अपने सीने पर हाथ रखकर बताएं कि क्या उनमें से सभी ऐसे हैं, जिन्होंने कभी शराब नहीं पी ? अगर पीते हो, तो अपने को मुसलमान क्यों कहते हो ? शराबी न मुसलमान हो सकता है, न सिख हो सकता है, न हिंदू हो सकता है, न बौद्ध हो सकता है और न ही जैन हो सकता है। शराबी तो केवल एक हैवान हो सकता है। विड़बना देखिए कि हमारी सरकारें इंसान को देवता बनाने की बजाए हैवान बनाती हैं। दिनभर कमा। शाम को दारू पी। अपने घर जाकर औरत को पीट। बच्चों को भूखा मार और फिर बीमार पड़कर इलाज के लिए अपना घर भी गिरवी रख दे। जिससे शराब बनाने वालों की तिजोरियां भर जाएं। इतना ही नहीं, जहां शराब बनती है, वहां शराब के कारखानों से निकलने वाला जहर आसपास की नदियांे और पोखरों को जहरीला कर देता है। पर्यावरण को नष्ट कर देता है। पर हमारा पर्यावरण मंत्रालय इतना उदार है कि वो धृतराष्ट्र की तरह आंखों पर पट्टी बांधकर शराब के कारखानों को बेदर्दी से पर्यावरण का विनाश करने की खुली छूट देता है।

पर्यावरण मंत्रालय ही नहीं, खाद्य मंत्रालय भी इस साजिश का हिस्सा है। जान-बूझकर सरकारी गोदामों में खाद्यान्न को सड़ने दिया जाता है। फिर इस सड़े हुए अनाज को मिट्टी के दाम पर शराब निर्माताओं को बेच दिया जाता है। जो इस सड़े अनाज से शराब बनाते हैं और अरबों रूपया कमाते हैं। 

इस दिशा में एक सार्थक पहल ‘इंसानियत धर्म संगठन’ ने की है, जो देश के सभी धर्म के गुरूओं, संतों, सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित लोगों और विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को एक मंच पर लाकर ‘शराबमुक्त भारत’ का अभियान चला रहा है। इस अभियान के संयोजक दास गौनिंदर सिंह कहते हैं कि, ‘यह चुनौती तो हमारे दबंग प्रधानमंत्री के सामने है, जो खुद आस्थावान हैं और शराब को हाथ नहीं लगाते और डंके की चोट पर जो चाहते हैं, वो कर देते हैं। उन्होंने गुजरात में शराब पहले ही प्रतिबंधित कर रखी थी, उन्हें अब इस नई जिम्मेदारी के साथ शराब की भयावहता को समझकर इसके अमूल-चूल नाश की कार्ययोजना बनानी चाहिए। ऐसा किया तो देश की तीन चैथाई आबादी मोदीजी के पीछे खड़ी होगी।’

Monday, May 23, 2016

कुंभ मेरी नजर में

भगवत गीता में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि उनकी शरण में 4 तरह के लोग आते हैं, आर्त, अर्थारतु, जिज्ञासु व ज्ञानी। यह सिद्धांत हाल ही में संपन्न हुए सिंहस्थ कुंभ में बहुत साफतौर पर उजागर हुआ। एक तरफ उन लाखों लोगों का समूह वहां उमड़ा, जो अपने जीवन में कुछ भौतिक उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं। कुंभ में आकर उन्हें लगता है कि उनके पुण्य की मात्रा इतनी बढ़ जाएगी कि उनके कष्ट स्वतः दूर हो जाएंगे।
दूसरी भीड़ उन साधन संपन्न सेठ और व्यापारियों की थी, जो अपने व्यापार की वृद्धि की कामना लेकर कुंभ में विराजे हुए संतों के अखाड़ों में नतमस्तक होते हैं। तीसरी भीड़ उन लोगों की थी, जो वहां इस उद्देष्य से आए थे कि उन्हें संतों का सानिध्य मिले और वे भगवान के विषय में कुछ जानें और अंतिम श्रेणी में वे लोग वहां थे, जिन्हें संसार से कुछ खास लेना-देना नहीं। उनको तो धुन लगी है, केवल भगवत प्राप्ति की। स्पष्ट है कि चारों श्रेणी के लोगों को अपनी मनोकामना पूर्ण होती दिखी होगी, तभी तो वे ऐसे हर कुंभ या उत्सव में कष्ट उठाकर भी शामिल होते हैं।
जो बात इस बात कुंभ में उभरी, वो यह कि कुंभ अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। पहले कुंभ एक मौका होता था, जहां सारे देश के संत-महात्मा और विद्वतजन बैठकर उन प्रश्नों के समाधान खोजते थे, जिनमें प्रांतीयस्तर पर हिंदू समाज उद्वेलित रहता था। कुंभ से जो समाधान मिलता था, वह सारा देश अपना लेता था। अब शायद ऐसा कुछ नहीं होता और अगर होता भी है, तो उसका स्वरूप आध्यात्मिक कम और राजनैतिक ज्यादा होता है। यही बात अखाड़ों पर भी लागू होती है। शुद्ध मन से कुंभ आने वाले संत अपनी साधना में जुटे रहते हैं, उनके अखाड़ों में वैभव की छाया भी नहीं रहती। पर दूसरी तरफ इतने विशाल और वैभवशाली अखाड़े बनते हैं कि 5 सितारा होटल के निर्माता भी शर्मा जाएं। इस प्रकार की आर्थिक असमानता कुंभ के सामाजिक ताने-बाने को असंतुलित कर देती है, जिसकी टीस कई संतों के मन में देखी गई।
कलियुग का प्रभाव कहकर हम भले ही अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लें, पर हकीकत यह है कि अपने सभी तीज-त्यौहारों का स्वरूप अब व्यवसायिक होता जा रहा है। कुंभ में इसका प्रभाव व्यापक रूप से देखने को मिलता है। यह स्वस्थ लक्षण नहीं है। इस पर सरकार को या धर्माचार्यों को विचार करके पूरे कुंभ का स्वरूप आध्यात्मिक बनाना चाहिए। अन्यथा कुंभ और शहरों में लगने वाली आम नुमाइंशों में कोई भेद नहीं रह जाएगा।
यह सही है कि हम सब इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि सरलता का जीवन अब हमसे कोसों दूर हो गया है। जबकि तीर्थ जाना या कुंभ में जाना तपस्यचर्या का एक भाग होना चाहिए, तभी हमारी आध्यात्मिकता चेतना और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।

हमेशा से कुंभ के बारे में अंतिम निर्णय अखाड़ा परिषद् का रहता है। यह बात सही है कि सरकारें हजारों करोड़ रूपया कुंभ के आयोजन में खर्च करती हैं, पर वह तो उनका कर्तव्य है।
यही बात व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी सोचनी चाहिए कि हर चीज बिकाऊ माल नहीं होती। कम से कम धर्म का क्षेत्र तो व्यापार से अलग रखें। कुंभ ही क्या, आज तो हर तीर्थस्थल पर भवन निर्माताओं से लेकर अनेक उपभोक्ता सामिग्री बेचने वालों ने कब्जा कर लिया है। जो अपने विशाल होर्डिंग लगाकर उस स्थान की गरिमा को ही समाप्त कर देते हैं। इसका विरोध समाज की तरफ से भी होना चाहिए। तीर्थस्थलों व कुंभस्थलों पर जो भी विज्ञापन हों, वो धर्म से जुड़े हों। उसके प्रायोजक के रूप में कोई कंपनी अपना नाम भले ही दे दे, पर अपने उत्पादनों के प्रचार का काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे आने वाले श्रद्धालुओं का मन भटकता है और उनके आने का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।
दरअसल धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कार हमारी चेतना का अभिन्न अंग हैं। समाज कितना भी बदल जाए, राजनैतिक उठापटक कितनी भी हो ले, व्यक्तिगत जीवन में भी उतार-चढ़ाव क्यों न आ जाएं, पर यह चेतना मरती नहीं, जीवित रहती है। यही कारण है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद मानव सागर सा ऐसे अवसरों पर उमड़ पड़ता है, जो भारत की सनातन संस्कृति की जीवंतता को सिद्ध करता है।
आवश्यकता इस बात की है कि सभी धर्मप्रेमी और हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले राजनैतिक लोग अपने उत्सवों, पर्वों और तीर्थस्थलों के परिवेश के विषय में सामूहिक सहमति से ऐसे मापदंड स्थापित करें कि इन स्थलों का आध्यात्मिक वैभव उभरकर आए। क्योंकि भारत का तो वही सच्चा खजाना है। अगर भारत को फिर से विश्वगुरू बनना है, तो उपभोक्तावाद के शिकंजे से अपनी धार्मिक विरासत को बचाना होगा। वरना हम अगली पीढ़ियों को कुछ भी शुद्ध देकर नहीं जाएंगे। वह एक हृदयविदारक स्थिति होगी।

Monday, February 15, 2016

आधुनिक विकास के असली मायने

आज चारों ओर देश में दो तरह का माहौल है। एक तरफ तो विकास के लंबे-चैड़े लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे है और दूसरी ओर राष्ट्रवादी सनातन चिंतन से जुड़े लोग इस बात को लेकर परेशान हैं कि हम इतना कुछ खोकर भी विकास के पश्चिमी माॅडल को पकड़े बैठे हैं। जिससे विकास होना तो दूर आम हिंदुस्तानी के नैसर्गिक अधिकार तक छिनते जा रहे हैं। आज साफ पानी, हवा और जमीन सपने की बात हो गई है।
 
पिछले 60 वर्षों से या यूं कहिए कि जब से रूस में समाजवादी क्रांति हुई है, तब से दुनिया में योजनाबद्ध विकास का एजेंडा तय हो गया है। भारत ने भी पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से विकास का कार्यक्रम तय किया। पर तीसरी योजना आते-आते 1966 में ये महसूस हुआ कि इस माॅडल से वांछित परिणाम नहीं आ रहे। इसलिए तीन वर्ष का विकास अवकाश कर दिया गया। चैथी योजना 1969 में कृषि पर जोर देते हुए शुरू हुई। पर यहां भी हरित क्रांति का नारा देकर भारत की देशी कृषि को मटियामेट कर दिया गया। आज इसी का परिणाम है कि कृषि न तो पेट भरने का माध्यम रह गई और न ही आर्थिक प्रगति का।
 
दरअसल विकास की आधुनिक अवधारणा ही भ्रामक है। वुल्फगांग झेकस की अंग्रेजी पुस्तक ‘द आर्कियोलाॅजी आॅफ डेवलपमेंट आइडिया’ (विकास के खंडहर) में इस अवधारणा की बड़ी रोचक व्याख्या की गई। उसका अवलोकन करना हम सबके हित में रहेगा। झेकस कहते हैं कि विकास का अर्थ है - प्राकृतिक संपदा के सर्जनहार के विरूद्ध युद्ध का शंखनाद। प्राकृतिक संपदा के उपयोग के लिए ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित तर्कपूर्ण व न्यायिक विश्व व्यवस्था को भंग करना। अपने स्वार्थ के लिए हिंसा और शोषण के तौर-तरीके और घातक हथियारों को बनाना और उनकी मदद से दुनियाभर की प्राकृतिक संपदाओं की दैत्यकारी लूट करना। जिससे पूरी दुनिया की प्राकृतिक संपदा का तेजी से विनाश हो रहा है।
 
झेकस आधुनिक विकास की परिभाषा देते हुए आगे कहते हैं कि इस विकास में आध्यात्मिक गुणों के विकास के लिए कोई भी संभावना नहीं है। इतना ही नहीं जो कुछ आध्यात्मिक ताना-बाना किसी भी समाज में उपलब्ध है, चाहे वह हिंदू समाज हो, मुसलमान समाज हो या बौद्ध समाज हो, उसे नष्ट-भ्रष्ट कर देना और उसकी जगह हिंसा, सेक्स और शोषण का विस्तार करना। ताकि आम जनता इन्हीं मकड़जालों में उलझकर रह जाए और क्रमशः महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी एवं दुराचारिता की चक्की में पिसती चली जाए।
 
इसके साथ ही आधुनिक विकास का एक और घिनौना चेहरा है कि वह झूठ के प्रचार प्रसार को मान्यता देता है। वह भी इतने कलात्मक और रोचक तरीके से कि आपको जहर भी अमृत बताकर बेच दिया जाए। यह सारा विज्ञापन जगत इसी का सहारा लेकर हम सबके जीवन में विष घोल रहा है। अब से 50 वर्ष पहले भी प्रजा के सामने राजा का झूठ बोलना घोर अनैतिकता माना जाता था। चाहे वो गांव का प्रधान हो, सूबे का मुख्यमंत्री हो या देश का राजा हो। उसे अपने आचरण में नैतिक मूल्यों को सम्मान देना होता था। पर आधुनिक विकास तकनीकि और संचार के आधुनिक माध्यमों का सहारा लेकर प्रजा को मूर्ख बनाने की छूट देता है। आप टेलीविजन के माध्यम से झूठे भाषण भी इस तरह दे सकते हैं कि सामने वाला आपकी बात पर विश्वास कर ले। इसलिए अब हमारे नेताओं को सामाजिक स्वीकृति की चिंता नहीं होती।
 
संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के गठन के बावजूद आधुनिक विकास विश्वशांति के नाम पर विश्व अशांति का कारोबार करता है। क्योंकि इन सब संस्थाओं का नियंत्रण अप्रत्यक्ष रूप से हथियार निर्माताओं के हाथ में रहता है, जो दुनिया में सैकड़ों जगह युद्ध कराने का कारण हैं। लड़े कोई, हारे-जीते कोई, मुनाफा इनका ही होता है और उन देशों की संपदा और मानव हानि ऐसे युद्धों में कई गुना बढ़ जाती है।
 
आधुनिक विकास का एक और छद्म चेहरा है पूरी दुनिया को एक करना। एक-सा शासन, एक-सा कानून, एक-सी मुद्रा और एकीकृत व्यापार की स्थापना। इस प्रक्रिया में स्थानीय परंपराओं, सामाजिक ताने-बाने, सदियों से संजोया गया अनुभवजन्य ज्ञान, धार्मिक विश्वास, नैतिक व्यवस्थाएं और भौगोलिक विभिन्नता, सबको तिलांजलि दी जा रही है। सारी दुनिया एक-सी विद्रूप और घुटनभरी बनती जा रही है। विकास की इस व्यवस्था में न्याय की भी बलि दे दी जाती है।
 
न्यायिक संस्थाओं के नाम पर अन्यायपूर्ण कानूनों की स्थापना की जाती है और न्याय केवल पैसे से खरीदा जा सकता है। इसलिए कितना भी विनाश एवं अत्याचार दुनिया में क्यों न हो, पर इसको करने वाले बड़े लोग कभी पकड़े नहीं जाते। जबकि मजबूरी में छोटी-मोटी आपराधिक गतिविधि करने वाले आम आदमी इस कानून की बलि चढ़ा दिए जाते हैं।
 
आधुनिक विकास में सबसे बड़ी दानवीय यह आधुनिक बैकिंग व्यवस्था है, जो छद्म संपत्ति का सृजन कर पूरी दुनिया को मूर्ख बना रही है और आम आदमी को प्लास्टिक के कार्ड पकड़ाकर कर्जे में फंसाती जा रही है। इस हद तक कि गरीब किसान ही नहीं, व्यापारी और उद्योगपति तक इस जाल में फंसने के बाद आत्महत्या के अलावा और कोई विकल्प नहीं सोच पाता। इस सबसे स्पष्ट है कि आधुनिक विकास धर्म का विनाश कर अधर्म का विकास कर रहा है।
 
विकास के इस नाटक को केवल भारत की सनातन संस्कृति और शिक्षा पद्धति के माध्यम से तोड़ा जा सकता है। ऐसे ही विषयों पर आगामी 27-28 फरवरी को अहमदाबाद के हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला (गुरूकुलम) में देशभर के 500 विद्वान इकट्ठा हो रहे हैं। मुझे इस महासंगम में विद्वानों के विचार सुनने की बहुत उत्सुकता है। इस संगम के बाद उन विचारों के मंथन से जो माखन प्राप्त होगा, उसे आकर आप सबसे बांटूंगा।

Monday, February 8, 2016

हम क्यों कर रहे हैं उपजाऊ भूमि का विनाश ?

 एक तरफ तो हम बढ़ती आबादी का रोना रोते हैं। दूसरी तरफ हम अपनी खेती योग्य जमीन को दैत्यों की तरह बर्बाद कर रहे हैं। इस आत्मघाती विकास से हम अपने भविष्य के लिए भीषण खाद्य संकट पैदा होने के हालात बना रहे हैं। यूं तो आजादी के बाद देश में कृषि, ग्रामीण विकास व जल संसाधन जैसे मंत्रालय बने, जिनके मंत्री और अफसर विदेशों में ज्ञान लेने के बहाने भागते रहे। पर क्या वजह है कि इन सबके होते हुए भी देश में कुल 33 करोड़ हेक्टेयर की तिहाई भूमि बंजर है और लगातार बढ़ रही है। जैसे गोबी मरुस्थल से उड़ी धूल उत्तर चीन से लेकर कोरिया के उपजाऊ मैदानों को ढक रही है, उसी तरह थार मरुस्थल की रेत उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों को निगल रही है। अरावली पर्वत काफी हद तक धूल भरी आंधियों को रोकने का काम करता है, लेकिन अंधाधुंध खनन की वजह से इस पर्वतमाला को नुकसान पहुंच रहा है, जिससे यह धूल भरी आंधियों को पूरी तरह नहीं रोक पा रही है। उधर हर साल 84 लाख टन भूमि के पोषक तत्व बाढ़ आदि की वजह से बह जाते हैं। कीटनाशक भी हर साल 1.4 करोड़ वर्ग किमी भूमि की उर्वरकता खत्म कर रहे हैं। इसी तरह लवणीयता और क्षारपन भी हर साल 270 हजार वर्ग किमी क्षेत्र को बंजर बना रहे हैं। 
 
अणुबम से भी घातक कैमिकल्स, कीटनाशक दवाएं, रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के अमर्यादित प्रयोग से भूमि बंजर बन रही हैं। साथ ही साथ उद्योगों से निकला प्रदूषित जल वाष्पित होकर ऊपर जाता है। फिर प्रदूषित एवं क्षारीय जल की वर्षा से भूमि पूर्णतया बंजर बन रही है। इसी प्रकार इन दवाओं का प्रयोग होता रहा तो अगले 50 वर्षों में सारे देशवासी भयानक रोगों से ग्रस्त जाएंगे। 
 
हाल के वर्षों में औद्योगिक कचरे से भी भूमि और जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। उद्योगों से निकले कचरे और प्रदूषित जल को नदियों में छोड़े जाने से भूतलीय और भूमिगत जल प्रदूषित हो गया है। इस तरह के प्रदूषित जल का सिंचाई के लिए इस्तेमाल किए जाने से जमीन भी खराब हो गई है। ताजा अनुमानों के अनुसार इस सबसे 34,500 हेक्टेयर भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके साथ ही भारी मात्रा में पाॅलीथिन और प्लास्टिक का कचरा पृथ्वी की उर्वरकता को तेजी से खत्म कर रहा है, क्योंकि यह कचरा गलता नहीं है। इसलिए यह जमीन के लिए बहुत ही घातक है। जिस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए, लेकिन न तो केंद्र सरकार ऐसा कर पा रही हैं और न राज्य सरकारें। 
 
जमीन में बोरिंग करके अंधाधुंध पानी खींचने से पृथ्वी के भीतर भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आई है। जिससे जमीन की नमी खत्म हुई है और रेगिस्तान बढ़ता जा रहा है। फिर भी हमें अक्ल नहीं आ रही। 1947 में देश में एक हजार ट्यूबवेल थे, जिनकी तादाद अब 2.10 करोड़ है। इससे भूमिगत पानी की सतह तेजी से नीचे होती जा रही है। इसी तरह औद्योगिकरण के इस दौर में समुद्री तटों के आसपास मनुष्यों के रहने लायक स्थिति नहीं बची है। क्योंकि आए दिन समुद्री पानी से भूमि का कटाव होकर खारा पानी आबादी क्षेत्र में 30 से 100 किमी तक प्रवेश करने लगा है। गुजरात के जामनगर, द्वारिका, जूनागढ़, भावनगर और अमरैली के तटीय गांव उजड़ने की कगार पर हैं। जिसका एक मात्र कारण तटीय जमीन का अत्यधिक कटाव किया जाना है। इतना ही नहीं बल्कि देश में हो रहे बेरोकटोक अंधाधुंध खनन से जमीन पोली हो रही है। भूचाल के खतरे बढ़ रहे हैं और इससे होने वाले प्रदूषण से भूमि बंजर हो रही है। 
 
खानों का कचरा खुले में फैलने से व सीमेंट उद्योग के लिए चूना-पत्थर और चीनी मिट्टी उद्योग के लिए
कैल्साइट और खडि़या पत्थर की पिसाई से जो धूल उड़ती है, वह आसपास की उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर देती है। नब्बे फीसदी खान मालिकों द्वारा खुली खदान प्रणाली के जरिये खनन कार्य किया जा रहा है। खनन पूरा हो जाने के बाद उस क्षेत्र को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है। इसे फिर सही करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता। जिससे पूरा क्षेत्र हमेशा के लिए बर्बाद होकर रेगिस्तान बन जाता है। 
 
वनस्पतियों का विनाश भी जमीन को बंजर बनाने का कारण है। मरुस्थलीयकरण का सबसे पहला शिकार पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ होती हैं। जमीन पर बढ़ते दबाव से पेड़-पौधों और वनस्पतियों के हृास में खतरनाक वृद्धि हो रही है। गाँवों के आस-पास चरागाहों की जमीन बुरी तरह बर्बाद हुई है, क्योंकि उसकी सबसे अधिक उपेक्षा और सबसे ज्यादा दोहन हुआ है। इस प्रकार उपजाऊ भूमि भी रेगिस्तान बनती जा रहे है। 
 
हमारे प्रधानमंत्री को भारत के किसानों और उनकी जमीनों की गिरती उर्वरकता की गहरी चिंता रही है। ऐसा वे अपने वक्तव्यों से संकेत देते रहे हैं, लेकिन अभी तक इस समस्या का कोई ठोस समाधान भारत सरकार आजादी के बाद से नहीं दे पाई है। नतीजतन, यह विनाश बेरोकटोक जारी है। जिस पर प्रधानमंत्री और उनके संबंधित मंत्रालयों को गंभीरता से सोचना चाहिए और कृषि योग्य भूमि के संरक्षण को प्रोत्साहित करते हुए उसका विनाश करने वालों से कड़ाई से निपटना चाहिए। 

Monday, August 31, 2015

इन्द्राणी मुखर्जी: हमारी रोल मॉडल नहीं

ऐसी शोहरत, ग्लैमर व ताकत की चमक-दमक वाली दुनिया के सितारे भारतीय समाज के आदर्श नहीं हो सकते। क्योंकि इन्होंने जिस उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति का रास्ता अपनाया है उससे भारतीय समाज की हजारों साल पुरानी परंपरांओं को भारी खतरा पैदा हो गया है। खासकर उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग उन्हें अपना आदर्श मानकर फुहड़पन की भौडी संस्कृति को तेजी से अपनाता जा रहा है। फिर चाहे वो ताश के पत्तों की तरह पति या पत्नियां को बदलना हो, चाहे लिव-इन-रिश्ते में रहना हो या फिर मुक्त सैक्स का आनंद लेना हो। घर टूट रहे हैं। रिश्ते टूट रहें हैं। तनाव और घुटन बढ़ रही है। हत्याएं और आत्महत्याएं हो रही हैं। नशीली दवाओं का सेवन बढ़ रहा है। यह सब देन है टीवी सीरियलों, फिल्मों और पेज-3 संस्कृति की। जो जबरदस्ती हमारे घरों में घुसती जा रही है।

आधुनिक और मुक्त विचारों का हामी बुद्धिजीवी वर्ग इस संस्कृति पर किसी भी तरह के नियंत्रण को मानवाधिकारों का हनन मानता है। ऐसे प्रयासों को कट्टरवादी कह कर उसके विरोध में उठ खड़ा होता है। चूंकि इस वर्ग की पकड़ और पहुंच मीडिया में गहरी और व्यापक हैए इसलिए इनकी ही बात सुनी जाती है। जबकि बहुसंख्यक समाज आज भी इस संस्कृति से बचा हुआ है और इसे पसंद नहीं करता। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि यह बुद्धिजीवी वर्ग आज हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक वर्ग पर हावी होता जा रहा है। जिसका दुष्परिणाम हम सबके सामने इस रूप में आ रहा है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।

मुक्त विचारों के समर्थक इन बुद्धिजीवियों से कोई पूछे कि इंद्राणी जैसी औरत को क्या कहेंगे ? जो अपनी बेटी की हत्या करती है, अपने पुराने पति के सहयोग से। नए पति से यह राज छुपाती है कि शीना उसकी बेटी थी और हत्या करके भी नए पति के साथ आराम से सामान्य जिंदगी जीती हैं। अपनी पिछली शादी से पैदा लड़की को, उसके बाप से अलग रखकर नए पति की दत्तक पुत्री बनवा देती है ताकि उसकी दौलत इस दत्तक पुत्री को मिल सके। इन्द्राणी अकेली नहीं हैं। ऐसी ताकतवर, मशहूर और हाई सोसायटी वाली महिलाएं देश की राजधानी दिल्ली से लेकर हर बड़े शहर के कुलीन माने जाने वाले समाज की ‘शोभा’ बढ़ाती हैं और तब तक गुलछर्रे उड़ाती हैं जब तक कोई हिम्मती उनका भांड़ा न फोड़ दे। पर हमारे कुलीन समाज को क्या हो गया है? ये समाज किस रास्ते पर बढ़ चला है ? कहां इस प्रकार के घिनौने कृत्यों पर विराम लगेगा, यह चिंतनीय है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज में अवैध संबंधों का इतिहास न रहा हो। वैदिक काल से आज तक ऐसे संबंधों के अनेक उदाहरण पुराणों तक में उल्लेखित हैं द्य पर उनका समाज में आदर्श की तरह यशगान नहीं किया जाता था। उन्हें सह लिया जाता थाए  महिमामंडित नहीं किया जाता था। अगर कड़ी शासन व्यवस्था हुई तो उन पर नियंत्रण भी किया जाता था।

लेकिन आज जो यह संस्कृति निर्लज्जता से साजिशन पनपाई जा रही है, इसके पीछे हैं वो बाजारू ताकतें जो अपने उत्पादनों को हमारे बाजारों में थोपने के लिए हमारी सामाजिक परिस्थिति को बदल देना चाहती हैं। जिसे हम आज आधुनिक मान रहे हैं द्य दरअसल यह संस्कृति पश्चिमी देशों में अपना खोखलापन सिद्ध कर चुकी है। इसलिए वहां के समाजों ने अब इस संस्कृतिक से काफी हद तक मुंह मोड़ लिया हैं और पारिवारिक बंधनों की ओर फिर से लौटने लगे हैं ।

जबकि हम हर आयातित चीज को अपनाने की भूख में अपने अस्तित्व की जड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। छोटे-छोटे काम ही हमें आगे चलकर बड़े पतन की ओर ले जाएंगे। आज भारत के किसी भी गांव, कस्बें में चले जाइएए फेरों बिना शादी हो जाएगी पर डीजे बिना नहीं होगी। डीजे में फटता कानफाडू शोर, अभद्र गानें और उनपर थिरकतें हमारे परिवारिजन शादी का सारा मजा किरकिरा कर देते हैं। न कोई बात सुनपाता है और न मंत्रों का उच्चारण। जबकि शादी जैसे पवित्र समारोह भारतीय संस्कृति और परंपरा के उन उच्च आदर्शों का नमूना है जिन्हें अपनाने आज बड़े-बड़े मशहूर गोरे लोग तक भारत आ रहे हैं।

पारंपरिक त्यौहार जिनका संबंध हमारे मौसम और कृषि से था उन्हें भूलकर हम वेलेनटाइन-डे जैसे वाहियात नए त्यौहारों को अपना कर अपनी जड़ों से कट रहे हैं। इकबाल ने कहा था, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।‘ हजारों साल भारत ने विदेशी हमलों को झेला मगर हमारी संस्कृति की जड़े इतनी गहरी थी कि कोई उन्हें हिला नहीं पाया। पर बाजार की इस संस्कृति ने जो हमला किया है, उसने हमारे गांवों तक अपनी पकड़ बना ली है। इसे रोकना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विरोधी लाख तानाशाह कहें, पर उन्हें ऐसी तानाशाही दिखानी होगी ताकि टीवी और इंटरनेट से ऐसी संस्कृति को रोकने का माहौल बन सके। इसलिए इस तरह के तथाकथित ग्लैमर, शोहरत और ताकत के बल पर अति महत्वाकांक्षी आधुनिक संस्कृति का पटाक्षेप हो सके द्य जो आने वाली हमारी पीढ़ियों के लिए जरूरी है।