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Monday, October 30, 2017

किसानों के साथ धोखाधड़ी


हमारे देश में अगर कोई सबसे अधिक मेहनत करता है, तो वो इस देश के किसान हैं, जो दिन-रात, जाड़ा, गर्मी और बरसात झेलकर फसल उगाते हैं और 125 करोड़ देशवासियों का पेट भरते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षा भी उनकी ही होती है। चुनावों के माहौल में हर राजनैतिक दल किसानों के दुख-दर्द का रोना रोता है और ये जताने की कोशिश करता है कि मौजूदा सरकार के शासन में किसानों का बुरा हाल है और वो आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। जबकि हकीकत यह है कि वही राजनैतिक दल जब सत्ता में होते हैं, तो ऐसी नीतियां बनाते हैं, जिनसे किसान की तरक्की हो ही नहीं सकती। चाहे वह बिजली की आपूर्ति हो या सिंचाई के जल की, चाहे वह समर्थन मूल्य की बात हो या खाद के दाम की। हर नीति की नींव में एक बड़ा घोटाला छिपा होता है। जिसका खामियाजा, इस देश के करोड़ों किसानों को झेलना पड़ता है। जबकि इन नीतियों को बनाने वाले नेता और अफसर, मोटी चांदी काटते हैं।


दरअसल किसानों के प्रति उपेक्षा का ये भाव सत्ताधीशों का ही नहीं होता, हम सब शहरी लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अब मीडिया को ही ले लीजिए, अखबार हो या टी.वी., कुल खबरों की कितनी फीसदी खबर, किसानों की जिंदगी पर केंद्रित होती हैं? सारी खबरें औद्योगिक जगत, बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां, सिनेमा या खेल पर केंद्रित होती है। किसानों पर खबर नहीं होती, किसान खुद खबर बनते हैं, जब वे भूख से तड़प कर मरते हैं या कर्ज में डूबकर आत्महत्या करते है।


ये कैसा समाजवाद है? कहने को श्रीमती गांधी ने भारतीय संविधान में संशोधन करके समाजवाद शब्द को घुसवाया। पर क्या यूपीए सरकार की नीतियां ऐसी थीं कि किसानों की दिन-दूगनी और रात-चैगुनी तरक्की होती? अगर ऐसी हुआ होता, तो किसानों की हालत इतनी खराब कैसे हो गयी कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये? ये रातों-रात तो हुआ नहीं, बल्कि वर्षों की गलत नीतियों का परिणाम है। हमारी सरकारों ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बजाए, याचक बना दिया। ताकि वो हमेशा सत्ताधीशों के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहे। छोटे-छोटे कर्जों में डूबा किसान तो अपनी इज्जत बचाने के लिए आत्महत्या करता आ रहा है, पर क्या किसी उद्योगपति ने बैंकों का कर्जा न लौटाने पर आत्महत्या की? लाखों-करोडों का कर्जा उद्योग जगत पर है। पर उन्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि वे मंहगे वकील खड़े करके, बैंकों को मुकदमों में उलझा देते हैं। जिसमें दशकों का समय यूं ही निकल जाता है।


प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लग रहा है कि उनकी परोक्ष मदद के कारण अंबानी और अडानी की प्रगति दिन-दूनी और रात-चैगुनी हो रही है। पर क्या ये बात किसी से छिपी है कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी अंबानी समूह की बेइंतहां वृद्धि हुई? सारा औद्योगिक जगत ये तमाशा देखता रहा कि कैसे सरकार से निकटता का लाभ लेकर, धीरूभाई अंबानी ने ये विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया था।  इसमें नया क्या है?


मैं पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हूं। मैं मानता हूं कि व्यक्तिगत पुरूषार्थ के बिना, आर्थिक प्रगति नहीं होती। सरकारों की सहायता पर पलने वाला समाज कभी आत्मविश्वास से नहीं भर सकता। वह हमेशा परजीवि बना रहेगा। साम्यवादी देश इसका स्पष्ट उदाहरण है। जबकि पूंजीपति बुद्धि लगाता है, मेहनत करता है, खतरे मोल लेता है और दिन-रात जुटता है, तब जाकर उसका औद्योगिक साम्राज्य खड़ा होता है। इसलिए पूंजीपतियों की प्रगति का विरोध नहीं है। विरोध है, उनके द्वारा गलत तरीके अपनाकर धन कमाना और टैक्स की चोरी करना। इससे समाज का अहित होता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ऐसी व्यवस्था लाना चाह रहे हैं, जिससे टैक्स की चोरी भी न हो और लोग अपना आर्थिक विकास भी कर सकें। इस तरह सरकार के पास, सामाजिक कार्यों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हो जायेंगे।

 
हर परिवर्तन कुछ आशंका लिए होता है। ढर्रे पर चलने वाले लोग, हर बदलाव का विरोध करते हैं। परंतु बदलाव अगर उनकी भलाई के लिए हो, तो क्रमशः उसे स्वीकार कर लेते हैं। आज देश के समझदार लोगों को किसानों और देश की आर्थिक स्थिति पर मंथन करना चाहिए और ये तय करना चाहिए कि भारत का आर्थिक विकास किस माडल पर होगा? क्या देश का केवल औद्योगिकरण होगा या किसानों मजदूरों के आर्थिक उत्थान को साथ लेकर चलते हुए औद्योगिक विकास होगा? क्योंकि समाज के बहुसंख्यक लोगों को अभावों में रखकर मुट्ठीभर लोग वैभव पर एकाधिकार नहीं कर सकते। उन्हें गांधी जी के ‘ट्रस्टीशिप’ वाले सिद्धांत को मानना होगा। जिसका मूल है कि धन इसलिए कमाना है कि हम समाज का भला कर सकें। ऐसी सोच विकसित होगी, तो किसान भी खुश होगा और शेष समाज भी।



भारत के आर्थिक विकास के माडल पर बहुत कुछ सोचा-लिखा जा चुका है। उसी पर अगर एकबार फिर मंथन कर लिया जाए, तो तस्वीर साफ हो जायेगी। जरूरत है कि हम विकास के पश्चिमी माडल से हटकर देशी माडल को विकसित करें, जिसमें सबका साथ हो-सबका विकास हो।

Monday, August 21, 2017

खाद्य पदार्थों में मिलावट पर रोक नहीं

हवा, पानी और भोजन आदमी की जिंदगी की बुनियादी जरूरत हैं। अगर इनमें ही मिलावट होगी, तो जनता कैसे जियेगी? खाद्यान में मिलावट के नियम कितने भी सख्त हों, जब तक उनको ठीक से लागू नहीं किया जायेगा, इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। आज मिलावट का कहर सबसे ज्यादा हमारी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर ही पड़ रहा है। संपूर्ण देश में मिलावटी खाद्य-पदार्थों की भरमार हो गई है । आजकल नकली दूध, नकली घी, नकली तेल, नकली चायपत्ती आदि सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है। अगर कोई इन्हें खाकर बीमार पड़ जाता है तो हालत और भी खराब है, क्योंकि जीवनरक्षक दवाइयाँ भी नकली ही बिक रही हैं ।
एक अनुमान के अनुसार बाजार में उपलब्ध लगभग 30 से 40 प्रतिशत समान में मिलावट होती है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की वस्तुओं पर निगाह डालने पर पता चलता है कि मिलावटी सामानों का निर्माण करने वाले लोग कितनी चालाकी से लोगों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। इन मिलावटी वस्तुओं का प्रयोग करने से लोगों को कितनी कठिनाइयाँ उठानी पड़ रही हैं।
आजकल दूध भी स्वास्थ्यवर्धक द्रव्य न होकर मात्र मिलावटी तत्वों का नमूना होकर रह गया है, जिसके प्रयोग से लाभ कम हानि ज्यादा है। हालत यह है कि लोग दूध के नाम पर यूरिया, डिटर्जेंट, सोडा, पोस्टर कलर और रिफाइंड तेल पी रहे है।
बाजार में उपलब्ध खाद्य तेल और घी की भी हालत बेहद खराब है। सरसों के तेल में सत्यानाशी बीज यानी आर्जीमोन और सस्ता पॉम आयल मिलाया जा रहा है। देशी घी में वनस्पति घी और जानवरों की चर्बी की मिलावट, आम बात हो गई है। मिर्च पाउडर में ईंट का चूरा, सौंफ पर हरा रंग, हल्दी में लेड क्रोमेट व पीली मिट्टी, धनिया और मिर्च में गंधक, काली मिर्च में पपीते के बीज मिलाए जा रहे हैं।
फल और सब्जी में चटक रंग के लिए रासायनिक इंजेक्शन, ताजा दिखने के लिए लेड और कॉपर सोल्युशन का छिड़काव व सफेदी के लिए फूलगोभी पर सिल्वर नाइट्रेट का प्रयोग किया जा रहा है। चना और अरहर की दाल में खेसारी दाल, बेसन में मक्का का आटा मिलाया जा रहा और दाल और चावल पर बनावटी रंगों से पालिश की जा रही है ।
ऐसा अर्से से होता आ रहा है। 50 वर्ष पहले, एक फिल्म में महमूद ने एक गाना गाया था, जो ऊपर लिखे गये सारे पदार्थों का इसी तरह वर्णन करता था। मतलब यह हुआ कि 50 वर्षों में कुछ भी नहीं सुधरा। इसके विपरीत अब तो दूध, फल और सब्जी तक जहरीले हो गये हैं। भारत की पूरी आबादी, इस जहर को खाकर जी रही है। हमारे बच्चे इन मिलावटी सामानों को खाकर बड़े हो रहे हैं। भारत की आने वाली युवा पीढ़ी कैसे ताकतवर बनेगी?
मोदी सरकार के आने के बाद, सबको उम्मीद थी कि खाने के पदार्थों में मिलावट करने वालों पर, सरकार सख्ती करेगी। स्वयं मोदी जी ने अपने भाषणों में इस समस्या की भयावहता को रेखांकित किया था। पर उनके अधीनस्थ अफसरों ने ऐसी नीति बनाई है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट का धंधा, दिन-दूना और रात-चैगुना बढ़ गया है। ‘ईज़ आफ बिजनेस’ के नाम पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता परखने वाले विभागों को कहा गया है कि वे ऐसी किसी भी अर्जी पर, बिना देर किये, अनापत्ति पत्र जारी कर दिये जायें।
जरा सोचिए कि मलेशिया से ‘पाम आयल’ आया। आयातक ने अनापत्ति पत्र के लिए अर्जी दी। खाद्य नियंत्रण विभाग, अगर यह सुनिश्चित करना चाहे कि यह तेल, खाने योग्य है या नहीं, तो उसे परीक्षा के लिए प्रयोगशाला में भेजना होगा। जहां कैमिस्ट उसकी गुणवत्ता की जांच कर सकें। खाद्य विभाग को यह जांच रिर्पोट 7 दिन में चाहिए। प्रयोगशाला के पास इतने सारे सैंपल जांच के लिए आये हुए हैं कि वो तीन महीने में भी यह रिर्पोट नहीं दे सकती। ऐसे में दो ही विकल्प हैं। पहला कि बिना जांच के, फर्जी अनापत्ति पत्र दे दिये जायें, दूसरा जांच आने तक इंतजार किया जाए। ऐसी स्थिति में खाद्य नियंत्रण विभाग पर लाल फीता शाही और काम में ढीलेपन का आरोप लगाकर, उसके अधिकारियों को शासन द्वारा  प्रताड़ित किया जा सकता है। इसी डर से आज, यह विभाग बिना जांच करावाए ही, अनापत्ति प्रमाण पत्र देने को मजबूर हैं। जबकि ऐसा करने से लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ती है। पर आज हो यही रहा है। खद्यान के नमूनों की बिना जांच कराए ही मजबूरी में, अनापत्ति प्रमाण पत्र देने पड़ रहे हैं। नतीजतन पूरे देश के बाजार में, जहरीले रासायनिक और रंग मिलाकर धड़ल्ले से खाद्यान्न बेचे जा रहे हैं। जिससे हम सबका जीवन खतरे में पड़ रहा है। मोदी सरकार को, इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान देना चाहिए और खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।

Monday, August 7, 2017

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था सपना या व्यवस्थित प्रबंधन


प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।

वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।

सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंधतंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसो के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुष्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की सम्भावनाओ का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाऐं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं।

आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्णं हिस्सा हैं।

प्रदेश में कई बार साधारण स्कूलों के शिक्षक मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच चुके हैं। बावजूद इसके की वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ाकर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर  दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़े हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढी, जिसके हाथो में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बनता है और ये क्रम निरंतर जारी है।

छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशो की कतर में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाये। फिर न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।

यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं, बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमे तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।

तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो  योगी सरकार को उ.प्र. के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षानीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।

Monday, January 2, 2017

मोदी का विकल्प क्या है?




इसमें शक नहीं की मोदी की शख्सियत ने राजनीति और मीडिया के दायरों को बुरी तरह हिला दिया है | दूसरी तरफ देश की आम जनता इस उम्मीद में बैठी है कि मोदी की नीतियाँ उनके दिन बदल देंगीं, यानी उनके अच्छे दिन आने वाले हैं | ये वो जमात है जिसे आजतक हर प्रधान मंत्री ने सपने दिखाए | पंडित  नेहरु ने योजना बद्ध विकास की बात की तो इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया | राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया  तो विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार मिटाने का | मतलब यह कि हर बार आम जनता सपने देखती रह गई और उसकी झोली में इंतज़ार के सिवा कुछ ऐसा न  गिरा जो उसकी जिंदगी बदल देता | अब नरेंद्र भाई मोदी की बारी है | समय बतायेगा कि वे आम जनता को कब तक और कैसी राहत देना चाहते हैं | तब तक इंतज़ार करना होगा|

एक दूसरी जमात है जिनके पिछले 69 सालों में अच्छे दिन चल रहे थे, उन्हें मोदी से जरूर निराशा हुई है | ये वो जमात है जिन्होने सरकार को टैक्स देना कभी जरूरी नहीं समझा, जबकि ये लोग साल भर में हर शहर में हज़ारों करोड़ रूपये का व्यापार कर रहे थे | एक समुदाय विशेष तो ऐसा है कि जिसके इलाके में अगर कोई आयकर या बिक्रीकर अधिकारी गलती से भी घुस जाय तो उसकी जमकर धुनाई होती थी | कई सरकारों ने इस जमात को हमेशा अपने दामाद की तरह समझा | उनकी जा और बेजा हर बात को बर्दाश्त किया, चंद वोटों की खातिर |

अच्छे दिनों को जीती आई इसी जमात में देश के राजनेता और नौकरशाही भी आते हैं,  जिन्होंने आम जनता को लूट कर आज तक बहुत अच्छे दिन देखे हैं | पर ये जमात अभी मोदी जी के काबू में नही आयी है | नोटबंदी की इन पर कोई मार नहीं पड़ी | जबकि आम जनता हर तकलीफ सह लेगी अगर उसे लगे कि इस जमात के भी नकेल पड़ी है |

इसके बावजूद अगर लोग देश में सुविधाओं के अभाव का तो रोना रोते रहें और देश के सुधार के लिए कर भी न देना चाहें तो कैसे सुधरेंगे देश के हालात ? इसलिए मोदी सरकार का कर के मामले में कड़े और प्रभावी कदम उठाना निहायत ही जरूरी है | दबी ज़बान से तो अब व्यापारी वर्ग भी यह मानने लगा है कि अगर उचित दर पर कर देकर उसका बकाया धन ‘सफेद’ हो जाय तो उसकी स्थिति आज से बेहतर हो जाएगी |

पर इस बात पर भी देश में आम राय है कि पूरा भारतीय समाज अभी डिजिटल होने के लिए तैयार नहीं है | हालंकि जैसा हमने पिछले कॉलम में लिखा था कि अगर मोदी मुस्तफा कमाल पाशा की तरह कमर कस लें तो शायद वे कामयाब हो सकते हैं |

पर इसके साथ ही नौकरशाही के प्रति प्रधान मंत्री मोदी के अगाध प्रेम को लेकर भी समझदार लोगों में भारी चिंता है | जिस नौकरशाही ने पिछले 69 वर्षों में अपना रवैय्या नहीं बदला, तो वह रातों रात कैसे बदलेगी ? अगर वेतनभोगी नौकरशाही इतनी ही ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ होती तो भारत आज तक जाने किस उंचाई तक पहुंच गया होता ? इसलिए मोदी जी के शुभचिंतकों की सलाह है कि वे किसी भी वर्ग के प्रति इतने आश्वस्त न हों | बल्कि वैकल्पिक विचार और नीति निर्धारण व क्रियान्वन के लिए नौकरशाही के दायरे के बाहर निकलें और अपने-अपने क्षेत्र में स्वयंसिद्ध लोगों को नीति और योजना बनाने के काम में जोड़ें, जिससे बदलाव आये और संतुलन बना रहे | इसके साथ ही मोदी जी के मित्रों की एक सलाह और भी है कि मोदी जी धमकाने की भाषा कंजूसी से प्रयोग करें और देश को आश्वस्त करें कि उनका उद्देश्य कारोबारों को नष्ट करना या धीमा करना नहीं है, बल्कि ऐसे हालात पैदा करना है जिसमे छोटे से छोटा उद्द्यामी और व्यापारी सम्मान के साथ जी सके । पर इस दिशा में अभी कुछ भी ठोस नहीं हुआ है |

मगध साम्राज्य का मौर्य राजा अशोक, भेष बदल कर, बिना सुरक्षा के देश के किसी भी हिस्से में पहुँच जाता था और अपने शासन के बारे में जनता की बेबाक राय जानने की कोशिश करता था| जिससे उसकी नीतियाँ जनता के हित में हों | मोदी जी को भी अपने शुभचिंतकों के मन से यह भय निकलना पड़ेगा कि अगर वे अप्रिय सत्य भी बोलते हैं तो मोदी जी उनका सम्मान करेंगे |

जिन समस्याओं से देश आज गुजर रहा है | जिस तरह का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य है उसमे भारत को एक मजबूत नेत्तृत्व की जरूरत है | मोदी जी उस कमी को पूरा करते हैं | इसलिए लोगों को उनसे उम्मीदें हैं | केंद्र और प्रान्त के स्तर पर दलों के भीतर जैसी उठा-पटक आज हो रही है | उसमें क्या किसी दल के पास मोदी से बेहतर विकल्प उपलब्ध है ? भाई-भतीजावाद और सरकारी साधनों की लूट से ग्रस्त ये दल मोदी का कैसे मुकाबला कर सकते हैं ? जिसकी ‘जोरू न जाता-राम जी से नाता’| मोदी जी को अपने बेटे-बेटी के लिए न तो आर्थिक साम्राज्य की विरासत छोडनी है और न ही राजनैतिक विरासत | जो कुछ करना है वह अपने जीवन काल में ही करना है। बेशक इंसान से गलतियाँ हो सकती हैं, पर तभी तो वो इंसान है, वरना भगवान न बन जाता| आज जरूरत इस बात की है कि मोदी जी दो सीढ़ी नीचे उतर कर सही लोगों के साथ देश हित में सम्वाद कायम करें और उस आधार पर नीतियां बनाएं| उधर उनके आलोचकों को भी समझना चाहिए जो उर्जा वे मोदी का मजाक उड़ने में या उनकी कमियां निकालने में लगाते हैं, उसे अगर ठोस सुझाव देने में लगाएं और वो  सुझाव सुने जाएँ, ऐसा माहोल बनाये तो देश का ज्यादा भला होगा |

Monday, December 19, 2016

बाबा रामदेव से इतनी ईष्र्या क्यों?



जब से बाबा रामदेव के पातंजलि आयुर्वेद का कारोबार दिन दूना और रात चैगुना बढ़ना शुरू हुआ है तब से उनसे ईष्र्या करने वालों की और उनकी आलोचना करने वालों की तादात भी काफी बढ़ गयी है। इनमें कुछ दलों के राजनेता भी शामिल है। इनका आरोप है कि बाबा प्रधानमंत्री मोदी की मदद से अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ा रहे हैं। उनके उत्पादन गुणवत्ता में खरे नही हैं। उन्होंने विज्ञापन बांटकर मीडिया का मुंह बंद कर दिया है। वे राज्यों में भारी मात्रा में जमीन हड़प रहे हैं। 

नेताओं के अलावा संत समाज के कुछ लोग भी बाबा रामदेव की आर्थिक प्रगति देखकर दुखी हैं। इनका आरोप है कि कोई योगी व्यापारी कैसे हो सकता है? कोई व्यापारी योगी कैसे हो सकता है? इसमें विरोधाभास है। बाबा केसरिया बाना पहनकर उसका अपमान कर रहे हैं। केसरिया बाना तो वह सन्यासी पहनता है जिसकी सारी भौतिक इचछाऐं अग्नि की ज्वालाओं में भस्म हो चुकी हों। जबकि बाबा रामदेव तो हर इच्छा पाले हुए है। उनमें लाभ, लोभ व प्रतिष्ठा तीनों पाने की लालसा कूट-कूट कर भरी है।     

ऐसे आरोप लगाने वाले नेताओं से मैं पूछना चाहता हूं कि सत्तर और अस्सी के दशक में श्रीमती इंदिरा गांधी के योग गुरू स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने जब दिल्ली में, गुड़गाव के पास, जम्मू में और कश्मीर के उधमपुर के पास पटनीटॉप में सैकड़ों करोड़ का साम्राज्य अवैध कमाई से खड़ा किया था, हवाई जहाजों के बेड़े खरीद लिए थे, रक्षादृष्टि से वर्जित क्षेत्र में सड़कें, होटल, हवई अड्डे बना लिये थे, तब ये नेता कहां थे? क्या ये कोई अपना कोई बयान दिखा सकते हैं जो उन्होंने उस वक्त मीडिया को दिया हो? जबकि रामदेव बाबा का साम्राज्य तो वैध उत्पादन और चिकित्सा सेवाओं को बेचकर कमाये गये मुनाफे से खड़ा किया गया है। धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का साम्राज्य तो अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में दलाली से बना था। ये बात उस समय की राजनैतिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले बताते थे।

रही बात बाबा रामदेव के उत्पादनों की गुणवत्ता की तो ये ऐसा मामला है जैसे ‘मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी’। जब ग्राहक संतुष्ट है तो दूसरों के पेट में दर्द क्यों होता है? मै भी पूरें देश में अक्सर व्याख्यान देने जाता रहता हूं और होटलों के बजाय आयोजकों के घरों पर ठहरना पसंद करता हूं। क्योंकि उनके घर का वातावरण मुझे होटल से ज्यादा सात्विक लगता है। इन घरों के बाथरूम में जब मैं स्नान को जाता हूं, तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि जहां पहले विदेशी शैम्पू, साबुन, टूथपेस्ट आदि लाईन से सजे रहते थे, वहां आज ज्यादातर उत्पादन पातंजलि के ही दिखाई देते है। पूछने पर घर के सदस्य बताते हैं कि वे बाबा रामदेव के उत्पादनों से कितने संतुष्ट है। क्या ये बात हमारे लिए गर्व करने की नहीं है कि एक व्यक्ति ने अपने पुरूषार्थ के बल पर विदेशी कंपनियों के सामने इतना बड़ा देशी साम्राज्य खड़ा कर दिया? जिससे देश में रोजगार भी बढ़ रहा है और देश का पैसा देश में ही लग रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये कि बाबा के उत्पादन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादन के मुकाबले कहीं ज्यादा किफायती दाम पर मिलते हैं। वे भी तब जबकि बाबा हर टीवी चैनल पर हर वक्त विज्ञापन देते हैं।

यहां भी बाबा ने विज्ञापन ऐजेंसियों को मात दे दी। उन्हें किसी मॉडल की जरूरत नहीं पड़ती। वे खुद ही माँडल बन जाते हैं। इससे सबसे ज्यादा सम्मान तो महिलाओं का बढ़ा है क्योंकी अब तक् होता यह आया था कि साबुन और शैम्पू का ही नहीं बल्कि मोटरसाइकिल और मर्दानी बनियान तक का विज्ञापन किसी अर्धनग्न महिला को दिखाकर ही बनाया जाता था। इस बात के लिए तो भारत की आधी आबादी यानी मातृशक्ति को मिलकर बाबा का सम्मान करना चाहिए।

रही बात संत बिरादरी में कुछ लोगों के उदरशूल की। तो क्या जरी के कपड़े पहनकर, आभूषणों से सुसज्जित होकर, मंचों पर विवाह पंडाल जैसी सजावट करवाकर, भागवत की नौटंकी करने वाले धर्म का व्यापार नहीं कर रहे? क्या वे शुकदेव जी जैसे वक्ता हैं? या हम सब परीक्षित महाराज जैसे विरक्त श्रोता हैं? धर्म का व्यापार तो सभी धर्म वाले करते हैं। जो नहीं करते वे हिमालय की कंदराओं में भजन करते हैं। उन्हें होर्डिंग और टीवी पर अपने विज्ञापन नहीं चलाने पड़ते। कोई कथा बेचता है, तो कोई दुखःनिवारण का आर्शावाद  बेच रहा है। बाबा तो कम से कम स्वस्थ रहने का ज्ञान और स्वस्थ रहने के उत्पादन बेच रहे हैं। इसमें कहीं कोई छलावा नहीं। अगर किसी उत्पादन में कोई कमी पाई जाती है तो उसके लिए कानून बने है।

कुल मिलाकर बाबा ने अभूतपूर्व क्षमता का प्रदर्शन किया है। किसी ने उन्हें उंगली पकड़कर खड़ा नहीं किया। वे अपनी मेहनत से खड़े हुए है। उनके साथ आचार्य बालकृष्ण जैसे तपस्वियों का तप जुड़ा है और उन करोड़ों लोगों का आर्शीवाद जिन्हें बाबा से शारीरिक या मानसिक लाभ मिला है। इनमे हर राजनैतिक विचारधारा के लोग शामिल हैं। ऐसे बाबा रामदेव को तो भारत का रत्न माना जाना चाहिए।