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Monday, January 9, 2017

कहां चली गयी सिविल सोसाइटी



भ्रष्टाचार के विरूद्ध कुछ वर्ष पहले पूरे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा करने वाली सिविल सोसाईटी अचानक कहां गायब हो गई। यह एक नई बात यह दिख रही है कि स्वयंसेवी सामाजिक संगठन अचानक निष्क्रिय हो गये हैं। यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि ये निष्क्रियता अस्थायी  है या किसी थकान का नतीजा है। दोनों स्थितियां एक साथ भी हो सकती हैं। क्योंकि देश में सामाजिक क्षेत्र में काम कर रही तमाम गैर सरकारी संस्थाएं पिछले दो दशकों से वाकई जबर्दस्त हलचल मचाए हुए थीं। आजकल वह हलचल लगभग ठप है। चाहे भ्रष्टाचार हो, चाहे पर्यावरण हो या दूसरी सामाजिक समस्याएं उन्हें लेकर आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और विचार विमर्शो के आयोजन अब दुर्लभ हो गए हैं।

महंगाई, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूरी, महिलाओं पर अत्याचार, प्रदूषण, भ्रष्टाचार को लेकर जंतर मंतर पर होने वाले प्रतीकात्मक धरनों प्रदर्शनों की संख्या में आश्चर्यजनक कमी आयी है। क्या ये सोच विचार का एक मुददा नहीं होना चाहिए। और अगर सोचना शुरू करेंगे तो देश में राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में आए बदलावों को सामने रखकर ही सोचना पड़ेगा। खासतौर पर इसलिए क्योंकि दो-तीन साल में एक बड़ा बदलाव केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है। उसके पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लंबा जन जागरण अभियान चलाया गया था। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक मानते ही हैं कि पूर्व सरकार की छवि नाश करने में उस अभियान ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। वह सामाजिक आंदोलन या जन आंदोलन सिर्फ विरोध करने के लिए भी नहीं था। उस आंदोलन में बाकायदा एक मांग थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल का कानून बनाया जाए। यानी सामाजिक संस्थाओं ने बाकायदा एक विशेषज्ञ के किरदार में आते हुए लोकपाल को सबसे कारगर हथियार साबित कर दिया था।

बहरहाल सत्ता बदल गई। नए माहौल में वह आंदोलन भी ठंडा पड़ गया। दूसरे छुटपुट आंदोलन जो चला करते थे वे भी बंद से हो गए। और तो और मीडिया का मिजाज भी बदल गया। यानी लोकपाल को लेकर बात आई गई हो गई।

इन तथ्यों के आधार पर क्या हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि सामातिक संस्थाएं और मीडिया इतना असरदार होता है कि वह जब चाहे जिस समस्या को जितना बड़ा बनाना चाहे उतना बड़ा बना सकता है। और जब चाहे उसी समस्या को उतना ही छोटा भी बना सकता है। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि बिना लोकपाल का गठन हुए ही भ्रष्टाचार कम या खत्म हो गया है। इसीलिए शायद सामाजिक संगठनों ने अब आंदोलन करना बंद कर दिया है। पर ऐसा नहीं है। फिर इस निष्क्रियता से क्या सिविल सोसाइटी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न नहीं लग जाता है। लेकिन मौजूदा माहौल ही कुछ इस तरह का है कि इन मुद्दों पर बात नहीं हो रही है।

लेकिन इतना तय है कि भ्रष्टाचार और कालेधन पर जितना कारगर आंदोलन तीन-चार साल पहले चला था, उस दौरान हम विरोध के नए और कारगर तरीके जान गए थे। अभी भले न सही लेकिन जब भी माहौल बनेगा वे तरीके काम में लाए जा सकते हैं। यह भी हो सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उन तरीकों को एक बार अपनाए जाने के बाद उनकी धार कुंद पड़ गई हो। लेकिन दूसरे और मुददों के खिलाफ वैसे आंदोलन और हलचल पैदा करना सीखा जा चुका है। अब देखना यह होगा कि सामाजिक संगठन भविष्य में अगर फिर कभी सक्रिय होते हैं तो वे किस मुददे पर उठेंगे।

सामाजिक संगठनों के लिए बेरोजगारी और महंगाई और प्रदूषण जैसे मुददे आज भी कारगर हो सकते थे। लेकिन देश में पिछले दो महीने से नोटबंदी ने कामधंधे और खेती किसानी के अलावा और कोई बात करने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है। देश में उत्पादन बढ़ाने के काम में सामाजिक संगठन ज्यादा कुछ कर नहीं सकते। कुछ भी करने के लिए अगर कुछ करना हो तो स्वयंसेवी संस्थाएं आर्थिक क्षेत्र में सरकारी नीतियों और कार्यक्रम बनवाने में हस्तक्षेप की भूमिका भर ही निभा सकती हैं। लेकिन यह काम इतनी विशेषज्ञता का काम है कि अपने देश में सामाजिक क्षेत्र की गैर सरकारी संस्थाएं ऐसे विशेषज्ञ कार्य में ज्यादा सक्षम नहीं हो पाई हैं। वैसे भी इस तरह के कामों में सामजस्यपूर्ण व्यवहार की दरकार होती है। जबकि पिछले दो दशकों में हमने अपनी स्वयंसेवी संस्थाओं को सिर्फ विरोध और संघर्ष के व्यवहार में अपना ही विकास करते देखा है।

देश के मौजूदा हालात में जब मीडिया ही अपने लिए सुरक्षित खबरों और चर्चाओं को ढूंढने में लगा हो तो इस मामले में स्वयंसेवी संस्थाओं के सामने तो और भी बड़ा संकट है। ये संस्थाएं अब प्रदूषण जैसी समस्या पर भी अपनी सक्रियता बढ़ाने से परहेज कर रही हैं। दरअसल नदियों की साफ-सफाई का काम शहर-कस्बों में गंदगी कम करने के काम से जुड़ा है। यानी प्रदूषण की बात करेंगे तो देश में चालू स्वच्छता अभियान में मीनमेख निकालने पड़ेंगे और किसी भी मामले में मीनमेख निकालने का ये माकूल वक्त नहीं है।

कुल मिलाकर स्वयंसेवी संस्थाओं को काम करने की गुंजाइश पैदा करना हो तो उन्हें उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जिनमें मौजूदा सरकार से संघर्ष की स्थिति न बनती हो। आज की स्थिति यह है कि जो भी संघर्ष के किरदार में दिखता है वह सरकार के राष्ट्र निर्माण के काम में विघ्नकारी माना जाने लगा है। एक बार फिर दोहराया जा सकता है कि सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के सामने मुददों का संकट खड़ा हो गया है।

Monday, September 12, 2016

केजरीवाल: बिछड़े सभी बारी-बारी



            सर्वोच्च न्यायालय ने अरविंद केजरीवाल की यह मांग मानने से इंकार कर दिया कि दिल्ली में मुख्यमंत्री उपराज्यपाल से ऊपर है। दिल्ली उच्च न्यायालय ऐसी याचिका पहले ही खारिज कर चुका है। अब इसका मतलब साफ है कि पिछले 3 वर्षों से अरविंद केजरीवाल दिल्ली के उपराज्यलपाल पर केंद्र का एजेंट होने का जो आरोप बार-बार लगा रहे थे, उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं थी। क्योंकि न्यायपालिका ने मौजूदा प्रावधानों को देखते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि दिल्ली के मामले में उपराज्यपाल का निर्णय ही सर्वोपरि माना जाएगा।
            यह पहली बार नहीं है, जब अरविंद केजरीवाल को मुंह की खानी पड़ी है। जिस दिन से आम आदमी पार्टी वजूद में आयी है, उस दिन से उसके तानाशाह संयोजक अरविंद केजरीवाल नित्य नई नौटंकी करते रहते हैं। जिसका मकसद केवल अखबार और टेलीविजन की सुर्खिया बटोरना है। ठोस काम करने में अरविंद का दिल कभी नहीं लगा। टाटा समूह की अपनी पहली नौकरी से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल ने नाहक विवाद खड़ा करना सीखा है। काम करने वाले शोर नहीं किया करते। विपरीत परिस्थितियों में भी काम कर ले जाते हैं। अरविंद को अगर दिल्लीवासियों की चिंता होती, तो उनकी समस्याओं को हल करते। पर आज दिल्ली देश की राजधानी होने के बावजूद निरंतर नारकीय स्थिति की ओर बढ़ती जा रही है। हर दिन दिल्लीवासी शीला दीक्षित के शासन को याद करते हैं। अरविंद केजरीवाल को तो राष्ट्रीय नेता बनने की हड़बड़ी है| इसलिए कभी पंजाब, कभी बंगाल, कभी बिहार, कभी गुजरात, कभी गोवा जाकर नए-नए शगूफे छोड़ते रहते हैं। जाहिर है कि जिन राज्यों में जनता पारंपरिक राजनैतिक दलों से नाखुश है, उन राज्यों में सपने दिखाना केजरीवाल के लिए बहुत आसान होता है। वे आसमान से तारे तोड़ लाने के वायदे करते हैं, पर भूल जाते हैं कि दिल्लीवासियों से चुनाव के पहले उन्होंने क्या-क्या वादे किए थे और आज उनमें से कितने पूरे हुए? वैसे दावा करने को केजरीवाल सरकार सैकड़ों करोड़ रूपए के विज्ञापन छपवा चुकी है।
            नवजोत सिंह सिद्धू ने भी केजरीवाल के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। जिस सिद्धू को अपनी पार्टी में लेने के लिए केजरीवाल पलक-पांवड़े बिछाए बैठे थे, उसने एक ही बयान में यह साफ कर दिया कि केजरीवाल की न तो कोई विचारधारा है, न उनमें जनसेवा की कोई भावना। कुल मिलाकर केजरीवाल का फलसफा ‘मैं और मेरे लिए’ के आगे नहीं जाता। सिद्धू को चाहिए कि अगर वे भाजपा और कांग्रेस से नाखुश हैं, तो पूरे पंजाब में अपने प्रत्याशी खड़े करें और केजरीवाल की तानाशाही से त्रस्त, परिवर्तन के हामी, सभी लोगों को अपने साथ जोड़ लें। इससे कम से कम केजरीवाल पंजाब की जनता को गुमराह तो नहीं कर पाएंगे।
            ऐसा नहीं है कि केजरीवाल की तरह स्वार्थी, दोहरे चरित्र वाला और झूठ बोलने वाला का कोई दूसरा नेता नहीं है। राजनीति में तो अब यह आम बात हो गई है। फर्क इस बात का है कि केजरीवाल ने पिछले 5 वर्षों में ताल ठोककर ये घोषणा की थी कि उनसे अच्छा कोई नेता नहीं, कोई दल नहीं और कोई कार्यकर्ता नहीं। कार्यकर्ताओं की तो छोड़ो केजरीवाल मंत्रीमंडल के एक-एक मंत्री धीरे-धीरे किसी न किसी घोटाले या चारित्रिक पतन के मामले में कानून की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। कहां गया केजरीवाल का वो दावा कि जब ये कहा गया था कि उनके दल में केवल ईमानदार और चरित्रवान लोगों को ही टिकट मिलेगा। हम तो केजरीवाल से हर टीवी बहस में ये लगातार कहते आए कि जिन आदर्शों की बात तुम कर रहे हो, वैसे इंसान खोजने बैकुंठ धाम जाना पड़ेगा। पृथ्वी पर तो ऐसा कोई मिलेगा नहीं। फिर भी केजरीवाल का दावा था कि लोकपाल का चयन उनके जैसे मेगासेसे अवार्ड जीते हुए लोग ही करें। तभी देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो पाएगा। ये तो गनीमत है कि केजरीवाल के विधायक और मंत्री ही बेनकाब हो रहे हैं।
            अगर कहीं बंदर के हाथ में उस्तरा लग जाता, तो क्या होता? सोचिए वो स्थिति कि केजरीवाल जैसे लोग एक ऐसा लोकपाल बनाते, जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक के ऊपर होता और उसकी डिग्री केजरीवाल के कानून मंत्री रहे तोमर जैसी फर्जी पाई जाती। पर केजरीवाल के सुझाए कानून अनुसार वो लोकपाल देश में किसी को भी जेल भेज सकता था। केजरीवाल एंड पार्टी के ऐसे वाहियात और बचकाने आंदोलन का पहले दिन से मैंने पुरजोर विरोध किया। जब ये लोग अन्ना हजारे के साथ राजघाट धरने पर बैठे, तो मेंने इनके खिलाफ पर्चे छपवाकर राजघाट पर बंटवाए। ये बतलाते हुए कि इनकी निगाहें कहीं हैं और निशाना कहीं पर। उस वक्त कोई सुनने को तैयार नहीं था। दाऊद के एजेंट हो या भूमाफियाओं के दलाल, भ्रष्ट राजनेता हों या नंबर 2 की मोटी कमाई करने वाले फिल्मी सितारे। सबके सिर पर 2 तरह की टोपी होती थी, ‘मैं अन्ना हूं’ या ‘मैं आम आदमी हूं’। आज उन सबसे पूछो कि केजरीवाल के बारे में क्या राय है, तो कहने में चूकेंगे नहीं कि हमसे आंकने में बहुत बड़ी गलती हो गई।
            जस्टिस संतोष हेगड़े हों, अन्ना हजारे हों, प्रशांत भूषण हों, योगेंद्र यादव हों, किरण बेदी हों और ऐसे तमाम नामी लोग, जिन्होंने केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा लगाकर लोकपाल की लड़ाई लड़ी, आज वे सब केजरीवाल के गलत आचरण के कारण उनके विरोध में खड़े हैं। बिछड़े सभी बारी-बारी। पंजाब की जनता को केजरीवाल का चरित्र अब तक समझ में आ जाना चाहिए, वरना दिल्लीवासियों की तरह वे भी रोते, कलपते नजर आएंगे।

Monday, May 9, 2016

सबको पछाड़ देंगे केजरीवाल

राजनीति में यह जरूरी नहीं कि आप जो कहें, वो करें। होशियार राजनीतिज्ञ वह होता है, जो लोगों की नब्ज पर हाथ रखता है। नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान हर उस मुद्दे को छुआ, जिससे आम जनता का सरोकार था। इसलिए जनता ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और अप्रत्याशित विजय दिलाकर प्रधानमंत्री बना दिया। पर पिछले दो वर्षों में मोदी सरकार ने जो कुछ किया, उसका असर अभी तक आम आदमी ने महसूस नहीं किया है। इसलिए समाज में हताशा है। मोदी सरकार यह कह सकती है कि 60 वर्ष की गन्दगी साफ करने में कुछ तो समय लगेगा। पर जनता बहुत अधीर होती है। उसे दूरगामी परिणाम नहीं दिखाई देते बल्कि तुरन्त फल प्राप्ति की इच्छा होती है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में जैसी विजय भाजपा को मिली, वैसी विजय अब तक हुए किसी भी विधानसभा चुनावों में नहंीं मिली और आगे भी स्थिति बहुत उत्साहजनक दिखाई नहीं देती।

    उधर अरविन्द केजरीवाल एक मंजे हुए राजनेता की तरह शुरू से हर वो तीर चला रहे है जो निशाने पर लग रहा है। इसका मतलब ये नहीं कि अरविन्द जो वायदा करते हैं वो पूरा कर देंगे। पर आज वो मौके का फायदा उठाने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं। पिछले हफ्ते आम आदमी पार्टी ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाॅप्टर के घोटाले में केन्द्र सरकार को बुरी तरह घसीटा। अरविन्द का आरोप है कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने का वायदा कर मोदी सरकार बनी थी। पर क्या वजह हैं कि दो वर्षों में भी यह सरकार अगस्ता वेस्टलैंड के आरोपियों को नहीं पकड़ पायी। जबकि इटली की अदालतों ने आरोपियों को सजा भी सुना दी। इससे भी एक कदम आगे जाकर अरविन्द केजरीवाल ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने सोनिया गांधी से डील कर ली है, ’न तुम मेरे घोटाले उछालो, न मैं तुम्हारे घोटाले उछालूं’। इसलिए मोदी सरकार पिछली सरकार के भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने में नाकाम रही है।

    इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री का विवाद खड़ा करके अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। साफ जाहिर है कि केजरीवाल अपनी छवि बनाने का और दूसरों की छवि बिगाड़ने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। इसलिए चाहे लातूर में पानी की रेल भेजना हो या पंजाब के किसानों से हमदर्दी दिखानी हो, एक मजे हुए नेता की तरह अरविन्द केजरीवाल हर जगह खड़े नजर आते हैं। अब चूंकि दिल्ली में उनकी सरकार के अधिकार सीमित है, इसलिए अरविन्द की ईमानदारी या कार्यक्षमता की अभी परख करना संभव नहीं है। क्योंकि अरविन्द का तर्क होता है कि न तो मुझे पुलिस को नियंत्रित करने का अधिकार दिया गया है और न ही भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को पास करने दिया गया है। मुझे पूरी ताकत दो, तो मैं बताऊं कि भ्रष्टाचार कैसे कम होगा और जनता को कैसे राहत मिलेगी।

    जब तक ऊंट पहाड़ के नीचे नहीं आ जाता, तब तक उसे अपने छोटा होने का एहसास नहीं होता है। इसलिए अरविन्द केजरीवाल आज कुछ भी दावा कर सकते है। वे कह सकते है कि आप मुझे प्रधानमंत्री बना दो तो मैं आसमान के तारे तोड़ लाऊंगा और जनता उनकी लच्छेदार बातों में एक बार तो फंस ही जाएगी। असलीयत तो तब पता चलेगी जब प्रधानमंत्री बनकर भी अरविन्द बहुत सारी घोषणाओं को पूरा नहीं कर पायेंगे। पर तब की तब देखी जायेगी। अभी तो अपनी इस रणनीति के सहारे वे लगातार आगे बढ़ रहे है। अपनी ब्रान्डिंग इस तरह कर रहे है मानो सारे राजनेता धोखेबाज हैं और आपस में सबकी मिलीभगत है। केवल अरविन्द केजरीवाल ही दूध के धुले हैं। चूंकि जनता की अपेक्षाएं सरकार से बहुत ज्यादा होती है, इसलिए उसे कभी संतुष्टि नहीं होती। उस पर भी अगर सरकार की सफलता उसे दिखाई न दें, तो उसकी हताशा तेजी से बढ़ जाती हैं। इसलिए चतुर राजनेता हमेशा जनता की इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं और खुद आगे बढ़ जाते हैं। यही काम आज केजरीवाल बड़ी सफलता से कर रहे हैं और इसलिए लगता है कि आने वाले दिनों में केजरीवाल अपने सभी राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को पछाड़ देंगे। 

दरअसल देश की जनता को अब मंदिर, गौहत्या, राष्ट्रवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे भावनात्मक मुद्दों से बहकाया नहीं जा सकता। अब जनता काफी जागरूक हो गई है। समाज का बहुत बड़ा वर्ग अब अखबार और टीवी पर अपनी राय नहीं बनाता। सोशल मीडिया में हर बात खुलकर आ जाती है। इसलिए जनता को बरगलाना सम्भव नहीं है। जहां तक विकास की बात है, तो उसका ज्यादा श्रेय तो निजी क्षेत्र और उद्यमियों को जाता है। सरकार और उसके अधिकारियों के रवैये में ऐसा कोई बदलाव नहीं आया है, जिससे जनता को राहत मिले। उसकी समस्याओं का समाधान हो और उसे आगे बढ़ने का मौका मिले। अनुभव तो यही बताता है कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था आम आदमी को परेशान करने के लिए और उसकी कार्यक्षमता को खत्म करने के लिए बनी है।

जब तक कोई नेता चाहे वो कजरीवाल हो या नरेन्द्र मोदी प्रशासन के इस मकड़जाल को तोड़कर साफ नहीं कर देते, तब तक जनता का भला होने वाला नहीं है। इसलिए जनता परेशान रहती है और फिर कभी वीपी सिंह, कभी नरेन्द्र मोदी और कभी अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता सपने दिखाकर उसकी उम्मीदें जगा देते है। हर बार उसे लगता है कि शायद अबकी बार उसे अपनी समस्याओं से निजात मिल जाएगी। यह सोचकर वह हर नए मसीहा के पीछे चल देती है। अब चुनौती नरेन्द्र मोदी के सामने है कि वे ऐसा कुछ करें कि जो केजरीवाल को उंगली उठाने का मौका न मिले। ये बात दूसरी है कि अगर केजरीवाल प्रधानमंत्री के पद पर बैठ गए तो वे भी कोई काला जादू चलाकर समस्याऐं हल नहीं कर पाएंगे। पर सपने दिखाकर कुर्सी तो हथिया ही लेंगे।

Monday, January 27, 2014

‘नई राजनीति’ को राष्ट्रपति की चेतावनी

अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताएं, देश की सशस्त्र सेना की परेड या राष्ट्रीय पर्वों पर शानो-शौकत से मनाए जाने वाले उत्सव किसी राष्ट्र की समृद्धि और सफलता की पहचान होते हैं। इनसे सेना और देशवासियों का उत्साह बढ़ता है। पर कुछ लोग यह सवाल करते हैं कि जब समाज का बहुत बड़ा वर्ग साधनहीन हो, तो उत्सव मनाना कहां तक उचित है। शायद इसी संदर्भ में भारत के महामहिम राष्ट्रपति डा.प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में अराजकता की राजनीति पर प्रहार किया है। अगर देश में उत्सव और पर्व नहीं मनाए जाएंगे, तो राष्ट्र के जीवन में नीरसता आ जाएगी। अपने तीज-त्यौहार तो हर व्यक्ति मनाता है, चाहे वो संपन्न हो या विपन्न। क्योंकि इनको मनाने से जीवन में आनन्दरस की प्राप्ति होती है।
हाल के दिनों में दिल्ली के मुख्यमंत्री ने नई राजनीति का दावा करते हुए धरने प्रदर्शन का जो स्वरूप प्रस्तुत किया, उससे हो सकता है कि आम आदमी की पुलिस के प्रति भड़ास को अभिव्यक्ति मिली हो। पर इससे समाधान कोई नहीं निकाल सका। स्वयं को अराजक कहने वाला मुख्यमंत्री यह भूल जाता है कि उसने अपने शपथ ग्रहण भाषण में दावा किया था कि मात्र 48 घंटे में भ्रष्टाचार से जुड़ी अपनी प्रजा की शिकायतों का निपटारा कर देगा। 48 घंटे तो दूर 30 दिनों के बाद भी निपटारे के आसार नजर नहीं आ रहे। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही घर पर जनता दरबार लगा लिया। पर जब मुख्यमंत्री बनकर लगाया, तो होश ठिकाने आ गए। भीड़ से घबराकर, अपनी जान बचाने के लिए सचिवालय की छत पर दौड़कर चढ़ना पड़ा। मतलब साफ है कि भीड़ बुलाकर प्रशासनिक समाधान नहीं निकाले जा सकते। फिर रेल भवन के सामने धरना देकर नई राजनीति का दावा करने वाला यह मुख्यमंत्री क्या नहीं जानता था कि इस धरने का कोई औचित्य नहीं है और इससे कुछ नहीं हासिल होगा ?
हर कदम रणनीति के तहत उठाने वाला व्यक्ति मूर्ख नहीं हो सकता। उसने सोचा कि एक तो मीडिया में प्रसिद्धि मिलेगी और दूसरे आमआदमी से जो लम्बे चैड़े दावे किए गए थे, उन्हें पूरा किए बिना ही दोष केंद्र सरकार पर मढ़कर बच भागने का रास्ता निकल जाएगा। जनता भोलीभाली है। पुलिस से नाराज रहती है। वह इसी बात से बहक जाएगी कि हमारा मुख्यमंत्री सड़क पर गद्दे बिछाकर सोता है।
इस नई राजनीति का दंभ भरने वाले एंग्री यंग मैन मुख्यमंत्री क्या यह बताएंगे कि राजस्व का जो विभाग उनके सीधे नियंत्रण में है, उससे भ्रष्टाचार दूर करने में उन्हें क्या दिक्कत आ रही है ? क्योंकि कानून व्यवस्था व पुलिस के मामले में तो वे यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि उनका पुलिस पर कोई नियंत्रण नहीं। पर दिल्ली में अरबों रूपये के सेल्स टैक्स की चोरी खुलेआम रोजाना हो रही है, इसे रोकने की पहल क्यों नहीं करते ? क्योंकि ऐसा करते ही पूरे दिल्ली की जनता एंग्री यंग मैन मुख्यमंत्री के खिलाफ खड़ी हो जाएगी। जो आज सेल्स टैक्स (वैट) दिए बिना ही अरबों का कारोबार करती है। इससे आम आदमी पार्टी का वोट बैंक खिलाफ हो जाएगा।
साफ जाहिर है कि कुछ ठोस कर नहीं सकते तो क्यों न ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ दिया जाए। पर महाराज गलत फंस गए। नौटंकी का सच सामने आ गया। कल तक जो लोग बड़े उत्साह से इस नई राजनीति के दावेदारों के लोक-लुभावने झूठे दावों से आकर्षित होकर इनकी तरफ बिना सोचे समझे भाग रहे थे, वे ठिठक गए। अब तो दिल्ली में चर्चा यह है कि ऐसा व्यक्ति अगर प्रधानमंत्री बन जायेगा, तो वह राष्ट्रपति भवन के सामने धरने पर बैठकर मांग करेगा कि देश की तीनों सशस्त्र सेनाओं को मेरे आधीन कर दो, वरना मैं सरकार इण्डिया गेट से चलाऊंगा। ऐसे देश का शासन नहीं चला करता। बदलाव के लिए क्रान्तिकारी राजनीति का दंभ भरने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन और रूस की क्रान्ति के बाद भी बड़े भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर वहां के समाज में भी कोई बदलाव नहीं आया।
उधर आम आदमी पार्टी का एक भी नेता ऐसा नहीं जिसने गत 10 वर्षों में बड़े भ्रष्टाचार के विरूद्ध कोई प्रभावशाली संघर्ष किया हो। इनका एक ही काम है, सबको गाली देना, सबके प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, सबको चोर बताना और अपने को सबसे ज्यादा साफ और ईमानदार। पर एक कहावत है ‘घर घर चूल्हे माटी के’। आम आदमी पार्टी के तौर तरीके और इनके आत्मघोषित नेताओं के अहंकार और राजनैतिक अपरिपक्वता को देखकर अब इनके शुभचिंतकों का भी इनसे मोह भंग हो रहा है। उन्हें दिख रहा है कि राजनीति के आतंकवादियों की तरह व्यवहार करने वाली यह पार्टी देश में अराजकता और अस्थिरता पैदा कर देगी।यह मानने वालों की भी कमी नहीं कि आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति को एक ऐसे मुकाम पर ले जाएगी, जब न तो केंद्र में मजबूत सरकार बनेगी और न ही देश की समस्याओं का कोई हल निकलेगा। चूंकि हमें इनके चाल-चलन का बहुत लम्बा अनुभव रहा है, इसलिए हम शुरू से इनके दावों और असलियत के बीच के अंतर को जानते हैं। इसलिए हमने इन्हें कभी भी गंभीरता से नहीं लिया। ये पूरे देश में चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। पर क्या इससे भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा ? ऐसा कुछ नहीं होगा। केवल इनके संगठन का थोड़ा बहुत विस्तार होगा, जिसकी कीमत आम जनता को एक बार और धोखा खाकर चुकानी पड़ेगी। क्योंकि नारों से आगे बढ़कर ये जनता का कोई भला नहीं कर पाएंगे। उसे कुंए से निकालकर खाई में पटक देंगे। इसलिए राष्ट्रपति ने पहली बार इसी खतरे की ओर ध्यान दिलाया है और ऐसे लोगों को समझदारी से संघर्ष करने की नसीहत दी है।