Friday, July 28, 2000

क्यों हुआ बाल ठाकरे की गिरफ्तारी का नाटक?

इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा कि अगर शिव सेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे मुंबई में साम्प्रदायिक दंगा भड़काने के दोषी हैं तो उन पर कानूनी कार्रवाही न की जाए। पर प्रश्न है कि जो बवाल हाल ही में मचाया गया उसकी पृष्ठभूमि में क्या था ? क्या किसी दोषी राजनेता को सजा देने की मंशा या केवल अहम् तुष्टि की राजनीति की उपज और ताकत का टकराव ?

अगर साम्प्रदायिकता भड़काने के जुर्म में ही बाला साहब को गिरफ्तार करने की बात सोची गई थी तो देश के हिंदुओं को यह सवाल पूछने का हक है कि पिछले 50 वर्षों से देश की हजारों मस्जिदों में जुम्मे की नमाज के बाद जो साम्प्रदायिक उन्माद भड़काया जाता रहा है उसके जुर्म में कितने मौलवी आज तक गिरफ्तार किए गए ? कितनों पर मुकदमे चले ? कितनों को सजा मिली ? इन सवालों के जवाब देने की हिम्मत न तो महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री छगन भुजबल की है न उनके वरिष्ठ नेता शरद पंवार की और न ही उनके सहयोगी दल इंका के नेताओं की। हिंदुस्तान पर आज तक सबसे ज्यादा हुकूमत कांग्रेस पार्टी ने की है। उस कांग्रेस पार्टी ने जिसके मार्ग निर्देशक महात्मा गांधी सरीखे लोग रहे हैं। कांग्रेस पार्टी धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करती है किंतु उसके शासनकाल में साम्प्रदायिकता घटने के बजाए दिन दूनी और रात चैगुनी बढ़ीं थी। जाहिर है कि देश में साम्प्रदायिकता का जहर घोलने में एक सुगठित तंत्र लगा हुआ था। जिस तंत्र का पालन-पोषण कांग्रेस की ही छत्र-छाया में हुआ। यानी कांग्रेस पार्टी ने बाकायदा साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोगों को प्राश्रय और प्रोत्साहन दिया। इन वर्षों में मुस्लिम धर्मांधता और हिंदुओं के प्रति घृणा बढ़ाने वाले हजारों आॅडियो-वीडियो कैसेट और करोड़ों पर्चे व पुस्तिकाएं मुस्लिम समाज द्वारा देश भर में बांटी गईं हैं। जिनमें भारतीय मूल के मुसलमानों का साम्प्रदायिकता भरा आह्वाहन किया जाता रहा है। प्रायः ऐसे प्रकाशनों में लिखने वालों ने अपने नाम व पते भी निडर होकर छापे हैं। इसलिए केंद्र और राज्यों की सरकारें यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि उनके पास साम्प्रदायिकता भड़काने वालों के खिलाफ प्रमाण नहीं थे। प्रमाण थे और आज भी है पर वे दबा दिए जाते हंै। इस काम में वे सभी दल या नेता शामिल हैं जो कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं। अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज के वोटों के लालच में हर दल उनकी सेवा में जुटा रहता है। उनकी हर जा और बेजा हरकत को नजरंदाज करता रहता है। पर जब वैसी ही हरकत हिंदू समाज के नेता करते हैं तो उन्हें साम्प्रदायिक करार दे दिया जाता है। इस देश के ज्यादातर आत्म घोषित बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से का भी यही रवैया रहा है। उन्हें बाल ठाकरे की शिव सेना तो साम्प्रदायिक नजर आती है। पर देश के मुस्लिम आबादी वाले नगरों में हावी मुस्लिम माफियाओं के द्वारा किए जा रहे अपराध, तस्करी, हिंसा और देशद्रोह के काम नजर नहीं आते। वोहरा कमेटी की रिपोर्ट इस बात की गवाह है कि देश में अपराध और आतंक फैलाने में सत्तारूढ दल के नेताओं का हाथ रहा है। जिस दौर की बात वोहरा कमेटी करती है उस दौर में इस देश में उन्हीं लोगों की सरकारें रही हैं जिनकी सरकार आज महाराष्ट्र में है। पर सब कुछ दबा दिया गया। वैसे ही जैसे दर्जनभर केंद्रीय मंत्री और बड़े नेताओं से जुड़ेे हवाला कांड को दबा दिया गया। उस हवाला कांड को जो मुंबई, दिल्ली, कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों में आतंक फैलाने के लिए जिम्मेदार लोगों के काले कारनामों को उजागर करता है।

पिछले हफ्ते टेलीविजन के अनेक चैनलों पर ‘रूॅल आॅफ लाॅ’ को लागू करने की बात की गई यानी कानून का शासन। किस कानून का ? उस कानून का जो आज तक देश में एक भी बड़े नेता को भ्रष्टाचार, हिंसा, जातिवाद या साम्प्रदायिकता फैलाने के जुर्म में सजा नहीं दे पाया। फिर बाला साहब ठाकरे के संबंध में ही कानून की इतनी याद क्यों आ रही थी ? उस कानून की जिसके सर्वोच्च शिखर पर बैठे कुछ लोग आज शक के घेरे में खड़े किए जा चुके हैं और उनके पास अपनी सफाई में कहने को कुछ भी नहीं है ।

इतना ही नहीं बाला साहब ठाकरे पर जो लोग राजनीति में धर्म का दुरूपयोग करने का आरोप लगा रहे हैं वो तब कहां थे जब धीरेंद्र ब्रह्चारी नाम का एक व्यक्ति इस देश की प्रधानमंत्री का इस्तेमाल करके रातो रात अरबपति बन गया। कांग्रेसी हुकूमत के दौरान धीरेंद्र ब्रह्म्चारी जैसे लोग देश की आम जनता के प्रति सैकड़ों करोड़ की आर्थिक हिंसा करके रातो रात अरबपति हो गए और किसी ने विरोध नहीं किया। किसी ने नहीं पूछा कि बिहार से योग सिखाने निकला एक व्यक्ति अरबों की संपत्ति का मालिक कैसे बन गया ? कैसे खड़े कर लिए उसने हवाई जहाजों के जखीरे ? कैसे खड़ी कर ली उसने शस्त्रों की फैक्ट्रियां? कैसे खड़े कर लिए उसने कश्मीर में सैकड़ों एकड़ वर्जित क्षेत्र में राज-प्रसादों के से ठाट-बाट ? जिसने भी मानतलाई में अपर्णा आश्रम नाम की विशाल संपत्ति देखी है, वह यह देख कर हैरान हो जाता है कि डोडा जिले से लगे इस अति संवेदनशील इलाके में, सेना की नाक तले, हवाई अड्डा, पांच सितारानुमा होटल व दूसरी तमाम अति आधुनिक इमारतें अवैध रूप से कैसे बनती रहीं ? क्या वह योग-धर्म का राजनैतिक दुरूपयोग नहीं था ?

दिल्ली की जामा मस्जिद इलाके में इमाम बुखारी की हुकूमत कैसे चलती है यह बताने की जरूरत नहीं। उस इलाके में पुलिस भी घुसती है तो वहां के साम्प्रदायिक नेताओं की इजाजत लेकर। लेकिन तब कोई बुद्धिजीवी शोर नहीं मचाता। कोई नहीं कहता कि कानून का शासन लागू होना चाहिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे प्रधानमंत्री तक इमाम बुखारी को सिजदा करने जाते हैं। पर आश्चर्य होता है यह देख कर कि ऐसे तमाम लोग बाला साहब ठाकरे को ही साम्प्रदायिक बता कर जेल में बिठाना चाहते थे।

अक्सर इस तरह के सवाल पर लिखना बहुत खतरनाक होता है क्योंकि टिप्पणी देने में सिद्ध लोग झट से नतीजा निकालेंगे कि लिखने वाला बाल ठाकरे पक्ष का ले रहा है। इसलिए लेख की मूल भावना को समझा जाए। यहां यह आशय कतई नहीं है कि बाला साहब ठाकरे ने अगर कानून की नजर में कोई अपराध किया है तो उन पर मुकदमा न चलाया जाए। यहां यह भी आशय नहीं है कि शिव सेना के काम काज का जो तरीका रहा है उससे हम सहमत हैं। यहां केवल इतनी सी बात उठाने की कोशिश की जा रही है कि क्या कानून सब पर एक-सा लागू होता है ? ऐसा क्यों होता है कि सत्तारूढ़ दल केवल अपने विरोधी नेताओं के ही खिलाफ कार्रवाही करते हैं। उन्हें अपने दल के अपराधी राजनेताओं के खिलाफ उसी तत्परता से कानूनी कार्रवाही करने की हिम्मत क्यों नही होती? कोई दल इस मानसिकता आ अपवाद नहीं है। वही जयललिता जब राजग की सदस्य थी तो उनके सौ खून माफ थे। पर जैसे ही वो राजग के विरोध में गई उनकी गिरफ्तारी के सिलसिले चालू हो गए। वही सुखराम भाजपा के लिए भ्रष्टाचार के पर्याय थे और उनके विरूद्ध भाजपा ने 13 दिन तक संसद नहीं चलने दी थी पर वही सुखराम आज भाजपा सरकार के सहयोगी हैं।

इसलिए बाला साहब ठाकरे की गिरफ्तारी के नाटक को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस नाटक के पीछे इरादा न तो साम्प्रदायिकता फैलाने के आरोप में श्री ठाकरे को सजा दिलवाना था और न ही इस कदम से मुंबई की सड़कों से अपराध और आतंक को समाप्त करना था। इस कदम का तो एक ही मकसद था कि छगन भुजबल, जो कुछ वर्ष पहले तक बाल ठाकरे के दाहिने हाथ थे, अब उन्हीं से अपना पुराना हिसाब चुकता करना चाहते थे। उन्हें अपमानित करना चाहते थे और उन्हें अपनी ताकत दिखाना चाहते थे। श्री भुजबल को इस बात की कतई चिंता नहीं कि उनके इस बचपने से मुंबई में कितना आतंक और अनिश्चितता फैल गई ? कितना पैसा बंदोबस्त में बर्बाद हुआ? नगर के उद्योग-व्यापार पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ा ? मुंबईवासी हफ्ते भर तक कितने भय और आतंक में जिए। श्री भुजबल जानते हैं कि उनके दल के पास कोई भी नैतिक आधार नहीं है। फिर भी वे ऐसा प्रचारित करने का प्रयास कर रहे थे कि उनकी सरकार कानून की रक्षा के लिए समर्पित है। अगर श्री भुजबल वाकई कानून की स्थापना करना चाहते हैं तो वे इस बात की पुरजोर मांग करें कि सीबीआई के कोल्ड स्टोरेज में दबा दी गई सैकड़ों फाइलों को बाहर निकाला जाए और उनमें दर्ज कांग्रेसी व दूसरे बड़े नेताओं के अपराधों के अनुरूप उन्हें भी सजा दी जाए। अगर उनमें ऐसी मांग करने का नैतिक बल नहीं है तो उन्हें इस बात का भी हक नहीं है कि वे इतने पुराने मामले को इस तरह बेवजह उखाड़ कर मुंबई के जनजीवन में जहर घोलें।

Friday, July 21, 2000

मुलायम सिंह यादव के सामने चुनौती


भारत का लोकतंत्र ठिठक गया है। लोग हैरान हैं कि देश में विपक्ष नाम की कोई चीज है भी या नहीं? क्योंकि देश को विपक्ष की मौजूदगी का एहसास ही नहीं हो रहा। संसद के कितने अधिवेशन हो चुके और अब मानसून सत्र शुरू होने को है, पर लगता है कि जैसे सत्तापक्ष ने विपक्ष की आवाज छीन ली है। क्या राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा की सरकार इतना बढि़या काम कर रही है कि उसमें विपक्ष को कहीं कमी नजर ही नहीं आती ? या फिर सरकार जो कुछ कर रही है वह विपक्षी दलों के नेताओं की सहमति और साझेदारी से कर रही हैइसलिए विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि विपक्ष में जो बडे़ दल आज हैं उनके पास  अब इतना नैतिक बल ही नहीं बचा कि वे सत्तारूढ़ दलों का विरोध कर सकें ? शायद इसलिए कि जो दल आज विपक्ष में बैठे हैं वो कभी न कभी सत्ता में रह चुके हैं। इसलिए जानते हैं कि जब वे सत्ता में थे तब वे भी ऐसे ही सरकार चलाते थे तो अब किस मुंह से विरोध करें ? जो भी हो कुल मिला कर विपक्ष थका-पिटा, ऊर्जाहीन, कांतिहीन और नेतृत्व विहीन नजर आता है। सबसे बड़े दल की नेता श्रीमती सोनिया गांधी का अभी राजनैतिक प्रशिक्षण चल रहा है। पिछले वर्ष में उन्होंने जिस तरह का नेतृत्व दिया उससे कांगे्रसियों के मन में अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है। शरद पंवार, नरसिंह राव, एनडी तिवारी जैसे दिग्गज नेता चुप्पी ओढ़े बैठे हैं। कम्युनिस्ट दल अपने शेष साम्राज्य को ढहता हुआ देख रहे हैं। विपक्ष के इस बिखराव का भाजपा व सहयोगी दल डट कर फायदा उठा रहे हैं। आज सरकार में बैठे ज्यादातर राजनेता वह सब कर रहे हैं जिसकी वे अतीत मे आलोचना करते आए थे। वे जानते हंै कि विपक्ष उन्हें चुनौती नहीं देगा इसलिए अब उन्हें लोक-निंदा की भी चिंता नही रही। अब तो भाजपा के छुट-भइए नेता भी यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हमें तो सत्ता चाहिए थी, वो मिल गई। वायदे और विचारधारा तो जनता को हांकने के लिए होते हैं। असल में तो राजनीति ऐसे ही की जाती है जैसे आज हमारे नेता कर रहे हैं।
एक तरफ देश की राजनीति के सर्वोच्च स्तर पर ये आलम है तो दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक गरीब और आम जनता ही नहीं मध्यम वर्गीय लोग तक मौजूदा सरकार की नाकामियों और जन विरोधी नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं। बिजली, पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने में नाकामयाब सरकार जब चांद पर राकेट भेजने की बात करती है तो देश की जनता सिर धुन लेती है। इधर कुछ दिनों से सूचना प्रौद्योगिकी को लेकर जिस तरह का शोर मचाया जा रहा है उससे भी आम जनता में हताशा फैल रही है, क्या सूचना प्रौद्योगिकी को खाएं या पिएं ? जनता हैरान है यह सोच कर कि क्या सरकार की प्राथमिकताएं केवल देश के बड़े उद्योगपतियों के हित साधना ही है ? क्या उसे अपने गरीब मतदाताओं की कोई चिंता नहीं है ? यह सही है कि मौजूदा सरकार में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो पूर्ववर्ती सरकारों में भी उतने ही शक्तिशाली थे, जितने आज हैं। जाहिरन उनकी कार्य प्रणाली में वही पुराना ढर्रा है जो पिछली सरकारों में था। इस पर न तो संघ की विचारधारा का कोई प्रभाव है और न उन आश्वासनों का जो वाजपेयी जी आज तक जनसभाओं में देते आए हैं। कुल मिलाकर लोगों को यही लगता है कि कोई भी दल सरकार में क्यों न आ जाए उसको चलाने की बागडोर निहित स्वार्थों के हाथों में ही रहती है। ऐसा अब भाजपा के समर्थक भी मानने लगे हैं। इसलिए उनके मन में निराशा और भविष्य के प्रति आशंका दोनों है।
इस शून्य को भरने के दो रास्ते हैं या तो देश के जुझारू और क्रांतिकारी लोग राजनीति में आएं और विकल्प दें। पर वे ऐसा कर पाएंगे इस पर किसी को सहज विश्वास नहीं होता। अगर ऐसा नहीं होता है, जिसकी संभावना ज्यादा है, तो मौजूदा राजनैतिक दलों में से ही नए नेतृत्व को चुनने की बात उठेगी। दरअसल देश को आज एक जुझारू  और जमीन से जुड़े नेतृत्व की जरूरत है। इस दृष्टि से फिलहाल दो-तीन नाम ही उभर कर सामने आते हैं। ममता बैनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, मायावती व मुलायम सिंह यादव।
चंद्रबाबू नायडू और ममता बैनर्जी फिलहाल केंद्रीय सरकार में शामिल हैं इसलिए इनकी तलवार भौंथरी हो गई है। जब कभी भविष्य में चुनाव होंगे तो इन्हें सरकार की नाकामियों के पाप को ढोना पड़ेगा। इसलिए ये दोनो ही नेता विपक्षी दलों के ध्रुवीकरण का केंद्र नहीं बन सकते। वैसे भी इनकी रूचि अपने-अपने राज्यों तक ही सीमित है। मायावती अपने अहमक स्वभाव के कारण शायद सर्वमान्य नेता नहीं हो सकती। वैसे भी उन्होंने उत्तर प्रदेश की सरकार चलाने के लिए भाजपा से हुए अपने करार को जिस तरह तोड़ा था और लोकसभा में विश्वास मत पर बहस के दौरान जिस तरह रातो-रात पासा पलटा था उससे मायावती की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिंह लग गया है। इसलिए बचे मुलायम सिंह यादव। यूं तो चार पूर्व प्रधानमंत्री भी देश को फिर से नेतृत्वदेने को अकुला रहे हैं। पर काठ की हांडी रोज-रोज नहीं चढ़ा करती। वे भले ही चाहें पर लोग उन्हें अब एक और मौका देकर मूर्ख बनने को तैयार नहीं हैं।
उधर मुलायम सिंह यादव ने पिछले कुछ वर्षों में अपने व्यक्तित्व और कद को बढ़ाया है। केंद्र की सत्ता में साझेदारी का इंकाई न्यौता उन्होंने जिस तरह ठुकरा दिया था उससे उनके बारे में अच्छा संदेश गया। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी ऐसी स्थिति रही है कि मुलायम सिंह चाहते तो सरकार में शामिल हो सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। शायद उनकी रणनीति रही होगी कि भाजपा को सरकार चलाने दो। लोगों का भाजपा से मोहभंग होने दो। हिंदू धर्मावलंवियों को यह महसूस करने का मौका दो कि भाजपा ने राम नाम का सहारा लेकर जनता की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया है, केवल इसलिए कि सत्ता हासिल की जा सके। यह तो सभी जानते हैं कि भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग वैश्य समुदाय है। जिस वैश्य समुदाय को भाजपा आज तक रंगीन सपने दिखाती आई थी वही वैश्य समुदाय आज भाजपा से सबसे ज्यादा नाराज है। भाजपा के राज के बावजूद न तो करों को लेकर सरकार की नीति बदली, न इंस्पेकटर राज का खातमा हुआ। यहां तक कि हर सरकारी मुलाजिम को रिश्वत देने के बाद भी गाली खाने को मजबूर वैश्य समुदाय की इज्जत में भी भाजपा के शासनकाल में कोई इजाफा नहीं हुआ। छोटे दुकानदारों और कारखानेदारों की जो बेइज्जती पिछली सरकारों के दौरान होती थी वैसी ही भाजपा के राज में आज भी हो रही है। इतना ही नहीं भाजपा सरकार की आयात-निर्यात और आर्थिक नीतियों के चलते तमाम लघु उद्योग तेजी से बंद होते जा रहे हैं। इससे वैश्य समाज में भाजपा के प्रति भारी आक्रोश है। जिसका सीधा लाभ अब मुलायम सिंह यादव को मिल सकता है।  शायद यही सोच कर उन्होंने उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ अन्य दलों की तरह गठबंधन सरकार में शामिल होने की बात नहीं स्वीकारी। उन्होंने सोचा होगा कि भाजपा की सरकार बनी रही तो जनता के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। जनता इनका असली चेहरा देख लेगी। उसे अच्छी तरह समझ में आ जाएगा कि भाजपा की कमीज दूसरों की कमीज से ज्यादा उजली नहीं है, जिसवे वे दावा करते हैं। शायद मुलायम सिंह की राजनैतिक सूझबूझ और दूर-दृष्टि काम आई। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में हुए पंचायतों के चुनावों में भाजपा समर्थित उम्मीदवार बुरी तरह पिटे। जबकि मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से समर्थित उम्मीदवार बड़ी तादाद में सफल रहे। जाहिरन इससे सपा के खेमे में उत्साह बढ़ा है और अब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभाई चुनाव अकेले अपने ही बूते पर लड़ने की बात कह रहे हैं। पर आगे का रास्ता इतना आसान न होगा। उनके वोट बैंक पर कई दावेदार दांत गड़ाए बैठे हैं। अगर मुलायम सिंह यादव का लक्ष्य केवल उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री ही बनना है तो बात दूसरी है। पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो वे 10 वर्ष पहले भी थे। इन 10 वर्षों में तो उनका कद बढ़ा है। एक बार तो वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार भी रह चुके हैं। इसलिए यदि वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाना चाहते हैं तो उन्हें उत्तर प्रदेश के बाडे़ से बाहर निकलना होगा और अपनी पुरानी छवि को बदलना होगा। जिसके लिए उन्हें एक सुगठित संगठन की जरूरत होगी जो आज उनके पास नहीं है। भाजपा समर्थित मीडिया ने जो उनकी छवि बनाई थी उसे तोड़ने के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कुछ मशहूर और सक्षम नए चेहरों की एक टीम भी अपने साथ जोड़नी पड़ेगी। जिस टीम के सदस्य समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हों। ताकि उनकी पार्टी एक नेता के पीछे ही चलने वाली भीड़ न लग कर एक इज्जतदार राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित हो सके। तभी देश की राजनीति में उनकी भूमिका बढ़ेगी।
अब जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि उनकी आलोचना करने वालों के असली चेहरे कुछ बेहतर नहीं हैं, तो यही वह मौका है जब मुलायम सिंह यादव यह संदेश दे सकते हैं कि उनकी नई टीम प्रशासन और राजनीति को नए अंदाज से चलाएगी। इतनी गंभीरता से कि जनता सुरक्षित महसूस करे। किसान मजदूरो की भी सुनी जाए। व्यापारी की इज्जत हो। समाज में कानून का डर फैले। यदि मुलायम सिंह यादव ऐसा संदेश दे पाते हैं तो उनकी कामयाबी को कोई रोक नहीं पाएगा। क्योंकि उनमें राष्ट्रीय नेता बनने के सभी गुण मौजूद हैं। लालू यादव के मुकदमों में उलझ जाने के कारण हिंदी भाषी राज्यों में उनका कोई सीधा मुकाबला करने वाला अभी दिखाई नहीं दे रहा है। पर उन्हें संकुचित राजनीति के दायरे से निकल कर संपूर्ण भारत की दृष्टि से हर स्थिति का मूल्यांकन करने की आदत डालनी होगी। अगर वे ऐसा नहीं कर सके तो केंद्र की राजनीति में वे सत्ता की जोड़तोड़े व मोलभाव करने वाले कुछ सांसदों के एक गुट के नेता से ज्यादा नहीं बन पाएंगे। मौजूदा हालात में मुलायम सिंह क्या करते हैं ये आने वाला वक्त ही बताएगा। पर यह भी स्पष्ट हैं कि भारत में फिलहाल विपक्ष की राजनीति की धु्ररी बनने की सबसे ज्यादा संभावना मुलायम सिंह यादव की ही है।

Friday, July 14, 2000

अभिषेक बच्चन के आगे का सफर

जिस दौर में हर नया युवा फिल्मी अदाकार कपड़े उतार कर, कूल्हे मटकाकर और बिना वजह कूद-कूद कर बंदरनुमा डांस करने को ही एक्टिंग मान रहा हो उस दौर में धारा के विरूद्ध तैरने का प्रयास किया है जया और अमिताभ बच्चन के बेटे ने। हाल में रिलीज हुई रिफ्यूजी फिल्म में न तो अपने जिस्म की नुमाइश की और न ही भौंडे डांस। भारत पाक सीमा पर बसे गांवों के बीच तस्करी होती आई है ये वर्षों से लोग सुनते आए थे। पर उसका तरीका क्या है ? इस तस्करी में दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों की क्या भूमिका होती है। सरहद के आस पास रहने वाले गांव कैसे खतरों के बीच अपनी भावनाओं के रिश्ते बनाए रखते हैं ? कुछ ऐसे सवाल थे जिन पर रिफ्यूजी फिल्म ने अच्छा प्रकाश डाला है। ऐसे गंभीर विषय के लिए जैसे किरदार की जरूरत थी उसे अभिषेक ने बखूबी निभाया है। फिल्म आलोचक जरूर अभिषेक की तुलना रितिक रोशन से करके अभिषेक को अभिनय में कच्चा बता रहे हैं, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि आधुनिक डिस्को संस्कृति में पले-बढ़े बच्चे जब युवा कलाकार बन कर फिल्मों में आते हैं तो उनको वैसे ही सांस्कृतिक परिवेश पर आधारित फिल्म में काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती। क्योंकि जो वे स्कूल और काॅलेज में करते आए हैं उसे बड़ी सहजता से फिल्म पर्दे पर उतार देते हैं। फिर वो चाहे रितिक हो या कोई और। पर रिफ्यूजी फिल्म से अपनी फिल्मी कैरियर की शुरूआत करके अभिषेक ने बहुत बड़ा जोखिम उठाया है। इसलिए अभिषेक के अभिनय की छोटी-मोटी कमियों की तरफ ध्यान न देकर यह देखना चाहिए कि जो किरदार उसे सौपा गया वह उसने ठीक से निभाया या नहीं। जवाब होगा कि अभिषेक रिफ्यूजी के पात्र को दर्शक के दिल में उतारने में कामयाब हुआ है। 

ये जरूरी नहीं कि हर कलाकार समय के साथ बहे तभी कामयाब होता है। बाॅलीबुड के इतिहास में ऐसे अनेकों सितारे हुए हैं जिन्होंने लीक से हटकर अभिनय किया और उसी तरह के अभिनय पर टिके रहे और अपनी एक अलग पहचान बनाई। राजकुमार ऐसा ही एक नाम था। अभिषेक की मां जया बच्चन जब पूना फिल्म इंस्टिट्यूट से पढ़कर फिल्म जगत में आईं तो एक तेज-तर्रार लड़की थीं। ऐसा उनके शिक्षक श्री रौशन तनेजा और सहपाठी बताते थे। पर जब जया भादुड़ी फिल्मों में आई तो उनकी छवि एक शालीन, सुसंस्कृत लड़की की बनी। क्योंकि उन्होंने वैसी ही भूमिकाएं निभाई। कभी न तो कपड़ों को तन से उतारा और ना ही कभी कोई वाहियात हरकत कीं। फिर भी वे बहुत जल्दी दर्शकों को भा-गई और उन्होंने अपनी यही छवि बनाए रखी।

अभिषेक के चेहरे-मोहरे और आंखांे में अपनी मां का वही भोलापन और सादगी है। यूं तो कलाकार को कई तरह की भूमिकाएं निभानी होती है। जरूरी नहीं कि हर भूमिका हर दर्शक को पसंद ही आ जाए पर अभिषेक चाहे तो नसरूद्दीन शाह और नाना पाटेकर को अपना आदर्श मान कर चुनौती पूर्ण भूमिकाएं ले सकता है। इससे उसका अभिनय भी निखरेगा और अलग पहचान भी बनेगी। पुरानी कहावत है कि नया नौ दिन और पुराना सौ दिन। ये कमर मटका कर और उछलकूद करके फिल्में पूरी कर देना बहुत दिनों तक नहीं चलेगा। लोग ऊब जाएंगे और तब उन्हें तलाश होगी धीर-गंभीर नायकों की। चूंकि फिलहाल अभिषेक उसी संाचे में ढला दिखाई देता है  इसलिए ऐसा करना शायद उसके लिए मुश्किल नहीं होगा।

वैसे भविष्य में क्या होगा यह कहा भी नहीं जा सकता। अमिताभ बच्चन जब सात हिंदुस्तानी फिल्म में आए थे तो उनकी एक शालीन, सरल युवक की छवि बनी थी। पर बाद में शायद सस्ती लोकप्रियता और पैसा कमाने की चाहत ने उन्हें भौंडे नृत्य करने पर मजबूर कर दिया। वे लोकप्रिय तो खूब हुए पर एक पूरी पीढ़ी उनके साथ कमर मटकाने को खड़ी हो गईं। अमिताभ यह कह कर पल्ला झाड़ सकते हैं कि फिल्म समाज से हट कर नहीं बन सकती। पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि समाज पर फिल्मों का काफी प्रभाव पड़ता है। इसलिए सुसंस्कृत और शालीन परिवारों से आने वाले कलाकारों से तो उम्मीद की ही जा सकती है कि वे समाज के पतन में सहयोग न देकर उसके उत्थान में योगदान देंगे। जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं होता। अपने से ये सवाल भी पूछना बहुत जरूरी  होता है कि हमने समाज से क्या लिया और उसे बदले में क्या दिया ? ये जरूरी नहीं कि अभिषेक अपनी मां का रास्ता ही अपनाएं। लोकप्रियता और खूब पैसे की चाहत अभिषेक को भी उसी रास्ते पर ले जा सकती है जिस पर उनके पिता चाहे-अनचाहे चले। इसलिए आगे क्या होगा इसका फैसला तो अभिषेक और उनके दर्शकों के हाथ में रहेगा, पर अभिषेक को यह भी याद रखना चाहिए कि वे सम्मानित साहित्यकार श्री हरिवंशराय बच्चन के प्रपौत्र हैं।

ये बड़े दुख की बात है कि जिस तरह की भौंड़ी संस्कृति को आज बढ़ाया जा रहा है उससे समाज के एक बहुत बड़े साधनहीन वर्ग का भारी नुकसान हो रहा है। जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी निरक्षर और भुखमरी के कगार पर खड़ी हो उस देश में उपभोक्तावादी व डिस्को संस्कृति पर इतना ज्यादा जोर देकर समाज में असंतुलन पैदा किया जा रहा है। इससे युवकों के व्यक्तित्व में सतहीपन और गैर-जिम्मेदाराना रवैया बढ़ता जा रहा है। साधन तो उपलब्ध हो नहीं और फिल्म व टीवी में दिखा-दिखा कर चाहत इतनी बढ़ा दी जाए कि नौजवान होशो-हवाश खो बैंठें, तो हताशा तो बढ़ेगी ही। यही हताशा फिर युवाओं को आतंकवादी या बड़ा अपराधी बना देती है। इसलिए फिल्म बनाने वालों पर इस बात की काफी जिम्मेदारी है कि वे युवा पीढ़ी को खोखला न होने दें। बल्कि ऐसी फिल्में बनाएं जिससे युवाओं को हालात से जूझने की प्रेरणा मिले। मुल्क की बदइंतजामी व भ्रष्टाचार से निपटने की भावना पैदा हो। मुश्किल ये है कि फिल्म बनाने में बहुत पैसा लगता है जो प्रायः अवैध धन ही होता है। इस धन का सबसे बड़ा स्रोत प्रायः अपराध जगत के कुख्यात लोग होते हैं। ऐसे लोगों को न तो देश में क्रांति करवानी है और न ही समाज के नैतिक मूल्यों के पतन को रोकना है। उन्हें तो सिर्फ दौलत बढ़ानी होती है। चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न देनी पड़ी। ऐसे माहौल में किसी फिल्म निर्देशक या कलाकार से ये उम्मीद करना कि वह धारा के विरूद्ध खड़ा रह पाएगा, जरा मुश्किल बात है। इसके लिए साफ दृष्टि और मजबूत इरादे की जरूरत होती है। खरबूजे के देखकर खरबूजा रंग बदलता है। अगर अभिषेक भी उसी रास्ते पर चल पड़े तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पर यहां मुद्दा सिर्फ एक नए कलाकार की पहली फिल्म की समीक्षा करने का नहीं है बल्कि हिंदी फिल्मों से जुड़े उन सवालों को उठाने की है जो आज भारतीय समाज के सभी जागरूक और चिंतनशील लोगों को परेशान कर रहे हैं। खासकर उन्हें जिनके बच्चे इन फिल्मों को देखकर शिष्टाचार और शालीनता की मर्यादाओं को बड़ी आसानी से तोड़ते जा रहे हैं और हिंसक और आक्रामक होते जा रहे हैं। देश और समाज से जुड़े सवालों से कटते जा रहे हैं। वैसे ये कोई नई बात नहीं है। पड़ौस के ज्यादातर मुल्कों में मीडिया अब मात्र मनोरंजन का साधन रह गया है। सूचना देने और शिक्षित करने की इसकी भूमिका पीछे हट गई है। ऐसा इन देशों के हुक्मरानों ने साजिशन किया है ताकि पूरी की पूरी जवान पीढ़ी नाॅच-कूद और  मौज-मस्ती में डूबी रहे और अपने और देश के भविष्य के बारे में न कुछ सोचे। न तो आलोचना करें और न सवाल खड़े करे। अभी तक भारत में गनीमत थी कि फिल्म, टेलीविजन और प्रिंट मीडिया देश और समाज से सारोकार रखने वाले  सवालों को उठाता आया था। दुर्भाग्य से अब वहां भी बाजारू शक्तियां हावी होती जा रही हैं। अब अखबारों के ज्यादातर पन्ने कुलीनसमाज के राग-रंग का कवरेज करते हैं और बुनियादी सवालों को उठाने से कतराते हैं। यह खतरनाक प्रवृत्ति है जो अब घटने वाली नहीं।

ऐसा नहीं है कि हालात आज ही इतने बिगड़े हैं। हर पिछली पीढ़ी आने वाली पीढ़ी से यही कहती आई है कि जमाना कितना खराब आ गया है। पर फिर भी कालचक्र रूकता नहीं, अपनी गति से चलता ही रहता है। इस सबके बावजूद जो लोग मजबूती से खड़े रहते हैं वहीं कालपुरूष बनते हैं। ऐसे कालपुरूष कर क्षेत्र में हमेशा सामने आते रहते हैं। वह चाहे राजनीति का क्षेत्र हो उद्योग का या मनोरंजन का। अभिषेक जैसे नौजवान काल पुरूष बनना चाहते हैं या समय की धारा में बह कर जीवन का तथाकथित आनंद लूटना चाहते हैं। ये उनके संस्कारों, परिवेश और व्यक्तिगत आकांक्षाओं पर निर्भर करेगा। धारा के साथ बहना बहुत सरल होता है पर धारा को अपनी इच्छानुसार मोड़ देना बहुत कठिन काम है। यूं तो एक तरह से अपने जमाने में राजकपूर, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन व राजेश खन्ना जैसे फिल्मी सितारों ने समाज को अपनी शख्सियत से काफी प्रभावित किया था, जैसा आज शायद शारूर्खान कर रहे हैं। ये जरूरी नहीं कि आइंस्टाइंन का बेटा बाप की तरह मशहूर वैज्ञानिक ही बने। पर जब अभिषेक ने फिल्म जगत में प्रवेश कर ही दिया है तो जाहिरन लोग उनके कद को उनके पिता से नाप कर देखेंगे। ऐसे में अभिषेक के सामने और भी ज्यादा बड़ी चुनौती है कि वे अपनी एक अलग पहचान बना सकें। जो उनकी पीढ़ी के नौजवानों को देश और समाज के प्रति ज्यादा जागरूक बनने में मदद करे, उन्हें पलायनवादी न बनाए। क्या होगा वक्त बताएगा।

Friday, July 7, 2000

जेठमलानी जी की दरियादिली

केन्द्रीय कानून मंत्री श्री राम जेठमलानी का बयान आया है कि क्रिकेट मैंच फिक्सिंग में आरोपित क्रिकेट खिलाडि़यों को देश माफ कर दे। जाहिर है कि उनकी इस दरियादिली के लिए क्रिकेट मैंच फिक्सिंग में आरोपित रहे सभी खिलाडि़यों ने बेहद राहत महसूस की होगी। यह इत्तेफाक ही है कि ऐसे कुछ खिलाडि़यों ने कानून मंत्री के सुपुत्र श्री महेश जेठमलानी को अपना वकील बनाया था। सही भी है कि इतने बड़े कांड में फंसने के बाद बहुत बड़े वकीलों की ही जरूरत होती है। अगर बड़े वकील न मिलें तो उनके सुपुत्रों से ही काम चलाया जाता है ताकि बड़े वकील की कृपा मिल सके। ऐसे वकील लेने पर फीस भी तगड़ी ही देनी होती है। इतनी कि आम आदमी अंदाजा भी नहीं लगा सकता। कानून मंत्री तो वकालत करते नहीं। इसलिए श्री राम जेठमलानी का उनके बेटे के मुवक्किल से कोई ताल्लुक होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्रिकेट खिलाडि़यों को माफी दिए जाने की बात तो उन्होंने अपने हृदय में उपजी करूणा के कारण कही है। पर उनके इस अप्रत्याशित वक्तव्य से देश की जनता जरूर हतप्रभ है। उसके मन में कई सवाल उठ रहे हैं।

जांच पूरी होने से पहले ही माफी की बात करना कहां तक उचित है। अगर यही बात है तो फिर देश की जेलों में लाखों लोग वर्षों से क्यों सड़ रहे हैं ? इनमें ऐसे नौजवान और युवतियां भी हैं जिन्हें छोटे-छोटे अपराधों के लिए वर्षों से गिरफ्तार करके रखा गया है। इन सब छोटे अपराधियों को भी ‘राम-राज्य’ स्थापित करने वाली भाजपा सरकार के चर्चित कानून मंत्री के दरबार में याचिका देनी चाहिए कि उन सबको भी आम माफी दे दी जाए। इससे कई फायदे होंगे। एक तो देश की अदालतों में वर्षों से लटके हुए करोड़ों मुकदमें एक झटके में समाप्त हो जाएंगे। दूसरा, इन मुकदमों में उलझे करोड़ गरीब किसान मजदूरों का मेहनत का पैसा वकीलों और कचहरियों में बर्बाद होने से बचेगा। तीसरा, भाजपा सरकार के वोट बैंक में आशातीत बढ़ोत्तरी होगी क्योंकि इस तरह रिहा हुए सभी लोग और उनके परिवारजन भाजपा सरकार की दरियादिली के मुरीद बन जाएंगे। खुद तो वे भाजपा को वोट देंगे ही अपनी ‘विशेष योग्यताओं’ के कारण लाठी-गोली के जोर पर दूसरों से भी वोट डलवा देंगे। इससे देश को लंबे समय तक एक ही सरकार के बने रहने का फायदा मिलेगा।

जब जेठमलानी जी इतनी दरियादिली पर उतर ही आए हैं तो उन्हें एक काम और करना चाहिए। 1986 से वे लगातार बोफोर्स कांड के पीछे पड़े हैं। अपनी काफी ऊर्जा और देश के काफी पैसा इस कांड की जांच के नाम पर देश और विदेशों में खर्च करवा चुके हैं। इस कांड की नौका पर बैठकर वो और उनके साथी राजनेता कई चुनावों की वैतरणी पार कर चुके हैं। फिर भी इस कांड में आज तक एक चूहा भी नहीं पकड़ा गया। क्यों न जेठमलानी जी बोफोर्स कांड के आरोपियों की भी आम माफी की घोषणा कर देते हैं। क्वात्रोची जैसे तमाम लोगों को नाहक अपना प्रिय देश भारत छोड़कर विदेशों में रहना पड़ रहा है। अगर उन पर भी जेठमलानी जी की निगाहेकरम हो जाए तो उनकी आने वाली सात पीढि़यां जेठमलानी जी को इस दरियादिली के लिए दिल से दुआ देंगी। इतनी ही नहीं उनकी इस दरियादिली से इंका नेता श्रीमती सोनिया गांधी खासतौर पर बड़ी राहत महसूस करेंगी। बेचारी को नाहक हर चुनाव के पहले ‘बोफोर्स-बोफोर्स’ की नाम-धुन सुननी पड़ती है। मन में तो वे जानती हैं कि यह सब चुनावी हथकंडा है जिसे वीपी सिंह से लेकर वाजपेयी जी तक प्रधानमंत्री पद हथियाने के लिए इस्तेमाल करते आए हैं। पर फिर भी अगर हर चुनाव के पहले इंकाईयों को ‘बोफोर्स-बोफोर्स’ सुनना पड़े तो उनके मन में चोट तो पहुंचती ही है। बोफोर्स मामले में अभयदान देकर जेठमलानी जी रातो-रात इंकाईयों के भी हृदय सम्राट बन जाएंगे। अबसे पहले चार बार भिन्न-भिन्न दलों के कंधे पर पैर रख कर राज्यसभा की सदस्यता का जुगाड़ करने वाले श्री जेठमलानी को अगली बार इंका ही राज्यसभा में भेज देगी।

वैसे देश के कानून की रक्षा के लिए जिम्मेदार बनाए गए केन्द्रीय कानून मंत्री जेठमलानी जी के लिए ऐसी दरियादिली दिखाना कोई नई बात नहीं है। आजकल उनकी दरियादिली अपने मंत्रालय की सीमाओं के बाहर जा पहुंची है। जिन मंत्रालयों में महत्वपूर्ण मामलों में फैसले लिए जा चुके हैं और उनमें बड़े-बड़े लोग फंसे हैं उनकी भी फाइलें जेठमलानी जी कानून मंत्रालय में मंगवा रहे हैं। उन पर नई ‘कानूनी’ राय दर्ज करवा कर उन फैसलों को बदलवा रहे हैं। दरअसल जेठमलानी जी का तो इतिहास ही ऐसी दरियादिली का रहा है। वे किसी भी बड़े घोटाले पर पहले खूब शोर मचाते हैं। जब उनके शोर से उनका लक्षित व्यक्ति पूरी तरह जख्मी हो जाता है और वह उनके चरणों में गिर कर ‘त्राहि माम्-त्राहि माम्‘ कहता है, फिर पता नहीं दोनो के बीच क्या होता है कि अचानक श्री राम जेठमलानी जी के हृदय में शरणागत के प्रति करूणा उपज जाती है। ऐसी अनेक घटनाए देशवासियों को याद है।

हर्षद मेहता कांड में क्या हुआ था ? श्री राम जैठमलानी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव पर आरोप लगाया कि उन्होंने हर्षद मेहता से नोटो का भरा एक सूटकेस रिश्वत में लिया। जेठमलानी जी ने खूब बवाल मचाया। मीडिया में छाए रहे। सरकार का काम-काज ढीला पड़ गया। पर फिर अचानक पता नहीं क्या हुआ कि उनके मन में नरसिंह राव जी के करूणा उपजी और उनके मुवक्किल ने अपना बयान बदल दिया। उसे यही याद नहीं रहा कि वह प्रधानमंत्री निवास जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर सूटकेस लेकर कितने बजे गया। 8 बजे या 11 बजे ? जब समय ही याद नहीं रहा तो बाकी आरोपों का भी क्या भरोसा किया जाता ? मामला अपने आप ठंडा पड़ गया।

1996 में भाजपा की अल्पमत की 13 दिन चली सरकार में बनाए गए कानून मंत्री श्री राम जेठमलानी ने अपना नया पदभार ग्रहण करते ही अपनी दरियादिली का नमूना पेश किया। उन्होंने घोषणा की कि हवाला कांड में आरोपित भाजपा नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी निर्दोष हैं। यह भी कि कानून मंत्री की हैसियत से श्री जेठमलानी इस आशय का शपथ पत्र दाखिल करेंगे। जब कानून मंत्री न्यायालय में चल रहे मुकदमें के बारे में ऐसी घोषणा करेंगे तो जांच एजेंसियों को क्या संकेत जाएगा, जांच बंद कर दो और आरोपियों के रिहा होने का रास्ता साफ कर दो ? ये जेठमलानी जी की दरियादिली ही तो है कि वे कानून मंत्री होकर भी गैर-कानूनी घोषणा करने से भी नहीं हिचकते।

2 सितंबर 1993 को तत्कालीन सांसद श्री राम जेठमलानी ने हवाला कांड उजागर करने वाली कालचक्र वीडियों कैसेट के प्रैस-प्रिव्यू के दौरान हवाला आरोपियों के खिलाफ खूब जहर उगला। उन्हें सख्त सजा दिलवाने की घोषणा की। इसके बाद उन्होंने हवाला कांड की ईमानदार जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका तैयार करवाने में पूरी मदद की। पर फिर अचानक उनके मन में करूणा उपजी और उन्होंने कश्मीर के आतंकवादियों से जुड़े हवाला कांड के आरोपियों को बचाने का काम शुरू कर दिया। उनकी परोपकारिता इस हद तक बढ़ गई कि उन्होंने अपने मुवक्किल के विरोधी पक्ष की अदालत में रक्षा करने में भी कोई संकोच नहीं किया। इस बात की भी परवाह नहीं की कि उनका यह कदम वकालत के पेशे की सभी नैतिक सीमाओं को पार करने वाला था और इस जुर्म में वकालत करने का उनका अधिकार तक छिन जाने का खतरा था। दरअसल जेठमलानी जी का मानना है कि जब दरियादिली ही दिखानी हो तो कंजूसी क्यों की जाए ? चाहे अपना मान चला जाए या प्रैक्टिस करने का लाइसेंस ही क्यों न छिन जाए।

ये दूसरी बात है कि जेठमलानी जी प्रायः ऐसी दरियादिली बडे़ अपराधियों, ताकतवर, धनी और मशहूर लोगों के लिए ही दिखाते हैं। गरीब मुवक्किल तो उन जैसे महंगे वकील के दरवाजे पर दस्तक देने का भी हिम्मत नहीे कर सकता। पर कानून मंत्री बन कर तो उन्हें अब वकालत में अपना वक्त भी खराब नहीं करना है। बस कानून मंत्रालय के अधिकारियों से एक ऐसा विधेयक तैयार करवाना है जिसमें देश के हर अपराधी को अभयदान की घोषणा की जाए। आखिर को तो हमारा देश दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। फिर इसमें कानून की निगाह में सब बराबर क्यों न हों? जब सैकड़ों करोड रुपए के घोटाले करके, देशवासियों से झूठ बोल कर तमाम लोग बड़े-बड़े पदों पर बैठे रहते हैं और उनका कानून कुछ नहीं बिगाड़ता तो फिर देश के करोड़ों मदतादाओं के मन में कानून का डर क्यों रहे ? उन्हें भी आजाद भारत में उसी आजादी से अपराध करने की छूट होनी चाहिए जिस आजादी से यह छूट देश के हुक्मरानों और कुलीन वर्ग को मिली हुई है। आम माफी का ऐसा विधेयक लाकर जेठमलानी जी अपने दायित्व का निर्वाह ही करेंगे। क्योंकि संविधान के अनुसार हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त है और कानून मंत्री के नाते उनका फर्ज है कि वे आम जनता के हक की रक्षा करें। वैसे भी पुलिस आम अपराधियों को सजा दिलवाना नहीं चाहती। उन्हें सजा का डर दिखा कर उनसे रकम ऐंठना चाहती है। जैसा आजकल मैंच फिक्सिंग के मामले में हो रहा है। एक तरफ तो कानून मंत्री मैंच फिक्सिंग के प्रमुख आरोपियों को माफ करने की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ देश के लगभग दो सौ व्यापारियों को मैंच फिक्सिंग में गिरफ्तार किए जाने का डर दिखा कर उनसे पैसा वसूला जा रहा है।

वैसे भी अगर यही रवैया चलता रहा कि देश के ताकतवर अपराधी छूटते रहे और मध्यम वर्गीय पेशेवर लोग, व्यापारी व गरीब-किसान-मजदूर सरकारी जांच एजेंसियों की धौस, धमकियों और लूट का शिकार होते रहे तो हालात काबू के बाहर हो जाएंगे। फिर देश के हर राज्य में जनता का आतंकवाद पैदा होगा। अगर देश के सभी छोटे अपराधी संगठित हो जाएं और ‘अखिल भारतीय छोटे अपराधी महासंघ’ बना कर ये मांग करें कि या तो बड़े घोटालों में लिप्त हुक्मरानों के खिलाफ ईमानदारी से जांच करवा कर सजा दी जाए या फिर छोटे अपराधियों के विरूद्ध दर्ज सभी आपराधिक मामलों को बिना शर्त समाप्त कर दिया जाए, तो सरकार और उसके कानून मंत्री किस मुंह से मना करेंगे?

Friday, June 23, 2000

इस्का¡न के ‘धर्म गुरूओं’ पर 1600 करोड़ रुपए के हर्जाने का दावा क्यों ?


पिछले हफ्ते दुनिया भर के अखबारों में खबर छपी कि 44 किशोरों ने अमरीका के शहर डल्ला¡स में इस्का¡न (अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ) के गुरूओं के विरूद्ध 1600 करोड़ रुपए (400 मिलियन डा¡लर) के हर्जाने का दावा दायर किया है। दावा दायर करने वाले किशोर इस्का¡न द्वारा चलाए जा रहे गुरूकुलों में पढ़ कर बड़े हुए हैं। इन बच्चों ने शपथ पत्र दाखिल करके आरोप लगाए हैं कि जब वे इस्का¡न के मायापुर (पश्चिमी बंगाल), वृंदावन (उत्तर प्रदेश) व टैक्सास (अमरीका) आदि स्थानों पर स्थित गुरूकुलों में पढ़ते थे तो उनके शिक्षकों और इस्काॅन के गुरूओं ने उनका यौन शोषण किया, उन्हें प्रताडि़त किया, उन्हें अमानवीय अवस्थाओं में रहने पर मजबूर किया व आतंकित करके रखा। इस्का¡न गुरूकुल के इन पूर्व विद्यार्थियों का यह भी आरोप है कि इस्का¡न की सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई जीबीसी (गवर्निंग बा¡डी कमीशन) के सदस्यों ने उन वर्षों में इन छात्रों व उनके अभिभावकों की शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया। इतना ही नहीं छात्रों को प्रताडि़त करने वाले और उनका यौन शोषण करने वाले गुरूओं को संरक्षण दिया। इस्का¡न के धर्म गुरूओं के ऐसे गैर-जिम्मेदाराना और अनैतिक आचरण से दुखी होकर मजबूरी में इन बच्चों को यह कानूनी कदम उठाना पड़ा। जबसे इस मुकदमे की खबर पूरी दुनिया के अखबारों में छपी है तब से इस्का¡न से जुड़े लाखों कृष्ण भक्त परिवारों के मन खिन्न हैं। जिनमें एक तरफ तो बंगाल और उड़ीसा के निर्धन कृषक परिवारों से इस्का¡न में आने वाले हजारों युवा भक्त हैं तो दूसरी तरफ डाक्टरी, इंजीनियरी, चार्टड एकाउंटेंसी जैसी डिग्रियां प्राप्त हजारों मेधावी लोग भी हैं। भारत और विदेशों में रहने वाले लाखों साधारण परिवार हैं तो भारत के सबसे धनी परिवारों में से एक के मुखिया श्रीचंद्र हिन्दूजा व अमरीका की फोर्ड कार कंपनी के निर्माता के पौत्र एलफ्रैड फोर्ड तक इस्का¡न के सदस्यों में शामिल हैं। क्योंकि अन्य भक्तों की तरह ही श्रीचंद्र हिन्दूजा दुनियां के जिस शहर में भी हों रोजाना सुबह इस्का¡न के मंदिर में श्रृंगार आरती में बड़ी श्रद्धा से हिस्सा लेते हैं। एलफ्रैड फोर्ड ने तो दो दशक पहले ही इस्का¡न के संस्थापक आचार्य स्वामी प्रभुपाद की शरण ले ली थी। उनका दीक्षा नाम अम्बरीश दास है व उन्होंने एक भारतीय मूल की कृष्ण भक्तिन से विवाह किया है। यह फोर्ड परिवार इस्का¡न की पूजा पद्धति व नियमों का कड़ाई से पालन करता है। अमरीका के सबसे धनी परिवारों में से एक परिवार के प्रमुख सदस्य का दो दशकों तक निष्ठा से कृष्ण भक्त बने रहना असाधारण बात नहीं है। इसी तरह भारत के ही नहीं पूरी दुनिया के लाखों परिवार इस्का¡न से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। इन भक्तों ने प्रभुपाद की शिक्षाआs को समझने के बाद ही इस्का¡न को अपनाया है।
दरअसल इस्का¡न के मंदिरों की भव्यता, वहां स्थापित श्री श्री राधाकृष्ण भगवान के अत्यंत आकर्षक विग्रहों का नित्य होने वाला भव्य श्रृंगार इन मंदिरों में निरंतर होने वाला हरिनाम संकीर्तन व श्रीमद् भागवत् प्रवचन, सुस्वादु प्रसादम्, मन मोहक पुस्तकें, आडियो कैसेट व कृष्ण भक्ति रस में डूब कर अनके भारतीय उत्सवों का मनाया जाना, हर आगंतुक का मन मोह लेता है। जैसी सफाई और व्यवस्था  इस्का¡न के विश्व भर में फैले लगभग 500 मंदिरों और केंद्रों में रोज देखनेे को मिलती है वैसी व्यवस्था आमतौर पर हिंदू मंदिरों में दिखाई नहीं देती। इस सबसे भी ज्यादा आकर्षण इस बात का है कि  इस्का¡न के संस्थापक आचार्य स्वामी प्रभुपाद ने भगवत् गीता, श्रीमद् भागवतम् व श्री चैतन्य चरितामृत सहित अनेक अन्य वैदिक ग्रंथों का जो अनुवाद व जैसी टीकाएं की हS, वे आध्यात्मिक ज्ञान के पिपासुओं और भक्त-हृदयों को तृप्त कर देती है। यही कारण है कि प्रभुपाद जी न सिर्फ यूरोप और अमरीका के ईसाईयों को बल्कि साम्यवादी देशों के लोगों को, कुछ मुसलमानों को और यहां तक कि रागरंग में डूबने वाले अफ्रीका के लोगों तक को भी कृष्ण भक्त बनाने में सफल हो सके। इसलिए जब  इस्का¡न के विरूद्ध कोई समाचार छपता है तो यह स्वभाविक ही है कि  इस्का¡न से जुड़े देश-विदेश में रहने वाले भारतीय व विदेशी, सभी भक्तों को बहुत पीड़ा होती है। एक तो वैसे ही भौतिक संसार दुख और व्याधियों का घर है। जिसमें हर कदम पर संकट मार्ग रोके खड़े रहते हैं। ऐसे में अगर किसी भाग्यशाली जीव को आध्यात्मिक मार्ग मिल जाए तो  उसके आनंद का ठिकाना नहीं रहता। ये एक ऐसी अनुभूति है जिसे केवल अनुभव से ही जाना जा सकता है। निरीश्वरवादियों को यह कोरी बकवास लगेगा। पर उन्हें भी सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि जिन देशों में पिछले आठ दशक से साम्यवाद का बोलबाला रहा वहां भी लोगों की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को कुचला नहीं जा सका। आज इन देशों में सभी आध्यात्मिक आंदोलन बहुत तेजी से फैलते जा रहे हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि जिस आंदोलन पर धर्म या आध्यात्म का ठप्पा लग गया उसमंे कोई दोष होगा ही नहीं। बल्कि देखने में तो यह आ रहा है कि धर्म और आध्यात्म के नाम पर बहुत सारे धर्म गुरू भोगमय और अनैतिक आचरण कर रहे हैं। वैसा दुराचरण करने से पहले सामान्य लोग दस बार सोचेंगे। फिर वो चाहे ईसाई मिशनरियों के बीच फैले अवैध संबंधों की बात हो या किसी और धर्म के मठाधीशों के बीच पनप रहा लालच, भ्रष्टाचार, पद के लिए मारधाड़, ईष्या, द्वेष या हिंसा का वातावरण हो। कोई धार्मिंक आंदोलन इन बुराइयों से अछूता नहीं है। इसलिए यह जरूरी है कि जो लोग जिस धर्म या सम्प्रदाय से जुड़ें, उसकी पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए हमेशा तत्पर रहें। उससे  बच कर भागें नहीं। यह न सोचें कि हम तो ध्यान करने या भजन करने आए हैं। हमारी बला से धर्म गुरू, सन्यासी या संस्थाओं के प्रबंधक चाहे जो करें । वरना फिर अचानक जब धर्म गुरूओं के आचरण के बारे में अप्रिय समाचार मिलता है तो हमारा दिल टूट जाता है। हमारी आस्थाएं हिल जाती है। हमारी आध्यात्मिक प्रगति रूक जाती है। कई बार तो हम धर्म विमुख हो जाते हैं। इसलिए हमें यह याद रखना होता है कि कबूतर के आंख मीच लेने से बिल्ली के रूप में आई मौत भागा नहीं करती।
 इस्का¡न के धर्म गुरूओं द्वारा बालकों का गुरूकुलों में मानसिक और शारीरिक शोषण किया जाना कोई
साधारण घटना नहीं है। जरा सोचिए कि उन अभिभावकों के मन पर क्या गुजरी होगी जिन्होंने दुनियां के कोनों-कोनों से अपने लाड़ले सपूतों को इसलिए  इस्का¡न के गुरूकुलों में पढ़ने भेजा था जिससे कि वे भारत के सनातन वैदिक ज्ञान व संस्कृति की शिक्षा पा सकें। पर बदले में उनके अबोध बच्चों को मिला क्या, प्रताड़ना और यौन शोषण ? ऐसे दुर्भाग्यशाली अनुभव  इस्का¡न गुरूकुलों में पढ़े लगभग एक हजार बच्चों को हुए। जिससे आज इन किशोरों के मन में  इस्का¡न के धर्म गुरूओं के प्रति घृणा भरी है। क्योंकि इन किशोरों ने  इस्का¡न के अनेक धर्म गुरूओं के केसरिया चोलों के भीतर पनप रहीं वासनाओं को देखा और भोगा है।
जिन शिकायतों को लेकर इन किशोरों ने मुकदमा दायर किया है वे पिछले बीस वर्षों में घटी घटनाओं पर
आधारित है। इसलिए  इस्का¡न के धर्म गुरूओं के लिए यह और भी शर्म की बात है कि यह सब इतने लंबे समय तक उनकी नाक के नीचे होता रहा और वे ऐसी गंभीर शिकायतों को नजरंदाज करते रहे। इतना ही नहीं ऐसे निकृष्ट कार्यों में लिप्त अपने साथी धर्म गुरूओं को संरक्षण देते रहे। अब जब पानी सर के ऊपर से गुजर गया तो घबड़ा रहे हैं। आने वाले दिनों में जब इस मुकदमे की हर तारीख पर इन बच्चों के बयानों की खबरें दुनिया भर के अखबारों में छपेंगी तो  इस्का¡न के ये धर्म गुरू किस-किस का मुंह रोकेंगे ? इनकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार का नतीजा  इस्का¡न के दुनिया भर में फैले लाखों भक्तों को नाहक भुगतना पड़ेगा। हर ऐसी घटना के बाद इस्काॅन के मंदिरों में जाने वाले लोगों को  ये धर्म गुरू आज तक यही कह कर बहकाते आए हैं कि ऐसी खबर छापने वाले उनके प्रचार की क्षमता और व्यापकता से ईष्या करते हैं। ये लोग प्रभुपाद जी के पुण्य आंदोलन को बदनाम करना चाहते हैं। ये लोग विधर्मियों द्वारा  इस्का¡न को बदनाम करने के लिए छोड़े गए हैं। ये लोग नर्क को जाएंगे। जो इनकी बात सुनेगा वह वैष्णव अपराध व गुरू अपराध का दोषी होगा। मंदिर में रहने वाले पूर्णकालिक भक्तों को यह कह कर डराया जाता रहा कि ऐसे लोगों की बात सुनने वालों को  इस्का¡न से निकाल दिया जाएगा और निकाला भी गया। प्रभुपाद ने  इस्का¡न को एक ऐसा विशाल घर बनाया था जिसमें सारा विश्व सुख रह सके। पर आज इन छद्म-धर्म गुरूओं के अहंकारी, लोभी और भोगी आचरण के कारण प्रभुपाद के हजारों समर्पित शिष्य इस्का¡न छोड़कर अलग-थलग पड़े हैं। अकेले वृंदावन में ही तमाम विदेशी महिलाएं ऐसी हैं जो  इस्का¡न जीबीसी के रवैए से नाजारा होकर वृंदावन में अलग रह रही हैं। फिर भी जीबीसी को समझ नहीं आ रहा। अभी हाल ही में उसने भारत के कुछ वरिष्ठ भक्तों को  इस्का¡न से निकालने का असफल प्रयास किया। जिनमें मधु पंडित दास शामिल हैं। जिन्होंने बंग्लौर में  इस्का¡न के सर्वश्रेष्ठ मंदिर की स्थापना व हजारों लोगों को भक्त बनाने का कीर्तिमान बनाया है। इन वरिष्ठ भक्तों ने अब जीबीसी को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी है। एक के बाद एक मुकदमों में हारने के बाद भी जीबीसी को अपनी गलती समझ में नहीं आ रही। जीबीसी के गैर-जिम्मेदाराना कार्यों के कारण प्रभुपाद का यह गंभीर आंदोलन दुनियां के मीडिया में निंदा और उपहास का पात्र बन रहो है। पर अब तो किशोरों ने बीड़ा उठाया है और मामला अदालत में है। आरोप लगाने वाले कोई बाहर के लोग नहीं हैं। भक्त परिवारों के ही भुक्त-भोगी बच्चे हैं, जिनके हलफिया बयान को कानूनन पूर्ण वैधता प्राप्त है। यह मुकदमा कोई मजाक नहीं। कुछ वर्ष पहले अमरीका में ही रोबिन जार्ज नाम की एक किशोरी ने  इस्का¡न के धर्म गुरूओं के विरूद्ध मानसिक प्रताड़ना का मुकदमा जीत कर  इस्का¡न से करोड़ों रूपए का हर्जाना वसूल किया था। यह मुकदमा तो उससे सौ गुना ज्यादा नुकसान कर सकता है। इसका मुआवजा देने में तो  इस्का¡न के अमरीका में स्थित पचासों मंदिरों की संपत्ति बेचनी पड़ सकती है। इस्काॅन के प्रचार कार्य पर जो विपरीत प्रभाव पड़ेगा वह अलग। इसलिए इस घटना की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
ऐसी स्थिति आई क्यों ? दरअसल  इस्का¡न के संस्थापक आचार्य श्री प्रभुपाद जी ने यह साफ निर्देश दिए थे कि उनकी शिक्षाओं को बिना फेरबदल के यथावत आने वाली पीढि़यों को सौपा जाएगा तो यह आंदोलन दस हजार वर्ष तक चलेगा। पर उनके अति महत्वाकांक्षी अमरीकी शिष्यों ने खुद की लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा के लोभा में प्रभुपाद के शरीर त्यागते ही 1977 में खुद को गुरू घोषित कर दिया। यहां तक कि उन्होंने 9 जुलाई 1977 को प्रभुपाद द्वारा सभी मंदिरों के लिए जारी, भविष्य में इस्का¡न में दीक्षा दिए जाने संबंधी, लिखित आदेश की भी अवहेलना की। साजिशन इस स्पष्ट आदेश को इस्का¡न के अब तक हुए हजारों प्रकाशनों में नहीं छपने दिया। ताकि लोगों तक सच न पहुंच सके। अपनी कारस्तानियों को छिपाने के लिए प्रभुपाद द्वारा रचित ग्रंथों में बदलाव किए। आध्यात्मिक योग्यता या गुरू द्वारा प्रदत्त आदेश के बिना ही एक हास्यादपद चुनाव प्रक्रिया द्वारा गुरू बनाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते गुरू जैसे महाभागवत् पद को पाने के लालचियों की इस्का¡न में कतार लग गई। परिणाम स्वरूप जीबीसी को धमकी और दबाव के चलते भी बहुत से लोगों को गुरू बनाना पड़ा। अपने आचार्य के चरणों में किए गए इस गुरू अपराध के कारण ही इस तरह बने स्वघोषित लगभग सौ गुरूओं में से आधों का पिछले बीस वर्षों में पतन हो गया। कोई अपनी शिष्या ले भागा तो कोई गुरूकुल के बालकों से अप्राकृतिक यौनाचार में लिप्त पाया गया। कोई इस्का¡न का धन ही ले भागा तो कोई दूसरे अवैध धंधों में फंस गया। यहां तक कि इस्का¡न की सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई जीबीसी के अध्यक्ष व हजारों भक्तों को शिष्य  बनाने वाला गुरू तो जर्मनी की एक मालिश करने वाली महिला के साथ ही भाग गया। अगर यह स्वघोषित गुरू आध्यात्मिक योग्यता और गुरू के आदेश के अनुसार चले होते तो शायद इनका पतन थोक में नहीं हुआ होता। आज जीबीसी में 95 फीसदी सदस्य ऐसे ही स्वघोषित गुरू हैं। जो अपने गुरू क्लब के सदस्यों के विरूद्ध कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते। उल्टा अनैतिक कृत्यों में लिप्त अपने साथी गुरूओं को अंत तक बचाने में लगे रहते हैं। जीबीसी कहती है कि उसने प्रभुपाद के आदेश अनुसार ही गुरू बनाए हैं। फिर क्या वजह है कि उसे पिछले बीस वर्ष में कई बार गुरू बनाने की प्रक्रिया बदलनी पड़ी ? जाहिर है कि वे अपने आचार्य प्रभुपाद के आदेश से हट कर चल रहे हैं। ठीक वैसे ही जैसे प्रभुपाद ने लिखित आदेश दिए थे कि गुरूकुल के बच्चों को कभी प्रताडि़त न किया जाए। उन पर कभी हाथ न उठाया जाए। उन्होंने तो यह तक कहा था कि जो शिक्षक बच्चों पर हाथ उठाता है वह शिक्षक बनने के योग्य नहीं। पर प्रभुपाद के अन्य आदेशों की तरह ही जीबीसी ने इस आदेश की भी अवहेलना की। परिणाम स्वरूप आज इस्का¡न को 1600 करोड़ रुपए के मुआवजे के दावे का मुकदमा अमरीका में झेलना पड़ रहा है। इधर कलकत्ता हाई कोर्ट में जीबीसी जिस महत्वपूर्ण मुकदमे में फंसी है, वहां उसे सिद्ध करना है कि उसने गुरू बनाने के मामले में प्रभुपाद के 9 जुलाई 1977 के आदेश की अवहेलना नहीं की है। यह कितने दुख की बात है कि मुट्ठी भर महत्वाकांक्षी स्वघोषित धर्म गुरूओंके कारण इतना सुंदर आंदोलन अपनी शक्ति और साधनों को बेकार के मुकदमों में बर्बाद कर रहा है । इससे पहले कि रोबिन जार्ज केस की तरह इस्का¡न एक बार फिर भारी हर्जे-खर्चे की मार सहे, इस्का¡न के शुभचिंतकों और भक्तों को सामूहिक रूप से जीबीसी पर दबाव डालना चाहिए कि वह गुरू परंपरा के बारे में उठाए गए सभी सवालों का, प्रभुपाद की शिक्षाओं के आधार पर, संतुष्टिपूर्ण उत्तर दे और अगर जीबीसी ऐसा नहीं कर पाती है तो इस्का¡न को बर्बाद करने से पहले अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग कर इस शक्तिशाली आंदोलन को आगे बढ़ाने में सहायक बने, बाधक नहीं।

Friday, June 16, 2000

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पर कतरने की तैयारी

श्री शरद पवांर के नेतृत्व में संसदीय समिति की बैठक इस हफ्ते के शqरू में नई दिल्ली में हुई। जिसमें केंद्रीय सतर्कता आयुक्त संबंधी विधेयक पर चर्चा हुई। राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे मन से ये कतई नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार के मामले में राजनेता किसी जांच के दायरे में आएं। पर लोक-लज्जा के लिए उन्हें यह दिखावा करना पड़ता है। इसलिए नए-नए नामों से भ्रष्टाचार से लड़ने की बात की जाती है। फिर वो चाहे लोक आयुक्त बना कर हो या केंद्रीय सतर्कता आयुक्त। हर चुनाव से पहले हर दल और प्रधानमंत्री पद का हर दावेदार जनता को यह आश्वासन देता है कि वह भ्रष्टाचार से लड़ेगा। क्योंकि राजनेता जानते हैं कि इस देश के करोड़ों लोग प्रशासनिक और राजनैतिक भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त हैं इसलिए भ्रष्टाचार के नाम पर चुनाव में जनता को बहकाना सबसे ज्यादा आसान होता है। यही कारण है कि जैसे ही चुनावों की घोषणा होती है सभी दलों के राजनेता, चाहे वो क्षेत्रीय दल के हों या राष्ट्रीय दल के, अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के घोटाले उछालने में जुट जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद फिर सब एक हो जाते हैं और एक-दूसरे को बचाने में लगे रहते हैं। इसलिए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त से संबंधित विधेयक पर चर्चा करते समय सांसदों को यही दिक्कत आ रही है कि वे कैसे ऐसा प्रारूप बनाएं जिससे जनता में तो यह संदेश जाए कि सरकार भ्रष्टाचार से निपटना चाहती है, पर असलियत में कुछ न हो। सब यथावत चलता रहे। प्रस्तावित विधेयक को इस तरह बनाया जाए ताकि बड़े ओहदों पर बैठने वाले ताकतवर भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं को नई व्यवस्था में से भी बच कर निकलने के रास्ते खुले रहें।
यह कैसा विरोधाभास है कि एक तरफ तो भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है और दूसरी तरफ कानून की नजर में यहां सब बराबर नहीं है ? इसीलिए जब 5 फरवरी को स्टार टीवी न्यूज चैनल पर बिग-फाइट-शो में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त श्री विट्ठल ने ये घोषणा की कि वे उन कांडों की जांच दुबारा करवाएंगे जिनमें दर्जनों बडे राजनेता शामिल हैं और जिन कांडों को बड़ी निर्लज्जता से लीपापोती करके दबा दिया गया है, तो सारी की सारी राजनैतिक जमात उन पर टूट पड़ी। संसद से लेकर उसके बाहर तक डट कर शोर मचाया गया कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को यह अधिकार ही नहीं है कि वह राजनेताओं के विरूद्ध जांच करवाए। यह कैसा विरोधाभास है ? जिस केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के अधीन सीबीआई काम कर रहीे है उस सीबीआई को तो यह हक है कि वह राजनेताओं के खिलाफ जांच कर सके। पर उसी सीबीआई के काम पर निगरानी रखने के लिए तैनात केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को यह हक नहीं है कि वे सीबीआई से ये जांच करवा सके। मजे कीे बात यह है कि केंद्रीय कानून मंत्री श्री राम जेठमलानी सरीखे जिन लोगों ने 5 फरवरी 2000 के बाद श्री एन विट्ठल पर हमला बोला, वे वही लोग हैं जो 1994 से विभिन्न कांडों में फंसे राजनेताओं की जान बचाने के लिए ‘निष्पक्ष और स्वायत्त’ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त जैसे पद के सृजन की बात कर रहे थे। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट की ‘न्याययिक सक्रियता’ को देखकर इन लोगों की चिंता थी कि कहीं इनके राजनैतिक आका सजा न पा जाएं। इसलिए भविष्य में बेहतर व्यवस्था बनाने के नाम पर इन्होंने अदालत में लंबित मामलs को वहीं लपेटने की साजिश रची। बाद में जब उसी व्यवस्था से पैदा हुआ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त भस्मासुर बन कर उनके पीछे दौड़ा तो फिर हडकंप मचा और एक और नई व्यवस्था बनाने की बात की गई। अगर मौजूदा सरकार या विपक्ष देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के बारे में वाकई ईमानदार है तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश में तोड़-मरोड़ करने की क्या जरूरत है ? उस पर इतना लंबा विचार करने की क्या जरूरत है कि मौजूदा सरकार दो साल से ज्यादा सत्ता में रहने के बाद भी इस विधेयक का प्रारूप तक तय नहीं करवा पाई ?

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1997 के एक आदेश के तहत ऐसी व्यवस्था करने को कहा था जिसमें सीबीआई, आयकर और फेरा विभाग जैसी जांच एजेंसियां निर्भयता से बिना किसी राजनैतिक दबाव के काम कर सकें। न्यायालय के आदेश के अनुसार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और विपक्ष के नेता की एक साझी समिति को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का चयन करना था। फिर केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की सलाह पर शीर्ष जांच एजेंसियों के सर्वोच्च पदाधिकारियों का चयन होना था। इन जांच एजेंसियों को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के निर्देशन में काम करना था। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सोचा कि इस तरह इन जांच एजेंसियों की स्वायतत्ता निर्धारित हो जाएगी। पर जैसा संदेह था वही हुआ। तब तो जांच इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि जांच एजेंसियां प्रधानमंत्री के अधीन थीं और आज जांच इसलिए नहीं हो पा रही है कि जांच एजेंसियों को यही पता नहीं कि वे किसके आधीन हैं ? केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के या प्रधानमंत्री के ? चालू व्यवस्था के तहत तो वे प्रधानमंत्री के आधीन है पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार उन्हें केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के अधीन काम करना है। यहीं पेंच फंसा है। अगर सरकार सर्वोच्च न्यायालय के अनुरूप विधेयक पास करवा लेती है तो केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का पद इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि एक ही व्यक्ति सारे देश को नचा देगा। अगर कोई सही व्यक्ति इस पद पर आ गया तो देश को भला करेगा और गलत आया तो बंटाधार कर देगा। इसलिए भी संसदीय समिति इस विधेयक को लेकर उधेड़-बुन में हैं।

यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के दिए जाने के बाद से संसद के कई सत्र गुजर गए पर यह विधेयक अभी तक पारित नहीं किया गया। यूं इसी आदेश के तहत केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर श्री एन विट्ठल को विराजमान कर दिया गया। उन्हें इस पद पर काम करते हुए 21 महीने हो गए और उनका कार्यकाल मात्र 27 महीने का शेष बचा है। इस पद पर आते ही श्री विट्ठल ने तमाम घोषणाएं की थी कि वे देश से भ्रष्टाचार दूर करने में ठोस कामयाबी हासिल करेंगे। पर आज 21 महीने बाद श्री विट्ठल के तेवर बदल गए हैं। उन्हें असलियत का एहसास हो गया है। उन्हें साफ दीख रहा है कि छोटी-मोटी मछलियों को वे भले ही पकड़ लें पर भ्रष्टाचार की शार्क और व्हेल मछलियों को पकड़ना उनके बूते की बात नहीं। इस दिशा में उन्होंने जो भी प्रयास किया उन पर तुरंत हमला हुआ। क्योंकि सत्ता प्रतिष्ठानों में उच्च पदों पर विराजमान नौकरशाह और राजनेता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक मत हैं। जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री श्री चन्द्रशेखर कहते हैं कि भ्रष्टाचार तो कोई मुद्दा ही नहीं है। राजनेता भ्रष्टाचार को केवल एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं। फिर वो चाहे लालू यादव का मामला हो या जयललिता का। भ्रष्टाचार के सवाल पर नेता हंगामा तो खूब मचाते हैं पर अपनी बिरादरी के किसी भी आदमी को सजा नहीं दिलवाना चाहते। क्योंकि वे जानते हैं कि राजनीति में आज किसी का भी दामन साफ नहीं है। जिस दिन कोई राजनैतिक कार्यकता चुनाव लड़ने का फैसला करता है उसी दिन से हालात उसे भ्रष्ट होने पर मजबूर कर देते हैं। शुरू में हालात मजबूर करते हैं और कामयाब होने पर वो हालातों को भ्रष्ट होने पर मजबूर कर देता है। इसलिए बड़े पद पर बैठे लोगों का कभी कुछ नहीं बिगड़ता।

बहुत से लोग कहते हैं कि भारत से भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं हो सकता। क्योंकि भारतीय मूल रूप से भ्रष्ट हैं और मौका मिलने पर नहीं चूकते। इसमें अतिश्योक्ति हो सकती है। पर यह सही है कि दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां बिलकुल भ्रष्टाचार न हो। हां जिन देशों में यह आम जन-जीवन में दिखाई नहीं पड़ता उनमें भी ऊंचे स्तर पर तो भ्रष्टाचार पाया ही जाता है। चाणाक्य पंडित ने भी कहा है कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि शहद के घड़ों की रखवाली पर बैठे चैकीदार के होठों पर शहद न लगा हो। पर साथ ही चाणाक्य पंडित ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए तमाम तरह की सतर्कता व्यवस्थाओं के सुझाव दिए हैं। राजतंत्र में यह राजा के व्यक्तित्व पर निर्भर होता है कि वह प्रशासन को कैसे चलाए। किंतु लोकतंत्र में यह शक्ति जनता के हाथ में होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारा लोकतंत्र अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ कि जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के काम और आचरण पर अंकुश रख सके। इसलिए चुनाव जीतने के बाद उसके प्रतिनिधियों के रवैए रातो-रात बदल जाते हैं। ऐसे में कोई भी मामला क्यों न हो उस पर जो निर्णय लिए जाते हैं वो कहने को तो जन प्रतिनिधियों द्वारा लिए जाते हैं पर दरअसल उसमें जनता की आकांक्षाओं का दर्शन नहीं होता। इसलिए यह जरूरी है कि संसदीय समितियां कुलीन लोगों के क्लब की तरह काम करने की बजाए जन-आकांक्षाओं को सामने लाने का काम करें। वैसे भी लोकसभा और राज्यसभा के भीतर का माहौल अब पहले जैसा नहीं रहा। जहां गंभीर चिंतन हो सके। जो दूरदर्शन पर दिखाई देता है उसमें गंभीरता कम और अखाड़ेबाजी ज्यादा होती है। संसदीय समितियां बेहतर माहौल में काम करती हैं। बिना समय सीमा के दबाव के काम करती हैं। इसलिए इन्हें अपने प्रयास में ज्यादा जनोन्मुख होना चाहिए। जहां तक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के कर्तव्य और अधिकारों के निर्धारण का सवाल है, बेहतर हो कि प्रस्तावित विधेयक पर अखबारों, टेलीविजन और जन-मंचों पर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़वाई जाए। इस बहस का जो भी नतीजा सामने आए उसे ईमानदारी से स्वीकार कर लिया जाए। यह कोई अनूठी या अव्यवहारिक बात नहीं है।

स्विट्जरलैंड और अमेरीका दो ऐसे प्रमुख लोकतंत्र हैं जहां हर महत्वपूर्ण सवाल पर इसी तरह व्यापक जनमत संग्रह करवाया जाता है। इतना ही नहीं सार्वजनिक महत्व के पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया भी ऐसी संदेहास्पद और गोपनीय नहीं होती जैसी भारत में होती है। अब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया को ही लें। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तहत भी जो व्यवस्था की गई है वह पारदर्शी कतई नहीं है। जब हर स्तर के राजनेताओं पर बड़े-बड़े भ्रष्टाचारों के आरोप लग रहे हों। जब इन राजनेताओं पर अपने विरूद्ध हर जांच को दबवा देने के प्रमाण मौजूद हों तब यह कैसे माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और विपक्ष के नेता ईमानदारी से केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का चयन करेंगे। इस मामले में तो बेहतर यही होगा कि उक्त तीन महानुभावों की समिति इस पद के लिए सुयोग्य उम्मीदवारों की एक लंबी फेहरिस्त देश के सामने प्रस्तुत कर दे और फिर उसमें प्रस्तावित हर व्यक्ति का देश में मीडिया ट्रायल हो। लोग ऐसे उम्मीदवारों से टीवी, अखबारों और जनमंचों पर दो महीने तक डट कर जवाब-तलब करें। उसके पीछे के जीवन की तस्वीर लोगों के सामने आए और तब जो व्यक्ति सबसे खरा नजर आए उसे ही इस पद पर बैठाया जाए। यह प्रक्रिया सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों की नियुक्ति के मामले में भी अपनाई जानी चाहिए। जैसा अमेरीका में होता है। इसी तरह की प्रक्रिया भारत के महालेखा परीक्षक, सीबीआई प्रमुख , मुख्य चुनाव आयुक्त, सेबी चीफ जैसे पदों पर नियुक्ति के मामले में भी अपनाई जानी चाहिए।

जहां तक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के कर्तव्य और अधिकारों पर संसदीय समिति में चल रहे मंथन का सवाल है तो बड़ी साफ सी बात है कि इस समिति के सभी सदस्य अपने दिल में झांक कर खुद से ये सवाल पूछें कि क्या वे वाकई देश से भ्रष्टाचार को दूर करना चाहते हैं ? क्या वे चाहते है कि भ्रष्टाचार में लिप्त आम लोगों को ही नहीं सत्ताधीशों और आला हाकिमों को भी सजा मिले ? क्या वे चाहते हैं कि जो माहौल बिगड़ चुका उससे तो निपटा ही जाए पर भविष्य में हालात ऐसे पैदा हों कि भ्रष्ट आचरण करने वाला कानून के शिकंजे से बच न पाए ? यदि इन प्रश्नों का उत्तर हां में है तो इस समिति को अपना काम पूरा करने में देर लगने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। फिर तो इस समिति को इन मामलों पर किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। हां अगर ऐसी तमाम दूसरी समितिययों की तरह यह समिति भी काम की औपचारिता मात्र पूरी करना चाहती है, कोई ठोस परिणाम नहीं देखना चाहती तो फिर यह जो भी चाहे प्रारूप बना कर दे दे, रहेंगे तो वही ढाक के तीन पात।

Friday, June 9, 2000

दहेज हत्याओं के लिए पुलिस का निकम्मापन जिम्मेदार

शालिनी अग्रवाल की चिता की आग अभी ठंडी नहीं हुई कि देश की राजधानी दिल्ली में दहेज हत्याओं की बाढ़-सी आ गई है। कोई दिन नहीं जाता जब अखबारों की पहले पेज पर दहेज के लालच में मार दी गई किसी न किसी अबला की दर्दनाक हत्या की कहानी नहीं छपी होती। आमतौर पर ये माना जाता है कि गरीब मां-बाप की बेटी ही दहेज की बेदी पर कुर्बान होती होंगी। पर आश्चर्य की बात है कि पिछले दिनों जिन हत्याओं की खबर सुर्खियों में रही वे सब उन नवविवाहिताओं के बारे में थी जिनके पिता और श्वसुराल दोनों ही काफी संपन्न हैं। 23 वर्ष की शालिनी अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। उसकी दो वर्ष की बेटी बताती है कि, ‘पापा ने मम्मी को मार दिया।शालिनी के पिता ने अपने दामाद राहुल को दहेज में तमाम दूसरी चीजों के अलावा ओपेल एस्ट्रा कार दी थी। पर शादी के बाद उस कार को बेच कर राहुल होन्डा सिटी ले आया और इस तरह जो अतिरिक्त रकम उसने खर्च की वही वह शालिनी के पिता से मांग रहा था। ऐसा नहीं है कि शालिनी के घर वाले राहुल की इस वाहियात मांग को पूरा करने से पीछे हट जाते। पर इससे पहले कि वे राहुत की बर्बरता का अंदाजा लगा पाते कि राहुल ने रिवाल्वर से शालिनी की हत्या कर दी। देश के अलग-अलग हिस्सों से ये खबरें आ रही है कि दहेज के लालच में नवविवाहिताओं की हत्या की दर लगातार बढ़ती जा रही है।



दहेज विरोधी कानूनों, महिला संगठनों व जन चेतना के व्यापक प्रसार के बावजूद ऐसा क्यों हो रहा है ? साफ जाहिर है कि दहेज के लोभियों के मन में न तो पुलिस का डर है और न ही कानून का। आंकड़े देखने से पता चलता है कि दहेज हत्या के मामले में जो मुकदमें दर्ज होते हैं उनमें से चार फीसदी मुकदमों में ही सजा मिल पाती है। दहेज हत्या के 96 फीसदी अपराधी बाइज्जत बरी हो जाते हैं। इसलिए दहेज के लालच में घर की नव-ब्याहाता की हत्या करना घाटे का सौदा नहीं है। सजा की संभावना बहुत कम और नई शादी करके दुबारा दहेज पाने की संभावना बहुत ज्यादा रहती है। दहेज हत्या के मामलों में अक्सर देखने में आया है कि पुलिस की भूमिका हत्यारों के पक्ष में रहती है। जिनकी लाडली कच्ची उम्र में ही अकाल मृत्यु के गाल में समा जाती है  वो थाने वालों को क्योंकर रिश्वत देने लगे ? वे तो रोएंगे, चीत्कार करेंगे, थाने के दरोगा की देहरी पर माथा रगडें़गे और उससे न्याय देने की अपील करेंगे। अगर वो नहीं सुनेगा तो भारी दुख और हताशा में मजबूर होकर उसे बुरा-भला कहेंगे। किस्मत के मारे ये बेचारे इससे ज्यादा और कर भी क्या सकते हैं ? पर जिस खूनी दरिंदे पति ने अपनी नवयौवना पत्नी की हत्या करने जैसा जघन्य अपराध किया है, जिसके पत्थर दिल बाप ने अपनी बहू की हत्या की साजिश में बेटे का साथ दिया है, जिसकी चुडै़ल मां ने अपनी बहू को यातनाएं देते वक्त यह भी नहीं सोचा कि कल वो भी किसी की बेटी थी, जिसकी बहन और भाईयों ने अपने भाभी की हत्या का माहौल बनाने में आग में घी का काम किया है, ऐसा वहशी परिवार पुलिस को रिश्वत क्यों न देगा ? क्योंकि उनके मन में चोर है, उन्हें पता है कि उन्होंने कानून और समाज की नजर में एक जघन्य अपराध किया है। स्वभाविक ही है कि ऐसे हत्यारे परिवार की हर कोशिश होती है कि मामले पर किसी तरह खाक डल जाए। सबूत मिटा दिए जाएं। बहु के मायके वालों की तरफ से उनके खिलाफ थाने में लिखी जाने वाली रिपोर्ट इस तरह अधकचरी हो कि आगे चलकर उसका फायदा उठाया जा सके। यही वजह है कि ऐसी हत्या के बाद अक्सर पुलिस मामले को दुर्घटना बता कर रफा-दफा कर देती है। सोचने की बात है कि खाना पकाते वक्त जल कर ज्यादा नवयुवतियां की क्यों मरती हैं ? जबकि कम उम्र की लड़किया तो ज्यादा फुर्तीली और चैकन्नी होती हैं। अगर खाना पकाने में जल कर मरने की कोई दुर्घटना होती भी है तो वो उन बुजुर्ग महिलाओं के साथ होनी चाहिए जिनके अंग शिथिल पड़ चुके हों और जो ऐसी दुर्घटना होने पर तुरत-फुरत भाग कर अपनी रक्षा करने में सक्षम न हों। पर विडंबना देखिए कि अखबारों में जब भी खाना पकाते वक्त मौत होने की खबर छपतीं हैं तो उनमें मरने वाली कोई नववधु ही होती है। जाहिर है कि श्वसुराल वालों द्वारा जबरन पकड़ कर जला दी गई बहू की मौत को पुलिस वाले मोटी रकम खाकर दुर्घटना बता देते हैं। उधर कानून की प्रक्रिया भी इतनी धीमी है कि दहेज हत्या के अपराधियों को सजा मिलने में कई दशक लग जाते हैं। फिर भी सजा चार फीसदी अपराधियों को ही मिल पाती है।

पुलिस और कानून के ऐसे निकम्मे रवैए के कारण ही मार डाली गई लड़की के घर वालों, रिश्तेदारों, शुभचिंतकों या अड़ौसी-पड़ौसियों का उत्तेजित होकर लड़के वालों के घर धावा बोलना एक स्वभाविक सी बात है। कन्या पक्ष के लोगों को इस बात पर खीज आती है कि हत्या के मामले में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में ही उन्हें काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। अगर कन्या पक्ष के लोग दबाव न बनाए रखें तो रिपोर्ट दर्ज होने की संभावना काफी कम रह जाती है। इससे भी ज्यादा तकलीफ की बात वो होती है जब थानेदार कन्या पक्ष के बयान को तोड़-मरोड़ कर दर्ज करता है। शालिनी के मामले में यही हुआ। कन्या पक्ष के लोग पहले दिन से कह रहे थे कि ये दहेज हत्या का मामला है। शालिनी को उसकी सास, ननद, श्वसुर और पति बराबर यातनाएं देते रहे थे। जिनकी शिकायत वह डरी-सहमी सी अपनी मां और मामाओं से करती रहती थी। चूंकि शालिनी के पिता का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है और वे कच्ची गृहस्थी के मुखिया हैं इसलिए शालिनी उन्हें अपना दर्द बता कर, उनके जीवन को खतरे में नहीं डालना चाहती थी। पर शालिनी के परिवार की इस शिकायत को सुन कर भी थाने वालों ने अनसुना कर दिया। चूंकि राहुल और उसके पिता सबरजिस्ट्रार आफिस में कातिब का काम करते हैं और दिल्ली के तमाम महत्वपूर्ण लोगों की अवैध संपत्तियों की रजिस्ट्री में मदद करते रहे हैं इसलिए उन्हें अपने धन बल और संपर्क बल पर पूरा भरोसा था कि पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ेगी। आश्चर्य की बात है कि शालिनी की हत्या के मामले में पुलिस ने उसकी सास और ननद को गिरफ्तार नहीं किया। पुलिस के ऐसे रवैए से नाराज एक क्रुद्ध भीड़ ने जब राहुल की कोठी पर हमला बोल दिया तो पुलिस शालिनी के परिवार जनों को गिरफ्तार करने के पीछे पड़ गई। यह सही है कि तोड़-फोड़ की कार्रवाही कानूनन जुर्म है पर यहां प्रश्न उठता है कि कौन सा जुर्म बड़ा है ? किसी की लाड़ली बेटी को गाजे-बाजे और दान-दहेज के साथ ब्याह कर लाओं और फिर उसे तड़पा-तड़पा कर मार दो या जब किसी की लाड़ली इस तरह बेमौत मारी जाए और पुलिस अपराधियों को संरक्षण दे रही हो तो उनके शुभचिंतक खीज कर क्रोध में हत्यारे परिवार को खुद ही थोड़ी-बहुत सजा देने का काम कर बैठे? दहेज हत्याओं की बढ़ती संख्या के लिए पुलिस की ऐसी नाकारा भूमिका ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। जिस पर फौरन ध्यान दिया जाना चाहिए और दोषी पुलिस कर्मियों को सजा देने की श्ुरूआत की जानी चाहिए।

यूं महिला संगठन, समाज शास्त्री और सुधारक लोग यही कहेंगे कि महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति ज्यादा जागरूक किया जाए। उनके आर्थिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएं। परिवार के किसी भी सदस्य के नाम में उनकी संपत्ति का  हस्तांतरण अवैध घोषित करने वाले कानून बनाए जाएं। दहेज हत्या के मामलों से निपटने के लिए अलग तरह की पुलिस व्यवस्था या विशेष अदालतें गठित की जाएं। पर हकीकत यह है कि ये सब कदम पिछले बीस वर्षों में काफी मात्रा में उठाए जा चुके हैं और इनका थोड़ा-बहुत असर भी पड़ा है। पर सबसे ज्यादा असर अगर पड़ेगा तो वह होगा पुलिस और कानून का डर। कानून आज भी दहेज लोभी हत्यारों के पक्ष में नहीं है। पर जब किसी मुकदमें की बुनियाद ही कमजोर होगी तो उसके नतीजे सही कैसे आएंगे ? दहेज हत्या के मामले में बुनियाद होती है- संबधित थाने में दर्ज प्राथमिक सूचना रिपोर्ट व पुलिस इंसपेक्टर की रिपोर्ट जो वह मामले की जांच करने के बाद तैयार करता है। इसलिए प्रायः दहेज हत्या के अपराधी एक अच्छा आपराधिक वकील पकड़ लेते हैं और थाने में पेशगी रकम पहुंचवा देते हैं ताकि थाना उनके पक्ष में हो जाए और अपनी कार्रवाही को इस तरह करे कि हत्यारे अंततः छूट जाएं। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार और नागरिकों दोनों को पहले करनी होगी। कानून में इस तरह का प्रावधान बना लिया जाना चाहिए कि दहेज हत्या के बाद कन्या पक्ष के लोग थाने में आकर जो भी रिपोर्ट दर्ज कराएं उसके आडियो और वीडियो कैसेट वहीं तैयार किए जाएं। जिनकी एक प्रति थाने में रहे और दूसरी प्रति कन्या पक्ष को सौप दी जाए। ताकि अगर बाद में कन्या पक्ष को लगे कि उनकी बातें थाने में हुबहू दर्ज नहीं की गई है तो वे उच्च अधिकारियों या अदालत के सामने इन टेपों को प्रस्तुत कर अपनी बात सिद्ध कर सकें।

हर समाज में समाज की अवरोधक स्थितियों से निपटने की अपनी एक स्वभाविक प्रक्रिया होती है। भारत में भी यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही थी। जिसे फिरंगी हुक्मरानों ने जानबूझ कर ध्वस्त कर दिया। दहेज हत्या के मामले में तथ्यों की सबसे ज्यादा जानकारी घटना स्थल के आसपास रहने वाले लोगी की होती है। वे ही ऐसी दुर्घटना से सबसे ज्यादा आंदोलित होते हैं। क्या कानून में सुधार करके कुछ जूरीजैसा गठन किया जा सकता है ? ताकि हर इलाके के लोग ऐसे मामलों में दहेज के लोभी परिवार के खिलाफ कुछ दंडात्मक कार्रवाही फौरन ही करने में सक्षम हो सके। हत्या से जुड़े मुकदमे को भारतीय दंड संहिता के तहत बाकायदा अदालत में चलाया जा सकता है। यह व्यवस्था कुछ ऐसी ही होगी जैसी अनेक महानगरों में  पुलिस और मजिस्ट्रेट के काम के लिए नागरिकों के बीच में से कुछ लोगों को नियुक्त करके चलाई जाती है। चूंकि इस व्यवस्था में स्थानीय लोग शामिल होंगे इसलिए उनका दबाव दहेज के लोभियों पर ज्यादा पड़ेगा और उसका असर लंबे समय तक रहेगा। इस तरह अपने ही समाज में अपमानित और तिरस्कृत होने का भय ऐसे दरिंदों को नवयौवनाओं की हत्या करने से रोकेगा। इस विषय पर सभी संबंधित संस्थाओं और संगठनों द्वारा गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह भी बहुत जरूरी है कि लड़कियों को उनके कानूनी हक स्कूल से ही पढ़ाए जाएं और उनमें अत्याचार को न सहने की मानसिकता को विकसित किया जाए। उन्हें यह समझाया जाए कि अपने माता-पिता को दहेज की मार से बचाने के लिए अगर वे खुद शहीद हो जाती हैं तो वह स्थिति उनके माता-पिता का शेष जीवन बर्बाद कर देगी। इससे कहीं अच्छा होगा कि ऐसी लड़कियां जिनके श्वसुराल में दहेज की मांग करके उन्हें सताया जाता है बहुत शुरू में ही इस अत्याचार के विरूद्ध अपने घर वालों को पूरी तरह सतर्क रखें और ये मान लें कि इस तरह सताने वाला पति परमेश्वर नहीं हो सकता। इसलिए उसे समय रहते ही सुधार लिया जाए और न सुधर तो उसे सजा दिलवाने की व्यवस्था खुद या किसी की मार्फत सुनिश्चित कर ली जाए। यह कहना जितना आसान है उतना व्यवहार में मुश्किल। जिस समाज में लड़की को यह कह कर श्वसुराल भेजा जाता हो कि अब तेरी अर्थी ही वहां से निकले, यही तेरा धर्म है, तो उस समाज में लड़की अत्याचार सह कर भी मुंह कैसे खोलेगी ? इसलिए बदलते आर्थिक परिवेश में जब लोगों की भौतिक आकांक्षाएं मानवीय संवेदनाओं पर हावी हो रही हों तब भी अपनी बिटिया को ऐसी पारंपरिक शिक्षा देना उसे कुंए में ढकेलने जैसा है। यह सही है कि भारतीय समाज अभी उस आर्थिक स्थित तक नहीं पहुंचा जब नारी के लिए आर्थिक सुरक्षा सुगमता से उपलब्ध हो। इसलिए उनके मन में यह स्वभाविक भय बना रहता है कि अगर मैंने पति का घर छोड़ दिया तो मैं कहीं की न रहूंगी। इस डर से गरीब और बेपढ़ी लड़कियां ही नहीं संपन्न और सुशिक्षित लड़कियां भी ग्रस्त रहती हैं। इसलिए अत्याचार सह कर भी खामोश रहती हैं। उनकी इस मानसिकता को बदलने की जिम्मेदारी हर लड़की के माता-पिता की है। दहेज उत्पीड़न की समस्या नई नहीं है। पर आज की परिस्थिति में इसका चेहरा विकृत और विक्राल होता जा रहा है इसलिए इस समस्या का समाधान नए संदर्भों में खोजने की जरूरत है।