Sunday, May 30, 2010

आसमान से बरसती आग


पूरा उत्तर भारत भीषण गर्मी की चपेट में है। कई शहरों में तो पारा 50 डिग्री को पार कर गया है। धूप की तपिश ऐसी है कि खाल जलने लगती है। जल स्रोत सूखते जा रहे हैं। इसी हफ्ते पानी के लिए झगड़ें में कई शहरों में लोग मारे जा चुके हैं। पर यह तो सिर्फ आगाज़ है। आने वाले वर्षों में तबाही और मचेगी। ग्लोबल वार्मिंग का शोर नाहक ही नहीं मचाया जा रहा। जिस हाल से हम पृथ्वी का हरित क्षेत्र कम कर रहे हैं, उससे यह तबाही घटेगी नहीं। जल, थल, वायु के वाहनों से निकलने वाला धुंआ हो या कारखानों की चिमनियों से या फिर वातानुकूलन करने वाली मशीनों से - हम प्रकृति में दानवों की तरह जहर उगल रहे हैं।

दूसरे देशों की क्या कहें, अपने ही देश के शहरों को ले लें। जिस तेजी से भवन निर्माण हो रहे हैं उससे ज्यादा तेजी से जंगल काटे जा रहे हैं और पहाड़ तोड़े जा रहे हैं। सारा का सारा विकास पानी की चिंता किये बिना हो रहा है। आज से 15 साल पहले देश की राजधानी के पास गुड़गांव में एक आधुनिक शहर बनाने का दावा किया गया। अंसल, डीएलएफ, सुशांत जैसे बड़े-बड़े भवन निर्माताओं ने गुड़गांव में आधुनिक शहर खड़ा कर भी दिया। दिल्ली के साधन सम्पन्न लोग, काॅरपोरेट जगत के अधिकारी और अप्रवासी भारतीयों ने यहां दिल खोल के बंगले और फ्लैट खरीदे। खरीदते भी क्यों ना, टीवी और अखबारों में जो विज्ञापन दिये गये उनमें इन बंगलों को हरा-भरा और स्विमिंग पूल से सुसज्जित दिखाया गया। पर आज हालत क्या है घ् यहां 2-2 दिन पानी नहीं आता। टैंकरों से आपूर्ति करनी पड़ रही है। फिर भी पूरा नहीं पड़ रहा। पानी के दाम पैप्सी-कोला की तरह हो गये हैं।

यही हाल बिजली का भी है। जब इतने ए.सी. चलेंगे तो बिजली कहां से आयेगी। इस इलाके में रोजाना घंटों बिजली नहीं आती। यह तो एक उदाहरण है। देश के हर शहर में यही हाल है। भवन निर्माता इसी तरह लुभावने सपने दिखाकर लोगों को सुनहरा भविष्य देने का वायदा कर रहे हैं। लोग अपना पारंपरिक, सरल, किफायती, सौहार्दपूर्ण जीवन छोड़कर नये रईसों की तरह नई जीवन पद्धति को अपनाते जा रहे हैं। जिसमें उनके परिवार की प्रति व्यक्ति औसत जल और बिजली की खपत का कोटा तेजी सेे बढ़ता जा रहा है। पानी जमीन की सतह से कई सौ फुट नीचे पहुंच चुका है। बिजली की वर्तमान आपूर्ति किसी भी शहर की आवश्यकता को तीन चैथाई भी पूरा नहीं कर पा रही है। यह आलम तो आज का है, कल क्या हालात होंगे सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हमें पाॅश मानी जाने वाली दक्षिणी दिल्ली में ही अपने इस्तेमाल के लिए हजारों रूपये महीने का जल खरीदना पड़ रहा है। पर किसी को देश में बढ़ते जल संकट की चिंता नहीं है। राजनेता और मीडिया केवल बयानबाजी करते हंै। हमारे आचरण में कोई बदलाव नहीं है। सरकार की नीति में कोई बदलाव नहीं है। सब बिल्ली के सामने कबूतर की तरह आंख बंद किये बैठे हैं। मानो खतरा टल जायेगा।

पर्यावरण की चिंता करने वाले तीन दशकों से चीख-चीख कर चेतावनी दे रहे हैं। पर  उनकी बातों पर गंभीरता से अमल नहीं किया जा रहा है। दंतेवाड़ा जैसे हादसों के बाद भी हमारे राजनेताओं को यह समझ में नहीं आता कि जिस काल्पनिक विकास की ओर वे देश को ले जा रहे हैं वह बहुसंख्यक भारतीय समाज के लिए हासिल कर पाना संभव नहीं है। खासकर तब जब उसकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में यह सोचना कि पूरे भारत को यूरोप बना देंगे, मूर्खतापूर्ण बात है। इस तरह के विकास से दंतेवाड़ा की तरह नक्सलवादी हमले बढ़ेंगे और लोगों का जीना मुहाल हो जायेगा। आज भी शहरों में अपराध का बढ़ता ग्राफ इसी हताशा का प्रमाण है।

चिंता इस बात की होती है कि हम जैसे पत्रकार या लेखक ढोल-ताशे पीटते रहते हैं। फिल्मी सितारे जनहित विज्ञापनों में पर्यावरण चेतना के सारगर्भित उपदेश देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं। राजनेता देश-विदेश के विशेषज्ञों को बुलाकर पांच सितारा होटलों में सम्मेलन करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। पर्यावरण के लिए लड़ने वाले खान माफियाओं से पिटते रहते हैं। पुलिस से उन्हें सहयोग नहीं मिलता। प्रशासन मोटी रिश्वत लेकर हर जिले में प्रदूषण के मुद्दों को बड़ी सहजता से अनदेखा कर देता है। नतीजतन हालात बद से बद्तर होते जो रहे हैं। हम खतरे की घंटी को भी नहीं सुन रहे। कोई नहीं है जो विकास के नाम पर किये जा रहे इस विनाश की दिशा मोड़ दे। ऐसे में संतों से आशा की जानी चाहिए कि वे समाज को जीने का नया ढंग बतायेंगे। नया मतलब पारंपरिक और स्वयं सिद्ध जीवन। पर दुर्भाग्य तो यह है कि पैसा देकर टीवी पर अपने को खुद ही परम्पूज्य बताने वाले तथाकथित संत धर्म के सौदागर हो गये हैं। उनका आचरण और उनके अनुयायिओं का आचरण दूर-दूर तक पर्यावरण रक्षा के अनुरुप नहीं है। सब कुछ डिज़नीलैंड की तरह एक धार्मिक मनोरंजन बन कर रह गया है। ऐसे में खुदा ही मालिक है हमारे भविष्य का। फिलहाल तो सूर्य नारायण ने अपनी गर्मी एक अंश ही बढ़ाया है और हम बिलबिला गये हैं। जरा सोचिए अगर हमने और हमारे हुक्मरानों ने जीवन का ढर्रा जल्दी नहीं बदला तो आने वाले वर्षों में हमें भट्टियों में तपना पड़ेगा। तब नर्क जाने की जरूरत नहीं होगी क्योंकि अपने लिये इसी पृथ्वी पर हम खुद नर्क तैयार कर रहे हैं।

Sunday, May 23, 2010

सर्वाेच्च न्यायालय ने बचाई राज्यपालों की गरिमा

दो हफ्ते पहले भारत के सoksZच्च  न्यायालय ने राज्यपालों के हटाये जाने के संदर्भ में जो ऐतिहासिक फैसला दिया उसकी मीडिया में वैसी चर्चा नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी। जबकि 7 मई 2010 को पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने इस फैसले से किसी भी केन्द्र सरकार से राज्यपालों को मनमानी तरीके से हटाने का अधिकार छीन लिया। यह फैसला भाजपा के पूर्व सांसद श्री बी. पी. सिंघल की एक जनहित याचिका पर दिया गया। उल्लेखनीय है कि 2 जुलाई 2004 को संप्रग की तत्कालीन केन्द्रीय सरकार ने उ0 प्र0, गुजरात, हरियाणा और गोवा के राज्यपालों को इसलिए पद से हटा दिया क्योंकि वे पूर्ववर्ती राजग सरकार के द्वारा नियुक्त किये गये थे। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। आजादी के बाद से खासकर गत तीन दशकों में राज्यपालों को इस तरह हटाने की कई सफल और असफल कोशिशें की गयी। जिससे राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद की गरिमा को ठेस लगी।

केन्द्र सरकार राज्यपाल को अपना प्रतिनिधि मानकर उसे अपने प्रति समर्पित देखना चाहतीं हैं। जबकि इस याचिका में सoksZच्च न्यायालय के वकील एच.पी. शर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 153 से 156 तक का हवाला देकर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि राज्यपाल का पद संवैधानिक पद है और उसे राजनीति का शिकार नहीं बनाया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 156 में साफ लिखा है कि राज्यपाल राष्ट्रपति की इच्छानुसार अपने पद पर रहेगा। यदि वह अपने हस्ताक्षर से त्यागपत्र सौंपता है तो वह पदभार से मुक्त हो सकता है। इसी अनुच्छेद में यह लिखा है कि राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष होगा और यदि उसे हटाया जाना है तो केवल उसी स्थिति में हटाया जायेगा जबकि वह शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांग हो जाए या भ्रष्ट आचरण करे या संविधान की उपेक्षा करे या राज्यपाल के लिए अपेक्षित व्यवहार से हटकर व्यवहार करे या राजनीति में सक्रिय हो जाए या लगातार राजनैतिक जनसभाओं को संबोधित करे या देशद्रोही और विघटनकारी तत्वों से संबंध बना ले। इस हिसाब से तो एक भी राज्यपाल को 2004 में नहीं हटाया जा सकता था। फिर भी उन्हें हटाया गया। न तो कोई कारण बताया गया और न ही कोई जांच की गयी और न ही उन राज्यपालों को अपने आचरण को स्पष्ट करने का मौका दिया गया।

जबकि संविधान के अनुसार राज्यपाल राज्य की विधायिका का अभिन्न अंग है। जब विधानसभा का सत्र न चल रहा हो तो वह अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत है। राज्य की अधिशासी शक्ति उसमें निहित है और हर प्रशासनिक कार्य उसी के नाम से किया जाता है। उसे क्षमादान करने और दण्ड कम करने और राहत देने का अधिकार प्राप्त है। उसे विधानसभा या विधान परिषद का सत्र बुलाने या उन्हें भंग करने का अधिकार होता है। विधानसभा में पारित कोई भी विधेयक तब तक कानून नहीं बनता जब तक उसे राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त न हो। उसे राज्य की असमान्य परिस्थितियों की रिपोर्ट बननी होती है, उन परिस्थितियों में जब उसे यह लगता हो कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार सरकार चलाने में सक्षम नहीं है। इस तरह भारत संघ के राज्य का राज्यपाल एक उच्च संवैधानिक पद पर होता है जिसे अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक कार्य और कर्तव्यों का निर्वाह करना होता है।

राष्ट्रपति की ही तरह राज्यपाल से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह गैर राजनैतिक होगा और अपने पूर्व राजनैतिक संबंधों से मुक्त होकर केवल संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वाह करेगा। इसलिए उसे केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि या उसका मुलाजिम नहीं माना जा सकता। श्री बी.पी. सिंघल की तत्परता और सतत् प्रयास से 6 साल तक लड़ी गयी लंबी कानूनी लड़ाई ने राज्यपाल के पद को राजनीति का शिकार होने से बचा लिया। पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने केन्द्र सरकार के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया कि राज्यपाल को केन्द्र सरकार में बैठे दल की राजनैतिक विचारधारा से ताल-मेल रखना होगा।

यह विजय न सिर्फ बी.पी. सिंघल की है बल्कि भाजपा की भी है, जिसके द्वारा नियुक्त राज्यपालों को 2004 में बेआबरू करके पद से हटाया गया था। आश्चर्य की बात तो यह है कि बावजूद इसके कि यह मामला उसके हितों से सीधा जुड़ा था भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं और उससे जुड़े मशहूर वकीलों ने इस मामले में कभी कोई रूचि नहीं ली। श्री सिंघल को दल की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। यहां तक कि उनकी इस ऐतिहासिक जीत पर भाजपा के बड़े नेताओं ने उन्हें बधाई देना या सार्वजनिक वक्तव्य जारी करना भी मुनासिब नहीं समझा। ऐसा भाजपा के साथ ही नहीं है कि सिद्धांतों के लिए लड़ने वालों की उपेक्षा की जाए बल्कि हर दल और हर क्षेत्र में यह बुराई पैंठ चुकी है। फिर भी जुनूनी लोग अपनी मुठ्ठी भर ताकत और फौलादी इरादों से व्यवस्था को यदा-कदा चुनौती देते ही रहते हैं। जिससे इस लोकतंत्र की रक्षा होती है और अनजाने ही इतिहास रचा जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में केन्द्र की सरकारें किसी प्रांत के राज्यपाल को इस तरह बेआबरू करके हटाने से पहले दस बार सोचेंगीं।

Sunday, May 16, 2010

जाति जनगणना-कहां हो शिरडी वाले बाबा?

सिने सितारे अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाॅग पर लिखा है कि मेरे पिता उ0 प्र0 के कायस्थ थे, मां सरदारनी, पत्नी बंगालिन, बहू कन्नड़, दामाद पंजाबी-अगर जाति आधारित जनगणना होगी तो मैं फार्म में अपनी जाति भारतीयलिखूंगा। दरअसल सप्रग सरकार जाति आधारित जनगणना के पक्ष में नहीं थी। 1931 के बाद आज तक जनगणना में जाति को आधार नहीं बनाया गया। पर लालू, मुलायम और शरद यादव व भाजपा के गोपीनाथ मुंडे ने संसद में तूफान खड़ा कर दिया। उन्हें ज्यादातर सांसदों का समर्थन मिला। मजबूरन सरकार को घुटने टेकने पड़े। प्रधानमंत्री व वित्तमंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि 2011 की जनगणना में जाति आधार रहेगी। अलबत्ता गृहमंत्री पी चिदाम्बरम इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने उनका संशय है कि जनगणना करने निकले 21 लाख सरकारी कर्मचारी भारत की जातिगत जटिलताओं को समझने और उसका सही आंकलन करने के लिए प्रशिक्षित नहीं है। इसलिए जनगणना में जाति आधारित सूचना ठीक मिल पायेगी इसमें संदेह है। पर उन्होंने भी सांसदों की भावना का सम्मान करते हुए इसे मान लिया।

प्रश्न है कि क्या वास्तव में 21वीं सदी के भारत में हमें जाति चेतना की ओर लौटने की जरूरत है? यादव त्रिदेव जोर देकर कहेंगे कि है। पर हकीकत यह है कि इस चेतना से जातिवाद और जातिसंर्घष और बढ़ेगा। आजादी के बाद भी लोग खान-पान तक में जाति का ध्यान रखते थे। पर आज रेल, हवाई जहाज या बस में सफर करने वाले क्या खान-पान में यह परहेज करते हैं? नहीं करते। इससे समाज में एकरसता बढ़ी है। शहरों में सामाजिक संबंधों के लिए जाति अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रही जितनी पहले होती थी। यह शुभ लक्षण है। सूचना व तकनीकी क्रांति, कारोबार का वैश्वीकरण और परिवहन का जाल जाति की सार्थकता को धीरे-धीरे मिटाता जा रहा है। पर जहां कहीं जाति चेतना बाकी है वहां गैर जाति में विवाह करने वाले बच्चों की हत्यायें की जा रही हैं। उन्हें जात बाहर किया जा रहा है। जातिगत आरक्षण के लिए हिंसक आंदोलन किये जा रहे हैं। कुल मिलाकर जो ऊर्जा सद्भाव और विकास में लगनी चाहिए थी वह विध्वंसक कार्यों में लग रही है। राजनेता यही चाहते हैं कि समाज जातियों में बंटा रहे और वो विभिन्न जातियों के बीच लोभ के टुकड़े फेंककर उन्हें लड़ाते रहें और अपना उल्लू सीधा करते रहें। वोट बटोरते रहें और सता हथियाते रहें। 

जिन्हें वास्तव में समाज के शोषित, पीडि़त, उपेक्षित वर्ग की चिंता होती है, उनके लिए दिल में दर्द होता है वे उन्हें जाति के नाम पर भड़काकर लड़ाते नहीं हैं। उकसाते नहीं है। समाज में वैमनस्य पैदा नहीं करते। बल्कि ऐसे लोगों को सद्विचार और अच्छे संस्कार देकर उनका वास्तविक उत्थान करते हैं। गुरुनानक देव, स्वामी रैदास, कबीरदास जी, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव जी, तुकाराम जी व शिरडी सांई बाबा जैसे संतों ने ऐसे वर्गों को राहत का वह मलहम दिया जिसने उनकी सदियों की पीड़ा को दूर कर दिया। उनके जीवन में नए उत्साह का संचार किया। उन्हें आत्म सम्मान से जीने का मार्ग दिखाया। ऐसे संतो ंके प्रयासों से समाज में प्रेम और सौहार्द बढ़ा। आज भी इन संतों की शिक्षायें करोड़ों लोगों के जीवन में सुख का संचार कर रही हैं। लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं। क्या जातिगत जनगणना की मांग करने वाले राजनेता समाज के पिछड़े वर्गोंं को ऐसी राहत और ऐसा सुख दे पायेंगे जैसा शिरडी वाले सांई बाबा आज भी दे रहे हैं? क्या यह राजनेता जिन्हें पिछड़े समाज का तथाकथित शुभचिंतक बताया जा रहा है, इसी तरह पुजेंगे जैसे नानक देव और कबीरदास जी पुजते हैं। उतर है नहंी। मतलब यह हुआ कि पिछड़े वर्गोंं की वकालत करने का दंभ भरने वाले जातिवादी नेताओं को वे लोग भी नहीं पूजेंगे जिनके हितैषी होने का यह दावा कर रहे हैं। फिर यह तूफान क्यों?
वोटों की राजनीति ही ऐसी होती है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त, उद्योगपति परिवार में जन्में युवा सांसद नवीन जिंदल तक खाप फैसलों के पक्ष में बयान देने लगे। साफ जाहिर है कि राजनीतिज्ञ वह नहीं कहते या करते जिसमें उनकी आस्था होती है। बल्कि वह कहते व करते हैं जिससे उन्हें राजनैतिक लाभ मिले। नतीजतन उनके कामों में परमार्थ कम और स्वार्थ ज्यादा होता है। इसीलिए राजनीतिज्ञों पर से मतदाताओं का विश्वास घटता जा रहा है। जातिगत जनगणना से पिछड़ी जातियों को लाभ हो न हो उनके नाम पर राजनीति करने वालों की रोटियां खूब सिकेंगीं। पहले से हिंसक और भ्रष्ट होती चुनावी प्रक्रिया और भी जटिल, हिंसक और सर्घषपूर्ण होगी। जिससे समाज में अराजकता फैलेगी। अशांति फैलेगी और खामियाजा भुगतना पड़ेगा समाज के उसी वर्ग को जिसके फायदे के लिए बताकर इस जहर को बोया जा रहा है। जब प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से इसके खिलाफ होने के बावजूद भी बहुमत के आगे असहाय हैं, तब तो देश की हालत सुधारने के लिए और इसे जातिवाद के जाल से मुक्त कराने के लिए शिरडी बाबा जैसे विरक्त संतों की शरण में ही जाना पड़ेगा।

Sunday, May 9, 2010

पर्यटन में नई सोच की जरूरत


राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दिल्ली ही नहीं आस-पास के पर्यटन क्षेत्रों की तरफ भी ध्यान दिया जा रहा है। पर अफरा-तफरी में किये गये प्रयासों से कोई ठोस नतीजे नहीं आ सकते। पैसे की बर्बादी होगी और स्थाई सुधार नहीं हो पायेगा। अत्यूल्य भारतका नारा सैद्धांतिक रूप से भारत के लिए सटीक है। पर व्यवहारिक रूप से यह भारी विरोधाभास दिखाता है। अत्युल्य भारत का सपना संजोए जब कोई पर्यटक यहां आता है तो अव्यवस्थाओं के मकड़जाल में घबडा जाता है। यह तो भारत की सनातन आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विविधता है जो उसे तमाम दिक्कतों के बावजूद भारत की ओर खींच लाती है। अगर कहीं व्यवस्थित और सुविधाजनकरूप से हम दुनियां के सामने अतुल्य भारत को प्रस्तुत कर सds तो भारत का पर्यटन उद्योग इतनी उंचाई पर चला जायेगा कि बड़े-बड़े कारोबारी पंडित दांतों तले उंगली दबा लेंगे। हा¡र्वड स्कूल आ¡फ मैनेजमेंट में भारत की इस अप्रत्याक्षित सफलता पर अध्ययन शुरू हो जायेंगे। ऐसा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पर्यटन नीति और विकास कार्यक्रमों में समन्वय और अनूठी सोच की जरूरत है। जिसके लिए चाहिए ऊर्जावान नेतृत्व जिसमें नौकरशाही के दकियानूसी तर्कजाल को तोड़ने की कुव्वत्त हो। जैसी कुव्वत राजीव गांधी ने दिखाई थी जब उन्होंने संचार और कम्प्यूटर करांति का सूत्रपात किया था। जिसका फायदा आज वो सब उठा रहे हैं जो तब उनका मजाक उड़ाते थे।

भारत की पर्यटन मंत्री कुमारी शैलजा युवा हैं और उत्साही भी। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि वे पर्यटन के क्षेत्र में एक नया इतिहास रpsगीं। पूरे भारत का एकसा विकास एक साथ अल्पकाल में मौजूदा हालतों में संभव नहीं है। पर पर्यटन की दृष्टि से भारत के महत्वपूर्ण भौगोलिक और सांस्कृति क्षेत्रों को छांटकर सम्पूर्णता के साथ विकसित करना संभव है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे क्षेत्रों के विकास के लिए भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, पर्यटन व संस्कृति मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के एक-एक अधिकारी को साथ लेकर संबंधित राज्य के ऐसे ही अधिकारियों को साथ लेकर अलग-अलग एक्शन गु्रप बनाये जाएं। यह एक्शन गु्रप उस क्षेत्र में कार्यरत, समर्पित, स्वयंसिद्ध, किसी एक स्वयं सेवी संस्था को साथ लेकर उस क्षेत्र के विकास का मास्टर प्लान तैयार करे। जिसे लागू करने के लिए भारत सरकार के सभी मंत्रालय अपने मौजूदा कार्यक्रमों में से आवश्यक वित्त आवंटित कjs और प्रांतीय सरकार अपने मंत्रीमंडल में प्रस्ताव पास करके इन कार्यक्रमों को लागू करने का काम इसी संस्था को सौंपे जिसने उस क्षेत्र में अनूठे काम से सफलता के झंडे गाढ़े हों। क्योंकि निचली नौकरशाही के भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चलते काम कराना आसान नहीं होता।

इस तरह इस नये माडल से उस क्षेत्र के गांवों, सड़कों, वनों, जलाशयों, ऐतिहासिक भवनों आदि का समेकित जीर्णोद्धार और विकास करना संभव होगा। फिर चाहे कूड़े के निपटारे की समस्या हो या यातायात नियंत्रण की या पर्यटकों की सुरक्षा की, हर पक्ष पर एक सामूहिक सोच से काम किया जाए। तब उस क्षेत्र का जो स्वरूप निखर कर आयेगा वह अकल्पनीय होगा। इस मामले में कुमारी शैलजा को भारत के चार-पांच क्षेत्र चुनकर अगले तीन वर्षों में उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए। जिन राज्यों में उनके दल की सरकार है वहां उन्हें कोई दिक्कत नहीं आयेगी। पर जिन राज्यों में दूसरे दल की सरकारें भी हैं वहां भी उद्देश्य की पवित्रता केा देखते हुए ऐसा सहयोग हासिल कर पाना कुमारी शैलजा के लिए असंभव नहीं होगा।

आज तो यह हो रहा है कि पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में एक सरकारी योजना सड़क बनाने की आती है और सड़के बन जाती हैं। सीवर लाइन डालने की योजना आती है तो बनी हुई सड़कें तोड़ कर सीवर लाइन डाली जाती है फिर सड़कें बनाई जाती हैं । एक योजना आती है पर्यटन विभाग के बेकार पड़े सरकारी भवनों को निजि हाथों में सौंपने की और दूसरी योजना में उसी क्षेत्र में पर्यटन की दृष्टि से ही कुछ कार्यक्रम चलाने के लिए भवन की आवश्यकता होती है जिसके लिए नया वित्तीय आवंटन हो जाता है। इसी तरह तोड़-फोड़ चलती रहती है। नतीजतन पर्यटन के लिए वह क्षेत्र आकर्षक बनने की बजाय हमेशा निर्माणाधीन भवन की तरह बेतरतीब और अस्त-व्यस्त पड़ा रहता है। उसकी यह दुर्दशा वर्षों तक बनी रहती है। स्वाभाविक है कि ऐसे माहौल में पर्यटक एक बार आ जाए तो दोबारा उधर रूख नहीं करेगा। जबकि भारत की सांस्कृतिक विरासत इतनी आकर्षक है कि वह बार-बार पर्यटक को अपनी ओर खींचने की सामथ्र्य रखती है। विदेशी पर्यटक ही क्यों आज तो देशी पर्यटक भी इतना सामर्थवान हो गया है कि उसे तीन सितारा से कम आतिथ्य तीर्थ स्थानों तक में भी स्वीकार्य नहीं। इसलिए पर्यटन के क्षेत्र में असीम संभावनायें हैं। देखना यह है कि कुमारी शैलजा इन्हें किस हद तक अमलीजामा पहना पाती हैं।

Sunday, May 2, 2010

बुलेटप्रूफ जैकेट या सिपाहियों की जिंदगी से खिलवाड़


भारत सरकार के गृहमंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी रिश्वत लेते गिरफ्तार हो गये। आपदा प्रबंधन के संयुक्त सचिव ओ. रवि को 25 लाख रूपये की रिश्वत लेते पकड़ा गया। जबकि निदेशक राधे श्याम शर्मा को बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद में रिश्वत लेने के आरोप में। साथ ही रिश्वत देने के आरोप में युवा इंजीनियर आर. के. गुप्ता व उनकी पत्नी लवीना गुप्ता को भी गिरफ्तार किया गया। इस केस के कुछ ऐसे महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य हैं जिन पर देश को विचार करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि आंतकवाद और नक्सलवाद के बढ़ते खतरों के बीच गृहमंत्रालय को बुलेटप्रूफ जैकेटों की भारी आवश्यकता पड़ने लगी है। दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में मारी गयी सीआरपीएफ की पूरी कंपनी के बाद तो सिपाहियों की सुरक्षा को लेकर और भी सवाल उठने लगे हैं। पर चिंता की बात यह है कि गृहमंत्रालय बुलेटप्रूफ जैकेटों की खरीद के मामले में जो प्रक्रिया अपनाता रहा है वह पारदर्शी नहीं है। यह खरीद भी पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल के जमाने से विवादों में रही है। चयन प्रक्रिया में खुले आम धांधली होती है और चहेतों को आर्डर देने के लिए हर हथकंडा अपनाया जाता है। जरूरी नहीं कि जिस निर्माता की बनाई बुलेटप्रूफ जैकेटें खरीदी जांए उसका उत्पाद सर्वश्रेष्ठ हो। क्योंकि गुणवत्ता से ज्यादा कमीशन की रकम पर खरीदार मंडली का ध्यान रहता है। फिर चाहे जाबांज सिपाहियों की जिंदगी से ही समझौता क्यों न करना पड़े।
26 नवम्बर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले की रात ए.टी.एस चीफ हेमंत करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट गायब हो गयी थी। यह समाचार सभी टीवी चैनलों पर बार-बार आता रहा। फिर अचानक चार दिन बाद यह बुलेटप्रूफ जैकेट मिल गयी। इतने संवेदनशील मामले में इससे बड़ा मजाक कोई हो नहीं सकता। जानकारों का कहना है कि जब श्री करकरे पर आतंकी गोली चली तो उनकी बुलेटप्रूफ जैकेट उसे झेल नहीं पायी। क्योंकि वह नकली थी और देश ने एक कर्तव्यनिष्ठ जाबांज अधिकारी को खो दिया। जानकारों का कहना है कि चार दिन बाद मिली बुलेटप्रूफ जैकेट वह नहीं थी जिसे करकरे ने हमले के समय पहना हुआ था। बल्कि यह बाद में उसी कोण से गोली चलाकर तैयार की गयी दूसरी जैकेट थी। चाहे इंदिरा गांधी के हत्यारों को पकड़े जाने के बाद भी मारने का हादसा हो या राजीव हत्याकांड के महत्वपूर्ण गवाह की पुलिस हिरासत में आत्महत्या का मामला हो या फिर करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट का, कभी सच सामने आ ही नही ंपाता। वर्षों जांच का नाटक चलता रहता है।

गृहमंत्रालय के ताजा हादसे के संदर्भ मंें यह बात महत्वपूर्ण है कि जिस आर. के. गुप्ता और उसकी पत्नी लवीना को गिरफ्तार किया गया है वे दोनों काफी अर्से से बुलेटप्रूफ जैकेटों का यह आर्डर लेने के लिए लगे हुए थे। उनका दावा था कि उनका माल सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद इसलिए परीक्षण में फेल कर दिया गया क्योंकि खरीदार मंडली किसी और को ठेका देना चाहती थी। इसलिए आर. के. गुप्ता ने गृहमंत्रालय के कुछ महत्पूर्ण अधिकारियों के खिलाफ उनके अनैतिक आचरण के कई प्रमाण और रिकार्डिंग इकठा कर ली थी। वे इसे लेकर दिल्ली के मीडिया सर्किल में घूम रहे थे। इसी बीच गृहमंत्रालय के अधिकारियों को भनक लग गयी और वे डर गये। पर उन्होंने होशियारी से आर. के. गुप्ता से डील करने का प्रस्ताव रखा। व्यापारी बुद्धि का व्यक्ति कोई योद्धा तो होता नहंीं जो एक बार जंग छेड़कर मैदान मेें टिका रहे। उसे तो पैसा कमाना होता है। लगता है इसी लालच में आर. के. गुप्ता फिसल गया और इन अधिकारियों के जाल में फंस गया। जहां तक उसके रिश्वत देने का मामला है तो यह अपराध करते हुए वह रंगे हाथ पकड़ा गया है। अगर अभियोग पक्ष अपना आरोप अदालत में सिद्ध कर पाता है तो उसे कानूनन सजा मिलेगी। पर साथ ही क्या यह भी जरूरी नहीं कि गृहमंत्रालय के अधिकारियों के विरूद्ध जो सबूत आर. के. गुप्ता लेकर घूम रहा था उसकी भी पूरी ईमानदारी से जांच की जाए। यह भी जांच की जाए कि बुलेटप्रूफ जैकेटों की खरीद के परीक्षण में जो प्रक्रिया अपनाई गयी वह पूरी तरह पारदर्शी थी या नहीं। अगर यह पता चलता है कि बेईमानी से, कम गुणवत्ता वाले निर्माता को यह ठेका दिया जा रहा था तो सांसदों, मीडिया और जागरूक नागरिकों को सवाल खड़े करने चाहिए। एक तरफ तो हम आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटने के लंबे चौड़े दावे रोज टीवी पर सुनते हैं और दूसरी तरफ अपनी जान खतरे में डालने वाले गरीब माताओं के नौनिहाल सिपाहियों की जिंदगी के साथ घटिया माल लेकर इस तरह खिलवाड़ किया जाता है।

वैसे सरकारी ठेकों में बिना कमीशन तय किये केवल गुणवत्ता के आधार पर ठेका मिल जाता हो ऐसा अनुभव शायद ही किसी प्रांत या केन्द्र सरकार से व्यापारिक संबंध रखने वाले किसी व्यापारी का होगा। कमीशन के बिना सरकार में पत्ता भी नहंी हिलता। अभी पिछले ही दिनों हमने भारतीय पर्यटन विकास निगम लि0 की टैंडर प्रक्रिया में ऐसा ही एक घोटाला पकड़ा और उसे केंन्द्रीय सतर्कता आयोग को थमा दिया। आयोग के अधिकारियों ने जांच के बाद हमारे आरोप सही पाये और अब इस घोटाले में शामिल उच्च अधिकारियों के खिलाफ मेजर पैनल्टी यानी बड़ी सजा दिये जाने का प्रस्ताव किया गया है। सांप छछूदर वाली स्थिति है। आप कमीशन न दो तो ठेका नहीं मिलेगा। कमीशन दो तो भी गारंटी नहीं कि आपको ही मिलेगा। क्यांेकि कमीशन के अलावा भी अन्य कई बातें होती हैं जिनका ध्यान खरीदार मंडली के जहन में रहता है। इसलिए आपका उत्पादन सर्वश्रेष्ठ हो, कीमत भी मुनासिब हो तो भी गारंटी नहीं कि ठेका आपको मिलेगा।

आर. के. गुप्ता जैसे निर्माता तो अपनी बेवकूफी से कभी-कभी पकड़े जाते हैं पर सच्चाई यह है कि अगर सरकार से व्यापार करना है तो आप पारदर्शिता और गुणवत्ता की अपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसे में जो पकड़ा जाए वो चोर और बच जाए वह शाह। सोचने वाली बात है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध तमाम संस्थायें और भाषणबाजी होने के बावजूद भ्रष्टाचार और तेजी से बढ़ रहा है। फिर जिसे व्यापार करना है वो क्या करे। महाराजा हरीशचन्द्र बनकर बनारस के मंणिकर्णिका घाट पर शवदाह का कर वसूले या हाकिमों को मोटे कमीशन देकर ठेके हासिल करे। जब तक इस मकड़जाल को खत्म नहीं किया जायेगा ऐसे हादसे होते रहेंगे। देशवासी तो रोजमर्रा की मंहगाई को लेकर ही रोते रहेंगे और घोटाले करने वाले करोड़ों-अरबों डकारते रहेंगे।

Sunday, April 25, 2010

दिले नादां तुझे हुआ क्या है?

आई.पी.एल. सरकारी शिकंजे में फंस चुकी है। शशि थरूर पर उंगली उठाकर ललित मोदी ने आई.पी.एल. की कब्र खोद दी। पर यह तो कभी न कभी होना ही था। प्रकृति का सिद्धान्त है कि जो वस्तु जितनी तेजी से ऊपर जाती है, उतनी ही तेजी से नीचे भी आती है। आई.पी.एल. ही क्यों, बी.सी.सी.आई. की कारगुजारियाँ भी संदेह से परे नहीं। जनता हैरान है कि जिस देश में पीने के पानी का संकट बढ़ता जा रहा हो, आजादी के 63 साल बाद भी आधी आबादी गरीबी सीमा रेखा से नीचे जिन्दगी बसर करने को मजबूर हो, न्याय व्यवस्था चरमरा गयी हो, कार्यपालिका लकीर पीट रही हो और लोकतान्त्रिक संस्थाऐं गुण्डे और मवालियों के हाथ में जा रही हों, उस देश में हर दल के बड़े नेता लोगों की बुनियादी समस्याओं को हल करना तो दूर उन्हें सुनने तक के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। वे ही नेता रात दिन क्रिकेट के इतने दीवाने कैसे हो गये कि क्रिकेट के फैसले लेने के लिए बी.सी.सी.आई. या आई.पी.एल. की बैठकों में भाग लेने देश ही नहीं विदेशों तक में तुरत-फुरत पहुँच जाते हैं। मतदाता सवाल पूछते हैं कि नेंका के नेता हों या इंका के, एन.सी.पी.ए. के हों या भाजपा के, इन सबको इतना समय क्रिकेट के लिए कैसे मिल जाता है?

क्या इन नेताओं को आई.पी.एल. या बी.सी.सी.आई. में रूचि इसलिए है कि इससे देश की जनता की ये बेहतर सेवा कर पाते हैं? तो यह सच नहीं है। आई.पी.एल. या बी.सी.सी.आई. क्रिकेट के खेल में जो अरबों रूपये का मुनाफा कमाती हैं, उसका एक अंश भी देश की आम जनता के हित में खर्च नहीं होता। विकास के मुद्दे छोड़ दो और बाकी खेलों की बात भी छोड़ दो तो क्या बी.सी.सी.आई. बता सकती है कि उसने देश के कितने गाँव में क्रिकेट की पिच तैयार करवायीं? कितने गाँव के युवा दलों को क्रिकेट सैट खरीद कर दिये? कितने गाँव और कस्बों में क्रिकेट सिखाने के लिए प्रशिक्षकों की व्यवस्था की? कितने गाँव और शहरों के बीच क्रिकेट मैच करवाये और खिलाडि़यों को उचित पुरस्कार दिये? कितने भूतपूर्व क्रिकेट खिलाडि़यों की आर्थिक अवस्था के अनुरूप, आवश्यकतानुसार, उनकी पेंशन बाँधी? कितने कस्बों और शहरों में क्रिकेट के लिए स्टेडियम बनवाये? देश के कितने स्कूल और काॅलेजों के बीच क्रिकेट के टूर्नामेंट आयोजित किये? इन सब सवालों का जबाव नकारात्मक ही मिलेगा।

देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। बड़े-बड़े नेता जनता के दुख-दर्द दूर करने में असफल रहे हैं। इसलिए नक्सलवाद पनप रहा है। पनप ही नहीं रहा, व्यवस्था में भी अपनी जड़ें घुसाता जा रहा है। गृहमंत्री लाख दावे करें, प्रधानमंत्री लाख आश्वासन दें, पर देश की जनता जानती है कि नक्सलवाद से निपटना सरकार के लिए आसान काम नहीं है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र की जनता से देश के बड़े राजनेता और केन्द्रीय मंत्री जा जाकर पूछें कि उनकी माँग क्या है? उनकी शिकायत क्या है? और यथासम्भव उसे दूर करने का प्रयास करें। पर वे ऐसा नहीं कर रहे। उन्हें लगता है कि गोली और तोप के जोर पर सरकार और उसकी पुलिस नक्सलवाद पर काबू पा लेगी। दंतेवाडा का काण्ड उनके इस दावे को झूठा सिद्ध करता है। यानि लड़ाई दोनों मोर्चों पर लड़ी जानी हैं। एक तरफ आम जनता को राहत मिले, उसके जीवन जीने के हालात सुधरें और दूसरी तरफ नक्सलवादी हिंसा से कड़ाई से निपटा जाऐ। पर इसके लिए उनके पास वक्त नहीं है। यह सब काम त्वरित प्राथमिकता वाले होते हुए भी इन नेताओं की प्राथमिकता सूची में नहीं हैं। पर क्रिकेट की राजनीति को और क्रिकेट के खेल को नियन्त्रित करने के लिए इनके पास खूब वक्त है। और तो और गुजरात के विकास पुरूष नरेन्द्र मोदी से लेकर बिहार के लालू यादव तक क्रिकेट की राजनीति में आकण्ठ डूबे हैं। यह चिन्ता का विषय है।

शशि थरूर को नैतिकता के आधार पर इस्तीफे देने के लिए मजबूर करने वाले राजनीतिक दलों को आत्ममंथन भी करना चाहिए। क्या क्रिकेट में इतनी रूचि इस खेल के प्रति उनके जन्मजात रूझान का फल है, या क्रिकेट में आ रहा अरबों-खरबों रूपया इनके आकर्षण का केन्द्र है। देश का आम आदमी भी समझता है कि कोई राजनेता क्रिकेट की राजनीति में खेल की सेवा भावना से नहीं आया है। बल्कि इस खेल में पैदा हो रहे खरबों रूपये के काले धन को बाँटने के लिए आया है। ऐसे में जो राजनेता क्रिकेट की इस राजनीति से अछूते हैं, उन्हें संसद में तूफान खड़ा करना चाहिए और विधेयक लाना चाहिए जिसके अनुसार खेलों का प्रबन्ध करना खेलों के पुराने खिलाडि़यों, उद्योगपतियों या प्रशासनिक अनुभव वाले व्यवसायिक लोगों के हाथ में छोड़ देना चाहिए। किसी भी राजनेता को जो विधानसभा या संसद का सदस्य है, क्रिकेट की किसी भी समिति का सदस्य बनना प्रतिबन्धित होना चाहिए।

क्रिकेट ही क्यों, अब तो हाॅकी, फुटबाॅल, टेनिस और बाॅक्सिंग तक में ग्लैमर बढ़ने लगा है। भविष्य में इन खेलों की भी हालत क्रिकेट जैसी बन सकती है। इसलिए क्रिकेट ही नहीं सभी खेलांे के संचालन के लिए बनी समितियों में विधायकों व सांसदों के प्रवेश पर उक्त विधेयक में प्रावधान होना चाहिए। आयकर विभाग और फेमा जैसे विभाग तो पूरी छानबीन में जुटे ही हैं, पर देश की जनता, मीडिया और सांसदों व विधायकों को इस विषय में गंभीरता से ठोस प्रयास करने चाहिऐं जिससे हमारा खेल भी सुधरे और हमारे राजनेता भी मैच फिक्सिंग और क्रिकेट के सट्टे के लोभ से बच सकें और अपना ध्यान देश की समस्याओं के हल पर लगायें। कहते हैं कि दर्द का हद से गुजर जाना है दवा हो जाना। क्रिकेट की राजनीति का कैंसर इस कदर बढ़ चुका था कि शशि थरूर के बहाने जो कुछ होगा वो इसका इलाज ही होगा। देश को इन्तजार रहेगा जाँच एजेंन्सियों की उपलब्धियों का। रही बात ललित मोदी की तो जहाँ तक आई.पी.एल. को आकार देने की बात है, उसका श्रेय तो ललित मोदी को मिलेगा ही और मिल भी रहा है। पर अगर इस आकार देने की प्रक्रिया में बहुत बड़े आर्थिक अपराध जुड़े हैं तो मोदी जैसे लोग भी कानून की पकड़ से बच नहीं पायेंगे।

Sunday, April 18, 2010

बेचारे शशि थरूर!

जब कभी कोई राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शोर मचाता है तो उसका मकसद भ्रष्टाचार को समाप्त करना नहीं होता। आरोपी को सजा दिलवाना भी नहीं होता। केवल राजनैतिक लाभ उठाने के मकसद से शोर मचाया जाता है। ताजा मामला शशि थरूर का है।  रोंदेवु स्पोर्ट्स की भागीदार सुनन्दा पुष्कर उनकी मित्र, पे्रयसी या भावी पत्नी हैं, यही आधार काफी है उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने को। विपक्षी दल सरकार को घेर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि रोंदेवु स्पोर्ट्स के व्यवसायिक मामले में हस्तक्षेप का हक किसी को नहीं बनता। शशि थरूर की निजी जिन्दगी से दल का कोई वास्ता नहीं। पर विपक्ष थरूर के इस्तीफे की माँग पर अड़ा है। इंका आलाकमान और उनके समर्थित भारत के प्रधानमंत्री पर थरूर को हटाने का दबाव बनाया जा रहा है। क्या फैसला होता है, यह तो जल्द ही सामने आ जायेगा। पर इस माहौल में कुछ सवाल जरूर खड़े होते हैं।

शोर मचाने वाले दलों के नेता क्या दावे से कह सकते हैं कि उनका दामन पाक-साफ है? उन्होंने आज तक जीवन में जो भी धन और सम्पत्ति अर्जित की है, वह सीधे और नैतिक रास्तों से की है? जो भी चुनाव लड़े हैं, वह काले धन से नहीं लड़े? उनके देशभर में कहीं कोई व्यवसायिक हित नहीं हैं? उन्होंने कभी भी अपने पद का दुरूपयोग किसी चहेते या भाई-भतीजे के आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया? जब कभी उनके ही दल के बड़े नेता किसी घोटाले में फंसे या आरोपित हुए, तो भी उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर की तरह सच का साथ दिया और अपने ही दल के नेताओं के खिलाफ संसद में ऐसे ही शोर मचाया जैसा वे आज शशि थरूर के खिलाफ मचा रहे हैं? अगर यह सच है तो शशि थरूर को सजा दिलवाने की माँग करने वाले सांसदों का समर्थन किया जाना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और निष्पक्षता के उच्च मानदण्ड स्थापित करने के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए। पर सब जानते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है। जो ललित मोदी आज भाजपा नेताओं की मदद लेकर शशि थरूर को नैतिकता का आईना दिखा रहे हैं, उनके राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के कार्यकाल में क्या कारनामे रहे उससे राजस्थान की जनता ही नहीं और भी बहुत लोग वाकिफ हैं। दिवंगत फिल्मी सितारे राजकुमार का एक डाॅयलाग यहाँ उपयुक्त रहेगा, ‘जिनके घर के शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकते

शशि थरूर ने अगर कुछ भी अनैतिक किया है तो विपक्ष, मीडिया व खुद प्रधानमंत्री उसकी आसानी से उपेक्षा नहीं करेंगे। पर पिछले तीन दशक की पत्रकारिता में मैंने अनुभव किया है कि प्रायः ऐसे नेताओं पर कीचड़ ज्यादा उछलती है जो राजनीति में पारंपरिक छवि से भिन्न अपनी कुछ विशिष्ट पहचान लिये होते हैं। राजनीति के घिसे मँजे लोग तो बड़े से बड़ा घोटाला भी इस सफाई से कर जाते हैं कि आसानी से पकड़े न जाऐं। अगर पकड़े जाते हैं तो या तो मीडिया मैनेज कर लेते हैं या मोटी चमड़ी के बनकर सारे विवाद को अनदेखा कर देते हैं। किरकिरी तो शशि थरूर जैसे उन नेताओं की होती है जिनके व्यक्तित्व की चमक बाकी लोगों को अच्छी नहीं लगती। राजीव गाँधी का भी यही हश्र हुआ। वे बेचारे भोले-भाले पायलट राजनीति की समझ से परे थे। उनके सरल आचरण से जो लापरवाही हुई, उसका विपक्षी दलों ने तिल का ताड़ बना दिया। एक सोचा समझा अभियान चलाकर राजीव गाँधी की छवि को बिगाड़ने की भरपूर और काफी हद तक कामयाब कोशिश की गयी। जबकि उस वक्त राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह के तीन प्रमुख सहयोगियों विद्याचरण शुक्ल, आरिफ मोहम्मद खान और सतपाल मलिक का दामन पाक-साफ है, ऐसा दावा तो वो खुद भी नहीं कर सकते। राजीव गाँधी को हराकर सत्ता में आये दलों के नेताओं ने राजा हरीशचन्द्र की तरह आचरण किया हो, इसके प्रमाण नहीं मिलते। जबकि इसके विपरीत आचरण के तमाम प्रमाण मिल जायेंगे। पर राजीव गाँधी तो शहीद हो ही गये। ताजा लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह पर हल्ला बोला गया कि वे एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं। जो आतंकवाद और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कड़े फैसले नहीं ले सकते। पर इस अभियान को चलाने वाले नेताओं को जब उनके कार्यकाल की याद दिलायी गयी तो यह हमला शान्त हो गया क्योंकि हमलावरों के हथियार भौंतरे हो गये थे। पर काफी दिन तक एक शरीफ प्रधानमंत्री पर हतोत्साहित करने का सोचा-समझा अभियान चलाया गया। इसलिए प्रधानमंत्री को शशि थरूर के मामले में ठण्डे दिमाग से फैसला लेना चाहिए। अगर इस बात पर सन्देह नजर आये कि थरूर का इस रोंदेवु स्पोर्ट्स की डील में कोई हिस्सा था, तो उन पर कार्यवाही की जा सकती है। लेकिन विपक्ष के शोर मचाने पर मीडिया के इस मामले को उछालने पर अपनी राय कायम नहीं करनी चाहिए।

1993 में जब मैंने देश के 115 बड़े राजनेताओं और आला अफसरों को जैन डायरी हवाला काण्ड में लिप्त पाया और उन्हें सी.बी.आई. से चार्जशीट करवाया, तो ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ था। सबको लगा कि राजनैतिक हालात अब तेजी से बदलेंगे। इस घोटाले से व्यवस्था में दरार तो जरूर आयी, पर भ्रष्टाचार घटने की बजाय बढ़ गया। नेताओं ने भी समझ लिया कि सी.बी.आई. और सर्वोच्च न्यायालय के बावजूद उनका कुछ नहीं बिगड़ा। इसलिए वे और भी निरंकुश हो गये। आजादी के बाद से समय-समय पर सत्ता पक्ष के घोटाले सामने आते रहे हैं और विपक्ष उन पर संसद में शोर मचाता रहा। सजा दिलवाना न कोई चाहता था और न किसी को मिली। सी.बी.आई. जाँच के नाम पर नाटक हुए और तथ्यों को दबा दिया गया। भ्रष्टाचार के मामले पर शोर मचाने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि इससे निपटने के जो कारगर उपाय हैं, उनको अपनाने में आने वाली अड़चनों को दूर करने का अभियान चलाया जाए। जिससे भ्रष्टाचार का कैंसर बढ़ने से रोका जा सके। पर देखने में यही आया है कि ऐसे मुद्दों पर शोर मचाने वाले बदलाव नहीं चाहते, केवल राजनैतिक लाभ चाहते हैं। इसलिए शशि थरूर का भविष्य क्या होगा, कहना सम्भव नहीं। पर इतना जरूर है कि इस विवाद से निकलकर वे और परिपक्व राजनेता बनेंगे।