Monday, March 21, 2011

होली के रंगों से या नाभकीय विकरणों से

Rajasthan Patrika 20 March11
अल्हड़पन और मस्ती का त्यौहार है होली। सादगी और पे्रमभरा। न रंग भेद, न जाति भेद और न ही धर्मभेद। होली ही क्यों, भारत के हर त्यौहार में जीवन को जीने का आनन्द है। चाहें पोंगल हो या बैशाखी, नवरात्रि हो या ईद, प्रेम से मिलना, एक-दूसरे के गले लग जाना, घर के बने स्वादिष्ट व्यंजनों का आदान-प्रदान करना और लोककलाओं व लोकसंस्कृति से भरपूर मेलों का आनन्द लेना। दरअसल यही था हमारा सम्पूर्ण जीवन चक्र। जिसमें खेती आधारित अर्थव्यवस्था, अध्यात्म आधारित मानसिकता और पर्यावरण आधारित जीवनशैली। पर आज यह सब हमसे तेजी से छीना जा रहा है, विकास के नाम पर। इसलिए इस वर्ष हम रंगों की नहीं नाभिकीय विकरणों की होली खेल रहे हैं। भारत में न सही, जापान में ही। पर सन्देशा हम सब के लिए भी है।
क्योंकि हमारे हुक्मरान विकास के मद में चूर हैं। अंधों की तरह हम पश्चिम के विकास माॅडल का अनुसरण कर रहे हैं। जिसका सबसे चमचमाता नमूना है, जापान और अमरीका। पिछले हफ्ते से जापान में प्रकृति के कहर का जो दिल दहला देने वाला टी.वी. कवरेज आ रहा है, उससे ज्यादा खतरनाक है नाभिकीय विस्फोटों से फैल रहे विकरणों का खौफनाक मंजर। जिसके चलते पूरे जापान से 3 लाख लोगों को घर छोड़ने पर मज़बूर कर दिया गया है। पिद्दी से देश जापान के 55 लाख लोग कड़ाके की सर्दी में, बिना बिजली के, एक कम्बल में, एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किये हुए रोते-चीखते एक-एक पल बिता रहे हैं। इनमें से ढेड़ लाख लोगों को तो किसी न किसी तरह के नाभिकीय विकरण ने अपनी चपेट में ले लिया है। टोक्यो की नाभिकीय बिजली कम्पनी ‘टोक्यो इलैक्ट्रिक पाॅवर कम्पनी’ ने भूचाल के भारी झटके झेलने के बाद आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी है। दुनियाभर के नाभिकीय वैज्ञानिक इस सदमें से उबर नहीं पा रहे हैं। सब कबूतर की तरह आॅंख बन्द करके यह बताने में जुटे हैं कि उनके देशों को इस खूनी होली से कोई खतरा नहीं।
भारत के प्रधानमंत्री ने भी संसद में घोषणा की कि हमारे नाभिकीय संयत्रों की सुरक्षा की समीक्षा की जा रही है। भावा परमाणु केन्द्र, मुम्बई देश की आर्थिक राजधानी के बीचों-बीच स्थित है। जिसके रिएक्टर समुद्र तट पर हैं। जापान का मंजर देखकर महाराष्ट् विधानसभा के सदस्य इतने आतंकित हो गये कि उन्होंने भावा परमाणु केन्द्र के अध्यक्ष को विधानसभा में बुलवाकर यह आश्वासन लिया कि मुम्बई ऐसे खतरे के प्रति तैयार है। प्रधानमंत्री हों या परमाणु केन्द्र के अध्यक्ष, इनके ये वक्तव्य ठीक ऐसे ही लगते हैं जैसे देश में किसी बड़ी आतंकवादी घटना के बाद घोषणा की जाती है कि देशभर में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की नजर है। हर संदिग्ध व्यक्ति को देखा-परखा जा रहा है। पर हम और आप जानते हैं कि बाकी देश की क्या चले, राजधानी दिल्ली तक में रेड अलर्ट का कोई मायना नहीं होता। इसलिए यह भ्रम पालना कि परमाणु रिएक्टरों और बड़े बांधों से हम सुरक्षित हैं, हमारी मूर्खता होगी। भूचाल और सुनामी कभी भी, कहीं भी आ सकती है और इसलिए तबाही का यह मंजर जापान तक सीमित नहीं रहेगा।
जापान ने तो फिर भी भूकम्परोधी तकनीकि को इतना विकसित कर लिया है कि 5.8 के रिएक्टर स्केल के स्तर पर झटके झेलने के बावजूद टोक्यो की गगनचुंबी इमारतें हिलकर रह गयीं, गिरी नहीं। पर घोटालों के विशेषज्ञ भारत में जहाँ लवासा से आदर्श सोसाईटी तक हर जगह निर्माण का मतलब है, नियमों को ताक पर रखना, वहाँ अगर ऐसे भूकम्प आ जायें तो रोज बनती एक से एक इन गगनचुंबी इमारतों की हालत क्या होगी, सोच कर बदन सिहर जाता है। पर हर दिन अखबार में आप विज्ञापन देखते हैं कि आपके अपने नगर की सबसे ऊँची इमारत में फ्लैट बुक कराईये।
महात्मा गाँधी से लेकर देश का हर पर्यावरणविद्, आम किसान और वनवासी, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और गाहे-बगाहे देश का मीडिया हुक्मरानों की पर्यावरण के प्रति बढ़ती संवेदन शून्यता के खिलाफ आवाज उठाता रहता है। पर इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। मीडिया में एक कहावत है कि ‘हर मुद्दा ठण्डा पड़ जाता है’। हो सकता है, कुछ दिन बाद जापान की इस त्रासदी को हम वैसे ही भूल जायें जैसे गुजरात के भूकम्प या दक्षिण पूर्वी एशिया में आयी सुनामी को भूल गये और जिन्दगी यूं ही ढर्रे पर चलती रहे। पर यह न तो हमारे लिए अच्छा होगा और न ही हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए।
आज सूचना के बढ़ते तंत्र ने पूरी दुनिया को जोड़ दिया है। हम सबको इसका लाभ उठाना चाहिए। पूरी दुनिया से एकसाथ इस विनाशकारी विकास के विरूद्ध आवाज उठनी चाहिए। हम सबको अपने-अपने हुक्मरानों की व लाभ पिपासु बहुराष्ट्रिय कम्पनियों की पैशाचिक मानसिकता के विरूद्ध साझी लड़ायी लड़नी चाहिए। फिर हम चाहें हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान हों, कम्यूनिस्ट हों। आपसी भेदों को भूलकर जिन्दगी को उस ढर्रे की तरफ वापस लौटाने के लिए माहौल बनाना चाहिए जब ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ का सिद्धांत सर्वमान्य था। तभी हमारी जिन्दगी में खुशियाँ, नाचगान, उत्सव-मेले लौट पायेंगे। तभी हम अबीर गुलाल से होली खेलने का मजा लूट पायेंगे। सम्पन्नता, विकास और मस्ती के नाम पर जो माॅडल हमें दिया जा रहा है, वह रावण की स्वर्णमयी लंका है, जिसका नाश अवश्यम्भावी है। अगर हम कछुए की मानिंद बैठे रहे तो फिर रंगों की नहीं नाभिकीय विकरणों की होली के लिए हमें हर समय तैयार रहना चाहिए।

Monday, March 14, 2011

न्यायमूर्ति बालाकृष्णन क्या अकेले भ्रष्ट हैं?

Punjab Kesari 14March11
न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, कानूनविद् रामजेठमलानी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली,  राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी और पूर्व कानूनमंत्री शांतिभूषण, सब मिलकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन के पीछे पड़े हैं। इनका आरोप है कि बालाकृष्णन ने अपने पद का दुरूपयोग कर, अपने लिये और अपने नातेदारों के लिए काफी अवैध धन इकठ्ठा किया। इसलिए उसकी जाँच होनी चाहिए और उन्हें भारत के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से हटा देना चाहिए। इसमें गलत कुछ भी नहीं है।

अगर बालाकृष्णन ने न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर रहते हुए अपने पद की गरिमा का ख्याल नहीं रखा और भ्रष्ट अथवा अनैतिक आचरण करके अवैध धन कमाया है तो उसकी जाँच होनी ही चाहिए और उन्हें इसकी सजा मिलनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में दाखिल जनहित याचिका का संज्ञान लिया है। आने वाले समय में देखना होगा कि ये मामला कहाँ तक पहुँचता है, जाँच होती भी है या नहीं? सबूत मिलते हैं या नहीं और अगर बालाकृष्णन अपराधी पाये जाते हैं तो उन्हें सजा मिलती है या नहीं?

पर यहाँ एक बात बड़ी चिंतनीय है। वह यह है कि बालाकृष्णन के पीछे पड़ी ये चैकड़ी अपने आचरण में दोहरे मानदण्ड अपना रही है। मेरा इनमें से किसी से कोई द्वेष नहीं। सबसे पिछले 20 बरसों से सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध हैं। पर मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि नैतिकता के सवाल उठाने वाले ये लोग कितने आसानी से दोहरे चेहरे अपना लेते हैं।

बहुत पुरानी बात नहीं है। सन् 2000 में भारत के मुख्य न्यायाधीश डाॅ. ए.एस. आनन्द थे। उनके पद पर बैठते ही मैंने उनका मध्य प्रदेश का एक जमीन घोटाला अपने अंग्रेजी अखबार कालचक्र में छापा। इस घोटाले में डाॅ. आनन्द ने अपनी पत्नी की मार्फत झूठे शपथपत्र दाखिल करके, मध्य प्रदेश सरकार से एक करोड़ रूपये से ज्यादा का अवैध मुआवजा वसूल किया। जिन वकीलों ने और जजों ने उनकी इस घोटाले में मदद की, उन्हें पदोन्नती दिलवायी। यह घोटाला छापने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय की बार, संसद और देश का मीडिया सकते में आ गया। क्योंकि भारत के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी ने पदासीन मुख्य न्यायधीश के भ्रष्टाचार पर इस तरह दिलेरी से लेख छापने की हिम्मत की थी। आशा के विपरीत मुझे अदालत की अवमानना में जेल भेजने की हिम्मत डाॅ. आनन्द नहीं कर सके। क्योंकि उन्हें पता था कि उनसे पहले मैं भारत के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा के अनैतिक आचरण पर देश में काफी तूफान मचा चुका था।

इस दौरान इन सब लोगों से और देश के तमाम बड़े राजनेताओं से मैंने जाकर अपील की कि वे इस मुद्दे को संसद में उठाकर डाॅ. आनन्द के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लायें। पर सब डर गये। कोई न्यायापालिका से भिड़ने को तैयार नहीं था। मज़बूरन मैंने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन को अपील भेजी। सवाल किया कि मेरे जैसा पत्रकार और जागरूक नागरिक इस परिस्थिति में क्या करे? राष्ट्रपति ने मेरी याचिका तत्कालीन कानूनमंत्री रामजेठमलानी को भेज दी। जेठमलानी ने उसे टिप्पणी के लिए मुख्य न्यायाधीश डाॅ. आनन्द के पास भेज दिया। इस पर आनन्द हड़बड़ा गये और इस्तीफा देने को तैयार हो गये। पर तब उन्हें अरूण जेटली और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सहारा दिया। नतीज़तन जेठमलानी को कानून मंत्री का पद गंवाना पड़ा और अरूण जेटली को भारत का कानून मंत्री बना दिया गया। मेरे द्वारा उठाये इस विवाद पर उस समय देश और दुनिया के मीडिया में बहुत कुछ छपा। पर डाॅ. आनन्द अपने पद पर बने रहे। क्योंकि उन्हें नये कानून मंत्री अरूण जेटली व प्रधानमंत्री वाजपेयी का वरदहस्त प्राप्त था। उनके इस आचरण से उत्तेजित होकर मैंने जम्मू और श्रीनगर में जाकर डाॅ. आनन्द के कई और जमीन घोटाले खोजे व उन्हें सप्रमाण कालचक्र के अंग्रेजी अखबारों में छापा। मेरी इस जुर्रूत को देखकर डाॅ. आनन्द ने छः घोटाले छपने के बाद मेरे खिलाफ जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मुकदमा कायम करवा दिया। जबकि यह मुकदमा अगर कायम होना था तो सर्वोच्च अदालत में होना चाहिए था। मुझे आतंकित करने के मकसद से आदेश दिये गये कि मुझे श्रीनगर में रहकर अदालत की कार्यवाही का सामना करना होगा। यह जानते हुए कि मैं हिज्बुल मुज़ाहिदीन के अवैध आर्थिक स्रोतों को उजागर कर चुका था तथा मुझे आतंकवादियों से जान का खतरा था। इस तरह के आदेश अदालत से करवाये गये। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने परम्परा से हटकर सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों को लिखा कि विनीत नारायण का जीवन इस राष्ट्र के लिए कीमती है। इसलिए अगर उन पर मुकदमा चलाना है तो उसे पंजाब या दिल्ली के उच्च न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया जाये। पर अदालत ने एक न सुनी। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने मुझे भगौड़ा अपराधी घोषित कर दिया। मेरे घर और दफ्तर पर जम्मू पुलिस के छापे पड़ने लगे। मुझे ढेड़ वर्ष भूमिगत रहना पड़ा। आखिर मैं देश छोड़कर भागने पर मज़बूर हो गया। अदालत की अवमानना के डर से भारत के मीडिया ने पदासीन मुख्य न्यायाधीश के विरूद्ध, इन मामलों को छापने की हिम्मत नहीं दिखायी। लंदन, न्यूयाॅर्क, वाॅशिंगटन में मुझे पूरी दुनिया के मीडिया का समर्थन मिला। सी.एन.एन. और बी.बी.सी. जैसे टी.वी. चैनलों पर मेरे साक्षात्कारों का सीधा प्रसारण हुआ। दुनिया के 300 से अधिक मीडिया संगठनों ने कानूनमंत्री अरूण जेटली और प्रधानमंत्री वाजपेयी को ई-मेल पर अपील भेजी कि विनीत नारायण की सुरक्षा की जाये और मुख्य न्यायाधीश डाॅ. ए.एस. आनन्द के भ्रष्टाचार की जाँच की जाये। पर इनके कानों पर जूं नहीं रेंगी। डाॅ. आनन्द के सारे घोटाले सप्रमाण आज भी कालचक्र के कार्यालय में संजोकर रखे गये हैं। जिनकी जाँच कोई भी, कभी भी कर सकता है। बावजूद इसके सेवानिवृत्त होने के बाद डाॅ. आनन्द को भारत के मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। यह नियुक्ति एन.डी.ए. द्वारा राष्ट्रपति बनाये गये डाॅ. अब्दुल कलाम आजाद ने सारे तथ्यों को जानने के बाद भी की।

मेरा सवाल न्यायमूर्ति बालाकृष्णन के खिलाफ जाँच की माँग करने वालों से यह है कि क्या भ्रष्टाचार को नापने के दो मापदण्ड होने चाहिए? डाॅ. आनन्द के लिए कुछ और, दलित बालाकृष्णन के लिए कुछ और? अगर ऐसा नहीं है तो ये सारी चैकड़ी देश को इस बात का जबाव दे कि डाॅ. आनन्द के खिलाफ भ्रष्टाचार के इतने सबूत होते हुए भी इन्होंने वैसा अभियान क्यों नहीं चलाया जैसा अब ये चला रहे हैं? और अब अदालत से माँग करें कि डाॅ. आनन्द के भ्रष्टाचार की भी वैसी ही जाँच हो जैसी बालाकृष्णन की हो रही है। दलितों की मसीहा बहिन मायावती को भी इस सवाल को जोर-शोर से उठाना चाहिए।

Sunday, March 6, 2011

पश्चिम एशिया की क्रांति कहाँ तक जायेगी?

Rajasthan Patrika 6 March11
तहरीर चैक की क्रांति ने दशकों से काबिज तानाशाह राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को पैदल कर दिया। ट्यूनिशिया उबाल पर है। लीबिया में कर्नल गद्दाफी के खिलाफ आन्दोलन बढ़ता जा रहा है और अब इन सबसे खतरनाक तानाशाह के दिन गिने-चुने रह गये दीखते हैं। यमन, ईरान, सउदी अरेबिया, हर जगह तानाशाहों के खिलाफ गुस्सा उबाल पर है।
आर्थिक विकास का न होना, युवाओं के आगे रोजगार के अवसर न होना, तानाशाहों का बर्बरतापूर्ण आक्रामक रवैया, जिसने कभी किसी विरोध के स्वर को पनपने ही नहीं दिया आदि कुछ ऐसे कारण हैं जिन्होंने मौजूदा हालात को जन्म दिया। इन तानाशाहों का ऐसा रवैया पश्चिमी यूरोप और अमरीका जैसे देशों ने इसलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि उनका आंकलन था कि ऐसा न करने की हालत में अलकायदा जैसे कट्टरपंथी तालिबान, इन देशों की सŸााओं पर काबिज हो सकते हैं। ईरान जैसे देश में तो कमोबेश यही स्थिति रही। जहाँ तानाशाह व तालिबानी मानसिकता एकसाथ स्थापित हो गयी।
पश्चिम की इस मज़़बूरी का इन तानाशाहों ने भरपूर लाभ उठाया। यहाँ तक कि इन मुल्कों की सेना भी तानाशाहों के साथ मिलकर चली और भ्रष्टाचार करके देश के संसाधनों का इन सबने मिलकर मजा लूटा। जनता पिसती रही। फिर भी उसने बगावत की हिम्मत नहीं की। इस बार भी जो बगावत हुई है, उसका नेतृत्व न तो तालिबान के पास है और न ही सŸाा के किसी उल्लेखनीय प्रबल विरोधी के पक्ष में। यह आन्दोलन तो स्वस्फूर्त था। जिसमें सबसे ज्यादा सक्रिय, पढ़ी-लिखी युवापीढ़ी रही। मिस्र में कामयाबी तो मिल गयी और शायद बाकी देशों में भी आवाम को ऐसी कामयाबी मिल जाए, लेकिन यह कामयाबी लोकतंत्र को स्थापित कर पायेगी, इसमें सन्देह है। क्योंकि कटट्रपंथी इन देशों को प्रजातांत्रिक देश नहीं बनने देना चाहते। इसलिए वे परदे के पीछे से खेल खेलते हुए सŸाा के शिखर पर पैदा हो रहे शून्यों को भरने का प्रयास करेंगे। यह एक भयावह स्थिति होगी। क्योंकि तब हालात पहले से भी बदतर हो जायेंगे।
दरअसल समस्या यह है कि पाँच-छः दशकों से तानाशाही झेलते हुए इन मुल्कों के आवाम को लोकतंत्र का कोई अनुभव नहीं है। न तो यहाँ लोकतांत्रिक संस्थाऐं पनप पायीं हैं और न ही उनको विकसित करने की समझ और अनुभव वाले लोग वहाँ मौजूद हैं। इसलिए डर यह भी है कि सŸाा से हटा दिये गये तानाशाहों के हुक्काबरदार लोग इस नयी प्रक्रिया की कमान संभाल लें और इस तरह एक बार फिर वही चैकड़ियाँ पिछले दरवाजे से सŸाा पर काबिज हो जायें। यह इसलिए भी ज्यादा संभव है क्योंकि इन मुल्कों की सेना लोकतंत्र बर्दाश्त नहीं करेगी। वो लोकतंत्र की राह में हर संभव रोड़ा अटकायेगी। सेना के बड़े अफसरों को जिस लूट और ऐश की आदत पड़ गयी है, वह लोकतंत्र की स्थापना के बाद उनसे छीन लिया जायेगा। इसलिए वे या तो खुद सŸाा पर काबिज होने की कोशिश करेंगे या नये संविधान में ऐसे प्रावधान बनवा देंगे जो उनकी ताकत कम न हो। साम्राज्यवादी देशों को यह समीकरण पसन्द आयेगा। क्योंकि उनका उद्देश्य तो इन देशों को लूटना है, बनाना नहीं। इस तरह सच्ची भावना, दिलों में आग और दिमाग में बर्फ लेकर, इस क्रांति की शुरूआत करने वाले, इन देशों का आवाम, खासकर युवापीढ़ी फिर ठगी जायेगी। इतने बड़े आन्दोलनों का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। आज इन देशों को जरूरत है एक ऐसी नेतृत्व क्षमता की, जिसे अपने अतीत पर गर्व हो और वर्तमान को ठीक करने की ललक। ऐसा नेतृत्व अगर पनपता है, तभी बचने की उम्मीद है।
इन देशों में मौजूदा राजनैतिक दल, जिनका कोई वजूद नहीं है, वे भी सक्रिय हो सकते हैं। पर वे समय की धारा को नहीं प्रभावित कर पायेंगे। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि इन देशों की क्रांति, इनके संविधान और इनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला पायेगी और तब ये सारी मेहनत बेकार जाने का खतरा है। जो भी हो, फिलहाल तो यह आग फैल ही रही है। इससे एक सन्देश पूरी दुनिया में गया है कि जनता कितनी ही साधनहीन और असहाय हो, अगर कमर कस ले व संगठित हो जाये तो बड़े-बड़े तानाशाहों को गिरा सकती है। इसलिए पश्चिम एशिया में जो कुछ घट रहा है, वह हमारे लिए जिज्ञासा का विषय तो है हीः इन देशों में इन फुटकर क्रांतियों का परिणाम सुःखद और सकारात्मक होना चाहिए। जिसके लिए अन्य देशों को भी, इन देशों की मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए। ताकि वहाँ कानून का राज कायम हो सके।

Monday, February 28, 2011

ग्रीन इंडिया मिशन : घोषणा या हकीकत

Punjab Kesari 28 Feb11
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Sunday, February 20, 2011

भारत को अनुदान : इंग्लैंड में हाय तौबा

राजस्थान पत्रिका 20 Feb2011
जब से इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने भारत को दी जा रही 1 बिलियन पाउण्ड की आर्थिक सहायता को अगले 4 वर्षों तक जारी रखने की घोषणा की है, तबसे इंग्लैंड में तूफान मच गया है। कैमरून की इस नीति पर हमला करते हुए टोरी सांसद इस अनुदान के औचित्य पर अनेक सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका मानना है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को इंग्लैंड की आर्थिक मदद क्यों चाहिए? खासकर तब जबकि इंग्लैंड की सरकार अपने देश में समाज कल्याण की अनेक योजनाओं को आर्थिक तंगी के चलते बंद करती जा रही है।

इन सांसदों का यह भी कहना है कि भारत में इंग्लैंड के मुकाबले कई गुना ज्यादा खरबपति हैं। इन सांसदों को शिकायत है कि आणविक शक्ति और आतंरिक्ष शोध कार्यक्रम चलाने की कुव्वत रखने वाला भारत इंग्लैंड की मदद का मोहताज क्यों है? इन सांसदों के अलावा इंग्लैंड के करदाताओं के संगठन भी इस विकास राहत अनुदान का विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि भारत से कहीं ज्यादा गरीब देश हैं जिन्हंे आर्थिक मदद दी जानी चाहिए। क्योंकि भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार के चलते यह मदद गरीबों तक नहीं पहुँचती।

दूसरी तरफ सरकार के अन्तर्राष्ट्रीय विकास सचिव एण्ड्रयू मिशेल ने बी-बी-सी- टेलीविजन पर दिये एक साक्षात्कार में बताया कि भारत में दुनिया की सबसे बड़ी गरीब आबादी रहती है] जिसके लिए यह मदद बहुत थोड़ी होते हुए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत अवश्य आणविक व अन्तरिक्ष कार्यक्रम चला रहा है] पर उसके नागरिक की औसत आमदनी चीन के मुकाबले एक तिहाई है।

Punjab Kesari 21 Feb11
उल्लेखनीय है कि विकास कार्यों के लिए इंग्लैंड से दी जानी वाली आर्थिक सहायता में भारत का हिस्सा बहुत कम है। दूसरी तरफ इस विवाद से इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों मे भी हलचल है। कुछ मानते हैं कि भारत को इंग्लैंड से अनुदान लेने में शर्म आनी चाहिए, क्योंकि उसके पास धन की कमी नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार और नकारा सरकारों के चलते उसकी यह दुर्दशा है। कुछ भारतीय, अर्थशास्त्रियों की तरह, यह भी मानते हैं कि ऐसा हर अनुदान निहित स्वार्थों के लिए दिया जाता है। जिससे अनुदान पाने वाले देशों की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था पर मज़बूत पकड़ बनाकर उनका अपने फायदे के लिए दोहन किया जा सके। ज्यादातर भारतीयों का यही मानना है कि भारत को अपनी व्यवस्था सुधारनी चाहिए, काले धन और हवाला कारोबार को रोकना चाहिए, विदेशी बैंकों में जमा धन भारत वापस लाना चाहिए और इस तरह अपने देश और समाज को मजबूत बनाना चाहिए। उन्हें लगता है कि भारत में और भारत के बाहर ऐसे तमाम अरबपति हैं, जो भारत की गरीबी दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हे इस काम के लिए आगे आना चाहिए।
वहीं कुछ ऐसे भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक भी हैं, जो यह मानते हैं कि इंग्लैंड की आज की सम्पन्नता का कारण वह लूट है जो उसने 190 सालों तक भारत में की। उसी लूट के कारण आज इंग्लैंड की नयी पीढ़ी वैभवपूर्ण जीवन जी रही है। इसलिए न सिर्फ इंग्लैंड को यह आर्थिक मदद जारी रखनी चाहिए बल्कि इंग्लैंड के संग्राहलयों में रखी भारत की बेशकीमती धरोहरों को भी भारत को लौटा देना चाहिए।

दूसरी तरफ इंग्लैंड के अखबार जैसे डेली एक्सपै्रस या डेली मेल, इस अनुदान नीति का खुला उपहास कर रहे हैं। जबकि इंग्लैंड की सरकार कहना है कि वह भारत के तीन सबसे पिछड़े राज्यों उड़ीसा, बिहार और मध्य प्रदेश को ही मदद देने जा रही है, क्योंकि उसका भारत के साथ गहरा आर्थिक नाता है। उल्लेखनीय है कि इंग्लैंड ने रूस और चीन को दी जा रही अपनी आर्थिक मदद अब रोक दी है। 

इंग्लैंड और भारत के रिश्तों में इतिहास की कड़वाहट बाकी है। हमारी मौखिक परंपरा, इतिहास की पुस्तकें हैं और समय-समय पर आने वाली ‘लगान’, ‘जुनून’ और ‘गाँधी’ जैसी फिल्में हमें बार-बार उन 190 सालों की याद दिला देती हैं, जब अंग्रेज सरकार ने न सिर्फ हमें बुरी तरह लूटा, बल्कि जल़ील भी किया और हमारे साथ गुलामों जैसा बर्ताव किया। इसलिए चाहें आर्थिक मदद का मामला हो, चाहें टीपू सुल्तान की तलवार भारत लाने का या ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक भारतीय द्वारा खरीदे जाने का या राष्ट्रकुल की सदस्यता में बने रहने का या इंग्लैंड में आव्रजन का, हर ऐसे मुद्दे पर इंग्लैंड में और इंग्लैंड के बाहर रहने वाले भारतीय बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि इंग्लैंड ने भारत पर किये अत्याचारों का कभी प्रायश्चित नहीं किया। इसलिए वे हर मौके पर इंग्लैंड को शीशा दिखाने से बाज़ नहीं आते।

दूसरी तरफ यह भी सही है कि ऐसे अनुदानों से कोई मूलभूत विकास नहीं हो सकता और अनुदान भी कैसा जिसमें इतनी शर्तें कि लेने वाला, लेकर भी पछताये और लाभ के बजाय शोषण के विषम चक्र में फंस जाये। सही है कि भारत में साधन, मेधा और समझ की कोई कमी नहीं है। अगर हमारा राजनैतिक नेतृत्व भारत की मूल शक्ति को प्रोत्साहित करे और अपनी कमजोरियों को दूर करे तो बहुत जल्द ही भारत दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा हो सकता है। तब उसे किसी भी देश की तरफ अनुदान के लिए देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

Monday, February 14, 2011

सी बी आई की दुर्दशा के लिए कौन ज़िम्मेदार

Punjab Kesari 14 Feb 11
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Sunday, February 6, 2011

लोकपाल बिल क्या कर लेगा

 
Rajasthan Patrika 6 Feb 2011
महात्मा गाँधी की शहादत वाले दिन दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड सहित देश के साठ शहरों में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनसभाऐं की गयीं। जिसमें बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर के अनुयायियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके आयोजकों में प्रमुख पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी व सूचना के अधिकार के लिए मेगासे पुरूस्कार पाने वाले अरविन्द केजरीवाल शामिल थे। केजरीवाल ने
दिल्ली की जनसभा में बोलने का न्यौता मुझे भी दिया। आमतौर पर ऐसे प्रयासों का प्रभाव पिछले 36 वर्षों में बार-बार देख चुकने के बाद, मुझे कोई मुगालता नहीं रहता। फिर भी मित्रों का बुलावा था,  इसलिए चला गया। मंच पर एक से एक विभूतियाँ बैठी हुयी थीं। किरण बेदी तो बड़ी गर्मजोशी से मिलीं और बाकी सबने भी अभिवादन किया। पर मैं 5 मिनट में ही मंच से उतर गया और बिना भाषण दिये लौट आया। उसके बाद मुझे अंग्रेजी पत्रकारों के कारणपूछने के लिए फोन आये। कारण साफ है। प्रशांत भूषण और शान्ति भूषण के बनाये जन-लोकपाल विधेयक से अगर भ्रष्टाचार रूक सकता है, तो जरूर इसका समर्थन करना चाहिए। पर ऐसा होगा नहीं।
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जब हर्षद मेहता घोटाला हुआ था, तो शोर मचा कि सेबी का गठन कर देना चाहिए। सेबी बना, पर उसके बाद केतन पारिख जैसे कितने ही शेयर घोटाले हुए। शेयर मार्केट पर निगाह रखने वाले क्या नहीं जानते कि सेबी शेयर मार्केट के घोटालों को रोकने में नाकाम रही है ? भ्रष्टाचार के विरूद्ध सी.बी.आई. कबसे काम कर रही है, पर क्या भ्रष्टाचार को रोकने में या आरोपियों को सजा देने में सी.बी.आई. ने कोई झण्डे गाढे हैं? देश के 115 ताकतवर राजनेताओं, अफसरों, हवाला डीलरों, हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों के विरूद्ध जैन हवाला काण्डमें तमाम सबूत मौजूद थे। पर उन सब सबूतों की अनदेखी कर, बिना रीढ़ के केन्द्रीय सतर्कता आयोगके गठन का फैसला सुना दिया गया। आज सर्वोच्च अदालत में उसी विनीत नारायण केसका सुबह से शाम तक दर्जनों बार हवाला देकर सी.वी.सी. की नियुक्ति और भ्रष्टाचार पर बहसें की जा रही हैं। 1997 में जब इस केस की मुख्य प्रार्थनाओं और आरोपियों के विरूद्ध उपलब्ध सबूतों को अनदेखा कर सी.वी.सी.के गठन जैसे मुद्दों पर बहस शुरू हुई, तो मैंने जमकर इसका विरोध किया। अखबारी बयानों में ही नहीं, बल्कि अदालत में शपथपत्र दाखिल करके भी। मेरा कहना था कि जब भारत सरकार सी.बी.आई. को स्वायŸाता नहीं देती तो कैसे माना जाये कि वो सी.वी.सी. को एक स्वायŸा संस्था बना देगी? पर उस वक्त मेरे सहयाचिकाकर्ता प्रशांत भूषण, उनके पिता शांति भूषण, उनके मार्गनिर्देशक रामजेठमलानी, उनकी ही मित्रमण्डली के सदस्य अरूण जेटली, सबके-सब बड़े उत्साह से सी.वी.सी. के गठन के मामले में जोर लगाने लगे और हवाला काण्डकी याचिका की मुख्य प्रार्थनाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया। बल्कि अदालत का ध्यान उनसे हटाने का उपक्रम चलाया। इस तरह उच्च राजनैतिक स्तर पर भ्रष्टचार के विरूद्ध, आजादी के बाद लड़ी जा रही सबसे बड़ी लड़ाई को इन लोगों ने अपने निहित स्वार्थों के कारण पटरी पर से उतार दिया। मजे की बात यह है कि आज 13 साल बाद जब हवाला कारोबार, राजनैतिक भ्रष्टाचार और आतंकवाद सिर से ऊपर गुजर चुका है, तो वही लोग देश के सामने इसे रोकने का नाटक कर रहे हैं। अगर वास्तव में इनके दिल में ईमानदारी है और ये चाहते हैं कि देशवासी भ्रष्टाचार से मुक्त हों, तो पहले तो इन्हें अपने किये पर सार्वजनिक पछतावा व्यक्त करना चाहिए और फिर एकजुट होकर माँग करनी चाहिए कि जैन हवाला काण्डसे लेकर ‘2जी स्पैक्ट्रमतक, जो भी आठ-दस बड़े घोटाले अदालतों के बावजूद बेशर्मी से दबा दिए गये हैं, उनकी तेज गति से, खुली अदालत में जाँच और कार्यवाही चले। ताकि देश के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत हो सके। स्कूल के बच्चों से एक प्रश्न पूछा जाता था कि पेड़ पर 100 चिड़ियाँ बैठी हैं। एक को छर्रा मारो तो कितनी बचेंगी ? जब हाईप्रोफाइल केसों में बड़े लोगों को सजा मिलेगी, तभी समाज के आगे उदाहरण प्रस्तुत होगा। पर ये लोग ऐसा कभी नहीं करेंगे। चाणक्य पण्डित ने कहा है कि व्यवस्था कोई भी बना लो, अगर उसको चलाने वाले ईमानदार नही, तो परिणाम ठीक नहीं आयेगा। तब ये लोग सी.वी.सी.के गठन को लेकर कूद रहे थे। थामस रहें या जायें, क्या पिछले 10 वर्षों में सी.वी.सी. ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध कोई कमाल करके दिखाया है? जन-लोकपाल बिल बनाने से ये लड़ाई नहीं जीती जा सकेगी। कार्यक्रम के बाद मुझे अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी दोनों ने फोन पर मेरी नाराजगी का कारण पूछा तो मैंने बिना लाग-लपेट के कहा कि जिन लोगों के कारण हवाला संघर्ष की सबसे बड़ी लड़ाई बिगड़ गयी, उनको साथ लेकर तुम महात्मा गाँधी की समाधि पर श्रद्धाजंली अर्पित करोगे तो तुम्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं। गाँधी जी ने साध्य की प्राप्ति के लिए साधन की शुद्धता पर जोर दिया था।
यहाँ इंका के युवा नेता राहुल गाँधी के हालिया बयान का जिक्र करना भी सार्थक रहेगा। अपनी एक जनसभा में उन्होंने युवाओं से कहा कि मैं जानता हूँ कि देश में भ्रष्टाचार से आप सब त्रस्त हैं। हमें इसे दूर करना है। इसलिए मैं आपका आव्हान करता हूँ कि आप सब राजनीति में आयें और मैं वायदा करता हूँ कि मुझे 10 वर्ष का समय दीजिए, मैं हालात बदल दूंगा। राहुल गाँधी की भावना सही हो सकती है। पर सोच सही नहीं। कहावत है, ‘काल करै सो आज कर, आज करै सो अब, पल में परलै होयेगी, बहुरी करैगो कब। बिना प्रधानमंत्री बने ही राहुल गाँधी के पास काफी ताकत है। अपने चाचा संजय गाँधी की तरह उनकी छवि एक गरम जोश युवा की नहीं, बल्कि राजनीति के एक संजीदा विद्यार्थी की है। जो ज़मीन से राजनीति को समझने का प्रयास कर रहा है। राहुल गाँधी को मालूम होना चाहिए कि हालात जिस तेजी से बिगड़ रहे हैं, इस देश का नौजवान 10 वर्ष इंतजार नहीं करेगा। ऐसे वायदे तो देशवासी पिछले 60 सालों से सुनते आ रहे हैं। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के आव्हान के बाद 1977 में जो जनता दल की सरकार बनी, उसने भी यही कहा कि अभी तो हम नई दुल्हन हैं। मुल्क में 30 साल से जो गन्दगी जमा है, पहले उसे साफ करेंगे, फिर आपको घर चमकाकर देंगे। पर ढाई साल में ही सब ढेर हो गया। राहुल गाँधी के बयान को भी गम्भीरता से नहीं लिया जायेगा।
इसी तरह मेरा मानना है कि जन-लोकपाल बिल का शोर केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए मचाया जा रहा है। इससे न तो भ्रष्टाचार रूकेगा और न ही इसका कोई प्रभाव देश की स्थिति पर पड़ेगा।